शिखर चंद जैन
महाराज सागरदत्त बूढ़े और निर्बल हो चुके थे। अब वे जल्दी से जल्दी अपने जुड़वां राजकुमारों लहरदत्त और पवनदत्त में से किसी एक को राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त कर देना चाहते थे। परीक्षा लेने के लिए सागरदत्त ने दोनों बेटों को दस-दस हजार स्वर्णमुद्राएं दीं और बोले, ‘तुम दोनों भाई अलग-अलग दिशाओं में जाओ और छह महीने बाद मैं जो काम बोलूं उन्हें करके लौटना। ध्यान रखना मुंह में हमेशा मिठास रहे, जहां भी जाओ वहां हर गांव में अपना घर हो और इस दौरान जिसे पैसा एक बार दे दो उससे मांगना मत। हां! इस बीच तुम किसी को अपना असली परिचय भी मत देना।’ दोनों भाई आज्ञाकारी, शिष्ट और सुशील थे। दोनों ने पिता के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद मांगा और उनसे धन की पोटली और अपने वस्त्र लेकर अपने-अपने घोड़ों पर सवार होकर अलग-अलग दिशाओं की ओर चल दिए। लहरदत्त ने चार घंटे बाद अपना पहला पड़ाव डाला तो पिता की आज्ञा के मुताबिक सबसे पहले कुछ मिठाइयां खरीद कर खार्इं। वह गांव के मुखिया से मिला और वहां एक मकान बनवाने की इच्छा जाहिर की। मुखिया ने उसे खाली जमीन दिला दी। महीनेभर लहरदत्त वहीं रुका। मन लगाने और कुछ पैसे कमाने के लिए उसने छोटा-मोटा व्यापार भी शुरू कर दिया। व्यापार को अनुभव तो था नहीं जो आता उसी व्यापारी को वह उधार में माल दे देता।
ज्यादातर लोग उसके पैसे देने नहीं आते लेकिन पिता के आदेश के मुताबिक वह किसी के पैसे मांगता नहीं था। उसके काफी पैसे डूब गए। फिर लहरदत्त आगे बढ़ा। इसी तरह जिस गांव में जाता, वहां आलीशान भवन बनवाता, व्यापार करता और खूब मिठाइयां खाता। देखते-देखते समय से पहले ही उसके पैसे खत्म हो गए।
जब एक पैसा भी हाथ न रहा तो उसने एक गांव के लोगों को अपना असली परिचय देते हुए कुछ धन उधार ले लिया और उसी से मकान बनवाया मिठाइयां खार्इं और व्यापार किया। किसी प्रकार छह महीने बीत गए। लहरदत्त राजधानी की ओर चल पड़ा।उधर पवनदत्त ने पूरी रात सफर किया। पौ फटते ही जिस गांव में उसने प्रवेश किया, वहां पहले एक तालाब किनारे स्नान आदि किया। फिर वहां के मुखिया से मिलकर उसने एक व्यापारी के रूप में परिचय दिया। वहां की मुख्य पैदावार, कारोबार, अच्छे और साख वाले व्यापारियों की जानकारी ली। फिर उसने मुखिया को प्रस्ताव दिया कि गांव में रहकर वह जो व्यापार करेगा, उससे होने वाले मुनाफे का पच्चीस फीसद गांव के विकास कार्यों व दीन हीन लोगों की मदद के लिए खर्च करेगा। मुखिया बहुत खुश हुआ। उसने बढ़-चढ़कर पवनदत्त का सहयोग किया। गांव के लोग भी पवनदत्त के मधुर व्यवहार और मीठी वाणी से बड़े प्रसन्न हुए। गांव का हर व्यक्ति ऐसे भले इंसान से अपने नजदीकी बढ़ाना चाहता था। पवनदत्त कभी किसी ग्रामीण के घर रहता तो कभी किसी व्यापारी के। मुखिया से मिली जानकारी के मुताबिक वह उन्हीं व्यापारियों को उधार में माल देता जिनसे पैसे मांगने की जरूरत नहीं पड़ती। वे वादे के मुताबिक तय समय सीमा में खुद ही पैसे लौटा देते थे। इसी तरह पवनदत्त ने छह महीनों में कम-से-कम सात आठ गांवों और उपनगरों की यात्राएं की। इस बीच उससे न सिर्फ ढेर सारा धन कमा लिया, बल्कि काफी लोकप्रियता भी हासिल कर ली। समय पूरा हुआ तो वह भी महल की ओर चल पड़ा।
दोनों एक साथ महल में पहुंचे। दरबार लगा हुआ था। महाराज सागरदत्त दोनों बेटों को देखकर बड़े प्रसन्न हुए। लहरदत्त काफी मोटा हो गया था। थका और निराश भी लग रहा था। जबकि पवनदत्त स्वस्थ और प्रसन्नचित्त था। लहरदत्त और पवनदत्त ने अपनी अपनी यात्रा का वृत्तांत बताया। पवनदत्त ने पिता को मूल धन के साथ साथ दस हजार स्वर्णमुद्राएं दीं तो वे प्रसन्न हो गए। दूसरी ओर लहरदत्त द्वारा दस हजार स्वर्णमुद्राओं का कर्ज लेने की बात सुनकर वे निराश हो गए। सागरदत्त ने भरे दरबार में पवनदत्त को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए कहा,‘मुझे अफसोस है लहरदत्त मेरी कसौटी पर खरा नहीं उतरा।
उसने न सिर्फ मेरी बातों का निहितार्थ समझने में भूल की, बल्कि अपना असली परिचय भी दे दिया। मुंह मीठा रखना यानी मीठी वाणी बोलना, हर गांव में घर बनाना यानी सबसे घुलमिल का परिचय बढ़ाना और पैसा वापस मत मांगना…से मेरा आशय था कि ऐसे लोगों से संपर्क बढ़ाना जो ईमानदार हों और पैसे मांगने की नौबत न आने दें। लेकिन लहरदत्त ने अपनी सूझबूझ का परिचय नहीं दिया। जबकि पवनदत्त ने उन्हीं बातों पर अमल करके नाम भी कमाया औ? दाम भी।’ ०

