शिखर चन्द्र जैन
जस्थान के मनोहरपुर राज्य में एक राजा था। राजा की उम्र बढ़ती जा रही थी, दाढ़ी के बाल सफेद हो चले थे। राजा को जवान बनने का फितूर चढ़ा। उसने मंत्री से कहा- हमें कोई जवान बना दे तो हम उसे अपनी आधी दौलत दे दें। मंत्री बुद्धिमान और व्यावहारिक था। उसने समझाया-महाराज! बुढ़ापा तो बेशकीमती रत्न है। उम्र के साथ-साथ परिपक्वता और बुद्धि भी बढ़ती है। युवावस्था तो कच्ची उम्र कहलाती है।फिर बुढापे से क्या डरना राजा नाराज होकर बोला-इसका मतलब तुम मुझे बूढ़ा रखना चाहते हो? तुम्हें कैसे पता कि बूढ़े बहुत बुद्धिमान होते हैं? क्या तुम प्रमाणित कर सकते हो कि बूढ़े बुद्धिमान होते हैं? मंत्री ने कहा-अवश्य महाराज, लेकिन मुझे कुछ समय की मोहलत चाहिए। राजा ने उसे समय दे दिया।
समय बीता। एक दिन राजा घूमने निकला। मंत्री और कई सेवक उसके साथ में थे। दोपहर का वक्त था। खेतों में बहुत से किसान काम कर रहे थे। तभी मंत्री ने इशारे से एकाली दाढ़ी वाले एक युवा किसान को बुलाया और कहा-राजा तुम्हारी दाढ़ी खरीदना चाहते हैं, अपनी दाढ़ी की कीमत बोलो।
किसान युवक ने हैरानी से राजा और मंत्री की ओर देखा। मंत्री ने फिर कहा-दाढ़ी के बदले सोने की दस मोहरें देंगे, बोलो मंजूर है? अचरज में डूबे युवक ने झट हामी भर दी। मंत्री ने कहा-कल सुबह दरबार में आ जाना। हम तुम्हारी दाढ़ी लेकर मोहरें दे देंगे।युवक के जाने के बाद राजा ने कहा-मैंने तो तुम्हें कभी अपने लिए दाढ़ी खरीदने को नहीं कहा? यह तो मैं बिना खर्च किए, अपनी ही बढ़ा सकता हूं…और फिर दूसरे की दाढ़ी मेरे क्या काम आएगी? मंत्री ने कहा-महाराज! आप जरा सब्र करें। आपने बुढ़ापे और जवानी की बात पर कुछ कहा था, मैंने तो जवाब दिया उसी को प्रमाणित करूंगा। कल मैं एक बूढ़े को भी महल में बुलाऊंगा।राजा ने कहा-ठीक है, पर बूढ़े व्यक्ति का चयन मैं अपनी मर्जी से करूंगा। मंत्री ने कहा- हां! पर शर्त यह है कि बूढ़े की दाढ़ी होनी चाहिए?
राजा ने वहीं एक पेड़ के नीचे एक बूढ़े को देखा और उसी को अगले दिन दोपहर बाद दरबार में आने को कह दिया। किसान नौजवान अगले दिन आया। राजा के हज्जाम ने उसकी दाढ़ी काट दी। युवक दस मुहरें लेकर खुशी-खुशी अपने घर लौट गया। युवक के जाने के बाद बूढ़ा आया। मंत्री ने उसे अपनी दाढ़ी की कीमत बताने को कहा। बूढ़ा सोच में पड़ गया, फिर बोला- श्रीमान जी! यह तो अनमोल है। इसकी कीमत कैसे लगाऊं। मेरे गांव के लोग मुझे दाढ़ी वाले बाबा के नाम से जानते हैं। मेरी तो पहचान ही नष्ट हो जाएगी। इसी दाढ़ी के कारण लोग बाबाजी समझ फल-मिठाई आदि भेजते रहते हैं। कोई भोजन भेज देता है, यही दाढ़ी कट गई तो मेरे भोजन का क्या होगा। दाढ़ी मैं हरगिज नहीं दे सकता। अपनी पहचान, सम्मान और भोजन की व्यवस्था की भला क्या कीमत लगाऊं?
मंत्री ने कहा- हजार स्वर्णमुद्राएं? बूढ़ा फिर भी तैयार न हुआ। अब तो राजा भी जोश में आ गया। उसने बूढ़े को दो हजार स्वर्णमुद्राएं देने को कह दिया। बूढ़े ने झुककर राजा को प्रणाम किया और बोला-महाराज! आप हमारे अन्नदाता हैं। भला आपका कहा कैसे टालूं? आपके लिए तो जीवन भी दे सकता हूं। फिर भला ये दाढ़ी क्या चीज है। चलिये आप दो हजार मोहरों के बदले मेरी दाढ़ी कटवा लीजिए। राजा ने सोचा था, बूढ़ा जिद्दी है, हां नहीं करेगा। पर बूढ़ा बेहद बुद्धिमान निकला। राजा को दो हजार स्वर्णमुद्राएं देनी पड़ गर्इं। भला दरबार में अपने कहे से कैसे मुकरता? बूढ़ा मोहरें लेकर चला गया। मंत्री ने राजा की ओर देखा। राजा बोला-मान गए। आप ही सही थे।

