अभिनवगुप्त ने जिस प्रत्यभिज्ञा दर्शन की स्थापना की, प्रसादजी ने उसी को आधार बनाकर कामायनी जैसी कालजयी कृति की रचना की। अभिनवगुप्त ने अपने ध्वन्यालोकलोचन में लिखा है कि वस्तु और अलंकार ध्वनियां भी अंतत: रस रूप ले लेती है। इसी प्रकृत आनंद रस को उपनिषदों में आत्मतत्व कहा गया है। शैवाद्वैत की दार्शनिक अनुभूति को हम दूसरे शब्दों में आनंदवादी रहस्यवाद भी कह सकते हैं। प्रसाद का काव्य मुख्यतया इसी आनंदवादी दार्शनिक पृष्ठभूमि पर टिका हुआ है।
युग प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद और आचार्य अभिनवगुप्त के काल के बीच लगभग हजार वर्ष का अंतर है। यह अंतर भौगोलिक स्तर पर भी है। लेकिन, दोनों में एक अद्भुत साम्य है, वह है उनकी विचारपीठिका पर। अभिनवगुप्त का प्रभाव सैकड़ों वर्ष बाद भी जयशंकर प्रसाद के मुंह से प्रस्फुटित हो रहा है। प्रसाद का महाकाव्य ‘कामायनी’ अभिनवगुप्त के ‘प्रत्यभिज्ञा दर्शन’ का ही एक काव्य रूप है। कामायनी ग्रंथ का सार शैव दर्शन के आनंदवाद पर आधारित है। चिंता से आनंद तक पहुंचना कैसे संभव हो, यही कामायनी का मूल प्रतिपाद्य है। कामायनी छायावाद की उत्कृष्ट रचना है। विचारकों का मानना है कि इसका निर्माण छायावाद की प्रौढ़ बेला में हुआ है और यह छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद की गहन अनुभूति और उन्नत अभिव्यक्ति की साकार प्रतिमा है। इस कारण इसमें छायावाद की संपूर्ण उन्नत और श्रेष्ठ प्रवृत्तियों का मिलना नितांत स्वाभाविक है। देखा जाए तो कामायनी महाकाव्य छायावाद की प्रतिनिधि रचना है। यह संयोग ही है कि आचार्य अभिनवगुप्त की सहस्राब्दी और प्रसादजी का 125वीं जयंती साथ-साथ चल रही है।
कामायनी को रूपक काव्य भी कहा जाता है। महाकाव्य की प्रवृत्ति जहां बर्हिमुखी होती है, वहीं रूपक की अंतमुर्खी होती है। इन दोनों का सामंजस्य कैसा होगा? डॉ नगेंद्र ने माना है कि कामायनी परंपरागत महाकाव्य यानी ऐहिक जीवन-प्रधान महाकाव्य की कोटि में नहीं आता। वह ऐहिक जीवन का महाकाव्य नहीं है, मानवचेतना का महाकाव्य है। कामायनी मानव-चेतना के विकास का महाकाव्य है या मानव सभ्यता के विकास का विराट रूपक है। इसलिए इसका अध्ययन साफतौर उसके रसास्वादन की प्रक्रिया का एक अंग है। कामायनी के संदर्भ में रामचंद्र शुक्ल का मानना है कि किसी एक विशाल भावना को रूप देने की ओर भी अंत में प्रसादजी ने ध्यान दिया, जिसका परिणाम है कामायनी, इसमें उन्होंने अपने प्रिय आनंदवाद की प्रतिष्ठा दार्शनिकता के ऊपरी आभास के साथ कल्पना की मधुमती भूमिका बनाकर की है। यह आनंदवाद बल्लभाचार्य के कार्य या आनंद के ढंग पर न होकर योगियों और तांत्रिकों की अंतभूमि-पद्धति पर है। कामायनी छायावाद की चरम परिणति है और प्रसाद के गंभीर चिंतन का श्रेष्ठतम प्रतिफल है।
मानवता की आधारशिला पर टिका हुआ यह महाकाव्य एक तरफ जहां श्रद्धा और मनु के माध्यम से सृष्टि के विकास की कहानी कहता है, वहीं दूसरी तरफ रूपकों के माध्यम से मानवता के चरम विकास को भी मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक धरातल पर प्रस्तुत करता है। बीसवीं शताब्दी की महान उपलब्धि के रूप में कामायनी दार्शनिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और कलात्मक विशिष्टता का एक बेजोड़ संगम है। कामायनी एक सफल कृति है जिसमें जीवन की ज्वलंत समस्याओं का अद्भुत और सटीक समाधान प्रस्तुत किया गया है। कामायनी काव्य का मूलबिंदु है- पहले श्रद्धा को पत्नी रूप में ग्रहण करना। फिर उसे अकेली छोड़कर इड़ा के साथ मनु का रहना। इड़ा को दासी या वंदिनी बनाने का प्रयास करने पर देवों का कोपभाजन बनना।
