आशा शर्मा
जब मानू बिल्ली का उत्साह अपने चरम पर था। आज ही उसका बोर्ड परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ था, जिसमें उसने पूरे जंगल में पांचवां स्थान प्राप्त किया था और दूसरी खुशी की बात यह कि आज उसका जन्मदिन भी था। दोनों खुशियों को एक साथ मनाने के लिए उसके पापा ने आज उसके सभी दोस्तों को पार्टी देने का एलान किया तो मानू झूम कर पापा के गले लग गई।
मानू का ननिहाल भी उसी जंगल में था। शाम को उसके बिल्लू मामा और मामी भी अपनी दोनों बेटियों के साथ पार्टी में आए। मामा का टुअर ऐंड ट्रेवल्स का काम होने के कारण उनके बहुत से विदेशी दोस्त हैं, जो उन्हें अक्सर महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उपहार में भेजते रहते हैं। मामा ने मानू को उसके जन्मदिन पर एक अत्याधुनिक मोबाइल फोन उपहार में दिया। मानू की तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। उसने फटाफट पार्टी में आए सभी मेहमानों को कैमरे में कैद करना शुरू कर दिया। मानू के दोस्त उसके नए मोबाइल को ईर्ष्या से देख रहे थे।
मानू की पूरी छुट्टियां मोबाइल के कारण खूब मजे से बीतीं। उसके पापा ने भी उसे ज्यादा नहीं टोका, क्योंकि उन्हें भरोसा था कि मानू अपनी पढ़ाई को लेकर कभी कोताही नहीं बरतेगी और स्कूल खुलने के बाद खुद मोबाइल फोन से दूरी बना लेगी, मगर जल्दी ही उनका यह विश्वास टूटता-सा नजर आया। मानू का ध्यान पढ़ाई से धीरे-धीरे हटता जा रहा था। पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में मानू की क्लास टीचर भूरी लोमड़ी ने भी उसकी शिकायत की, तो पापा का माथा ठनका। उन्होंने मानू को प्यार से समझाया। डांट लगाई और उसकी सहेलियों के उदाहरण भी दिए, मगर मानू के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
पूरा साल निकल गया। मानू अपने मोबाइल में ही घुसी रहती। अब तो उसने अपने घर के छोटे से बगीचे में जाना भी बंद कर दिया था। एक वक्त था जब उसने बड़े चाव से पास के जंगल वाली नर्सरी से तरह-तरह के पौधे लाकर उसे सजाया था। मानू का प्रकृति प्रेम याद आते ही पापा के होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। यों लग रहा था जैसे उन्हें अंधेरे में कोई रोशनी की किरण नजर आई हो।
‘मानू बेटा! अपना मोबाइल देना। तुम्हें एक जादू दिखाता हूं।’ पापा ने मानू को आवाज लगाई।
‘जी पापा।’ कहते हुए मानू अपना मोबाइल लेकर पापा के पास आई। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि पापा ने आज उसे मोबाइल को लेकर डांटा नहीं।
‘देखो! इसमें एक एप्प डाउनलोड करता हूं, इसका नाम है ‘प्लांट द ट्री’ पापा ने कहा।
‘अच्छा! क्या होता है इसमें?’ मानू ने उत्सुकता से पूछा।
‘इसमें हम एक बीज रोपेंगे। अगर मोबाइल को आधा घंटा हाथ नहीं लगाओ, तो इसमें एक छोटा-सा अंकुर निकलेगा।’ पापा ने मानू को समझाया।
‘क्या! सचमुच ऐसा होगा? और अगर एक घंटा हाथ नहीं लगाएं तो?’ मानू का आश्चर्य बढ़ता जा रहा था।
‘तो अंकुर बड़ा हो जाएगा और धीरे-धीरे वह बीज एक पेड़ बन जाएगा। फिर खूब सारे पेड़ मिल कर घना जंगल बन जाएगा।’ पापा ने प्यार से उसका सिर सहलाते हुए कहा।
पापा ने एप्प में बीज बोकर मोबाइल टेबल पर रख दिया। मानू को मोबाइल के बिना बेचैनी-सी हो रही थी। वह बार-बार टेबल की तरफ देखती और फिर बड़ी मुश्किल से अपने आप पर काबू पाती। आखिरकार उससे रहा नहीं गया और उसने मोबाइल उठा कर देख ही लिया। उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई जब उसने देखा कि एप्प में दो कोंपलों के साथ खड़ा एक नन्हा पौधा मुस्करा रहा है। उसके हाथ लगाने के बाद वह पौधा मुरझा गया। मानू को पौधा मुरझाते देख बड़ा दुख हुआ। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया कि इस बार वह पौधे को मुरझाने नहीं देगी। उसने फिर से एप्प में एक बीज बोया और फिर पूरा दिन मोबाइल को हाथ नहीं लगाया। इस वक्त में उसने गणित के सवाल हल किए, अंगरेजी के पाठ याद किए और अपना अधूरा होमवर्क पूरा किया। शाम को उसने देखा कि एप्प में चार पेड़ खड़े लहलहा रहे हैं।
अब तो मानू को पेड़ लगाने का चस्का लग गया। वह सुबह बीज लगा कर स्कूल जाती और रात को सोते समय मोबाइल देखती, तो एप्प में उसे कई सारे पेड़ दिखाई देते। कभी-कभी जब दो-तीन दिन तक मोबाइल को हाथ नहीं लगाती, तो वे पेड़ एक जंगल की शक्ल ले लेते थे। धीरे-धीरे उसका मोबाइल मोह कम होने लगा और वह वापस अपनी पढ़ाई की तरफ लौटने लगी। उसकी क्लास टीचर को भी उसमें बदलाव नजर आ रहा था। टीचर ने उसके पापा को फोन करके यह बात बताई तो पापा अपनी तरकीब कामयाब होते देख कर ठहाका लगा कर हंस पड़े।
उस दिन रविवार था। पापा चाय का कप लेकर बाहर बगीचे में बैठे थे तभी मानू ने आकर उनसे कहा- ‘पापा! देखिए न, कितने सारे गमले खाली पड़े हैं। हम आज शाम को नर्सरी से कुछ नए पौधे लेकर आएंगे।…’ पापा मुस्कुरा उठे।
