चांद व माधुरी : संयुक्त चयन
हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में ‘चांद’ और ‘माधुरी’ पत्रिकाओं का अन्यतम स्थान है। ये दोनों पत्रिकाएं हिंदी की अत्यंत विशिष्ट और समादृत पत्रिकाएं थीं। ‘चांद’ का प्रकाशन नवंबर 1922 में इलाहाबाद से मासिक पत्रिका के रूप में शुरू हुआ। ‘माधुरी’ का प्रथम अंक अगस्त, 1921 में लखनऊ से निकला। समकालीन होते हुए भी दोनों पत्रिकाओं की दृष्टि, चेतना, सरोकार और उनके लेखकों में एक दिखने वाला फर्क है। माधुरी मुख्य रूप से साहित्य की पत्रिका है। इसके लेखों के विषय भी समाज, साहित्य, दर्शन, इतिहास, धर्म आदि हैं। राजनीति से इसने थोड़ी दूरी बना रखी थी। पर चांद की स्थिति इससे बिल्कुल उलट है। कुछ लेखकों के छद्म नाम हैं। रचनाएं बताती हैं कि लेखकों के लिए माधुरी प्राथमिकता पर थी, चांद नहीं। चांद मुख्य रूप से राजनीतिक या विद्रोही तेवरों वाली पत्रिका दिखती है। सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर उग्र, आक्रामक संपादकीय हैं।
इन दोनों पत्रिकाओं में उस समय के श्रेष्ठ रचनाकारों और विचारकों ने जीवन, समाज और राष्ट्रीय राजनीति के विभिन्न पक्षों के वृहद् जगत को अपनी रचनाओं के माध्यम से उद्घाटित किया। 1929 से 1933 ई. तक का कालखंड भी देश के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इस कालखंड में नई राष्ट्रीय चेतना और विदेशी शासन के विरुद्ध अदम्य संघर्ष भावना के साथ राजनीति, समाज, पूंजी भाषा और साहित्य की नई दिशाएं तय हो रही थीं। हिंदी भाषा और साहित्य की दृष्टि से भी कई स्तरों पर यह नवजागरण का युग था। इन दोनों पत्रिकाओं के विभिन्न अंकों से इस कालखंड की विलुप्त होती हुई महत्त्वपूर्ण, विविध और विपुुल सामग्री का चयन, साहित्य और इतिहास दोनों में समान गति और हस्तक्षेप रखने वाले, हमारे समय के अत्यंत प्रतिष्ठित और समादृत रचनाकार प्रियंवद ने किया है। उन्होंने कुल सात खंडों में, इन दोनों पत्रिकाओं से इस सामग्री का चयन करके, उसे सुरक्षित करने का महत्त्वपूर्ण काम किया है। यह ‘चांद’ और ‘माधुरी’ का संयुक्त चयन है। इस खंड की सामग्री में कुछ फुटकर, पर महत्त्वपूर्ण सामग्री है। कुछ स्तंभ, नाटक, दोहे, लेख और टिप्पणियां हैं। इस खंड में ‘दुबे जी की चिट्ठी’ तथा ‘जगतगुरु का फतवा’ दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्तंभों के साथ, तत्कालीन सिनेमा तथा रंगमंच की गतिविधियों का उल्लेख भी है। इसी के साथ तीन रंगमंच की गतिविधियों का उल्लेख भी है। इसी के साथ तीन महत्त्वपूर्ण परिशिष्ट दिए गए हैं। एक में ‘चांद’ द्वारा प्रकाशित ‘भारत में अंग्रेजी राज’ पुस्तक की जब्ती से संबंधित दस्तावेज हैं। परिशिष्ट दो और तीन में क्रमश: ‘माधुरी’ और ‘चांद’ की उस सामग्री का उल्लेख है, जिसे इस चयन में छोड़ दिया गया है।
चांद व माधुरी : संयुक्त चयन, चयनकर्ता व संपादक- प्रियंवद; वाग्देवी प्रकाशन (रजा फाउंडेशन का सहयोग), विनायक शिखर, पॉलिटेक्नीक कॉलेज के पास, बीकानेर; 480 रुपए।
आकाश में देह