मनु भीषण प्रलय की क्षति से, देवसृष्टि के वैभव के पतन से और अपने अतीत के भोग-विलास पूर्ण जीवन की समाप्ति से निराश और विक्षिप्त हैं। वे किंकर्तव्यविमूढ़ हंै। वे पूर्णतया निराशावादी विचारों से घिरे हुए हैं। वहां ज्योति की कोई किरण नहीं है। उनके जीवन में कोई उत्साह नहीं है, कोई जिजीविषा नहीं है। वे एक हारे हुए जुआरी की भांति निराश-हताश और दीन-हीन व्यक्ति हैं। अभिनवगुप्त दार्शनिक हैं। अभिनवगुप्त ने लगभग बयालीस ग्रंथों की रचना की थी, लेकिन इसमें बीस-बाईस ग्रंथ ही आज उपलब्ध हैं। तंत्रालोक, परात्रिषिका विवरण परमार्थसार, तंत्रसार, गीतार्थसंग्रह, लाघवी और बृहित्वमर्षिनी जैसी महत्त्वपूर्ण कृतियों की सर्जना करने के साथ-साथ नाट्यशास्त्र और ध्वन्यालोक पर विवेचना भी लिखी। उन्होंने ध्वनि-को चौथा आयाम नाम प्रदान किया। ‘गीता’ में कृष्ण के उपदेशों को प्रतीक रूप में अभिव्यक्त करते हुए महाभारत-युद्व के विद्या और अविद्या के बीच होने वाले संघर्ष के रूप में वर्णित किया। अभिनवगुप्त ने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर अभिनव भारती और आनंदवर्धन के ध्वन्यालोक पर ध्वन्यालोकलोचन नामक टीकाओं की रचना की।
अभिनवगुप्त ने जिस प्रत्यभिज्ञा दर्शन की स्थापना की, प्रसादजी ने उसी को आधार बनाकर कामायनी जैसी कालजयी कृति की रचना की। अभिनवगुप्त ने अपने ध्वन्यालोकलोचन में लिखा है कि वस्तु और अलंकार ध्वनियां भी अंतत: रस रूप ले लेती है। इसी प्रकृत आनंद रस को उपनिषदों में आत्मतत्व कहा गया है। शैवाद्वैत की दार्शनिक अनुभूति को हम दूसरे शब्दों में आनंदवादी रहस्यवाद भी कह सकते हैं। प्रसाद का काव्य मुख्यतया इसी आनंदवादी दार्शनिक पृष्ठभूमि पर टिका हुआ है। इसका मूलस्वरूप आनंदवाद है जिसका आधार विशेषरूप से कश्मीरी शैवाद्वैत ही है। शैवाद्वैत में माया को मान्यता नहीं दी गई। वहां जीवन और जगत को सत्य माना जाता है जो चिति का ही प्रतिरूप है। शैवदर्शन से प्रेरणा लेते हुए प्रसाद ने चिति के विराट सत्य, शिव सुंदर रूप का जीवन और जगत के बीच साक्षात्कार की कामना की है-
अपने सुखदुख से पुलकित, यह मूर्त विश्व सचराचर।
चिति का विराट वपु मंगल, यह सत्य सतत् चिर सुंदर।
जीवन का अंतिम भाव आनंद है। आनंद की उपलब्धि के लिए प्रयत्नशील मानव अनेक संघर्षों से गुजरता है। आनंद सर्ग के निर्माण में प्रसादजी ने शैवदर्शन का अत्यधिक आश्रय लिया है। शैवागम के प्रत्यभिज्ञा दर्शन से ही प्रसाद ने समरसता सिद्धांत की परिकल्पना की। शैवदर्शन के अनुसार शिव आनंदस्वरूप हैं। कामायनी में श्रद्धा की शक्ति के रूप में परिकल्पना की गई। कश्मीरी शैवागम प्रधानतया अद्वैतवादी है जहां पर परम अद्वैत सत्ता आत्मा है जिसको परा संवित शिव परमेश्वर या परमशिव के नाम से भी विभूषित किया जाता है।
प्रसाद का ‘आनंदवाद’ सर्ववाद सिद्धांत पर टिका हुआ है जिसे हम वैदिक अद्वैत के रूप में भी समझ सकते हैं। प्रसादजी का यह सर्ववादी सिद्धांत आचार्य शंकर द्वारा प्रवर्तित अद्वैत सिद्धांत से पूर्णतया भिन्न है। उन्होंने शैवागम के सर्ववादमूलक आनंदवाद को ग्रहण किया। आनंदवादी आचार्य अभिनवगुप्त जिस प्रकार एक ही अभेदमय आनंद रस को मूल रस मानते हैं, वैसे ही कामायनीकार की आस्था भी शैवागम के आनंद रस से प्रभावित इसी एकरस सिद्धांत में थी।
कुछ आलोचक कामायनी के रहस्य सर्ग में प्रत्यभिज्ञादर्शन के सामरस्य सिद्धांत का स्पष्ट रूप प्रभाव मानते हैं। यह कहा जा सकता है कि कामायनी का प्रमुख दर्शन शैवमत का आनंदवाद है। प्रसादजी मूलत: एक दार्शनिक रहस्यवादी कवि हैं। वे अपनी रचनाओं में इस जीवन के सत्य रहस्य को प्रमुखता से स्वीकार करते हैं। यही रसमय रूप सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उसमें कला और सत्य दोनों की अद्वैतता विद्यमान है। उनका काव्यदर्शन विशुद्ध ध्वनिवादी है। दार्शनिक रहस्य और ध्वनि एक दूसरे पर परस्पर आश्रित हैं। काव्य का अभीष्ट रस आनंद ही है जिसे काव्य की आत्मा भी माना गया है। ०