घनश्याम कुमार देवांश का यह पहला संग्रह है। यह कवियों और कविताओं के शोर का दौर है। यहां हर व्यक्ति और हर कविता महत्त्वपूर्ण है। ऐसे में लोगों और कविताओं की भीड़ में यह संग्रह एक धीमा संगीत है। यह संग्रह एक ऐसे कवि का पहला कदम है, जो चमकती हुई पत्रिकाओं और उससे भी ज्यादा चमकते हुए कवि परिवार (परंपरा) से नहीं आता। देवांश इस परंपरा की निषेध की आवाज हैं। यह आवाज किसी विरोध या समर्थन में नारे नहीं लगाती। बस एक कविता की शक्ल में आपके सामने आ खड़ी होती है। यह दौर चिल्ला-चिल्ला कर कहने वालों के बीच अपनी बात सधे हुए शब्दों के साथ आराम से रखने का है। देवांश का कवि यह करता है। उसे जल्दी या हड़बड़ी नहीं है, इसलिए वह छपने के प्रयास में कम, लिखने के प्रयास में ज्यादा लगा रहता है। इसलिए देवांश की कविताएं पत्रिकाओं में देखने को बहुत कम मिलती हैं। दिल्ली में रहते हुए दो-दो साल तक किसी पत्रिका या गोष्ठी में हम उन्हें न देख पाएं तो कोई अचरज नहीं। कवि का काम ही होता है अपनी रचनात्मकता से पाठकों को अचरज मे डालना। देवांश की कविताएं और उनके कवि रूप से आपका परिचय अचरज से भरे हुए सुख का होगा, इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है। उम्र के इस पड़ाव में प्रेम, बेरोजगारी और आक्रोश के बारे में कवि ज्यादा कविताएं लिखते हैं। देवांश उसे ज्यादा ‘ब्रेकअप’, ‘नौकरी’ और ‘मालिकों’ के बारे में कलात्मक रचनात्मकता के साथ सामने आते हैं, इसलिए यह निजता सार्वजनिकता में बदल जाती है। यह एक नई चीज है। आगे इसका विस्तार देखने को मिलेगा, ऐसी एक संभावना यहां है। बच्चों से लेकर आकाश तक को अपने में समेटे हुए यह संग्रह देर तक आपके साथ बना रहता है, धीमे बजते हुए राग की तरह। यही इसकी उपलब्धि है।
आकाश में देह : घनश्याम कुमार देवांश; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 230 रुपए।
त्रेता : एक सम्यक मूल्यांकन
कवि उद्भ्रांत का बहुचर्चित महाकाव्य है ‘त्रेता’, जिसमें त्रेतायुगीन राम और रावण के परिवार की महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और पारिवारिक जीवन का उदात्तभाव से काव्य के रूप में वर्णन किया गया है। यह महाकाव्य संस्कृत के महान आचार्यों की विभिन्न साहित्यिक अवधारणाओं का अद्वितीय उदाहरण है, जिसमें जगह-जगह पर रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति, अलंकार सभी सिद्धांतों का सम्मिश्रण देखने को मिलता है, यानी भरत मुनि, आनंदवर्द्धन, कुंतक, वामन, भामह के काव्य-हेतु, काव्य-प्रयोजन, काव्य-लक्षण की कसौटी पर यह महाकाव्य खरा उतरता है। यही नहीं, पाश्चात्य आलोचकों में लोंजाइनस के उदात्तवाद सिद्धांत और टीएस ईलियट के परंपरावाद और निर्वैक्तिकता का पुट भी इस महाकाव्य में है। पाठक त्रेतायुगीन पात्रों के भावों को देशकाल से परे जाकर रस के साधारणीकरण क्रिया द्वारा अपने स्थायी भावों, अनुभावों और संचारी भावों से निर्वैयक्तिक होकर उनके सुख-दुख की हिलोरें खाता नजर आता है। अरस्तू का त्रासदी विरेचन सिद्धांत से भी यह काव्य प्रबावित है। राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा, वन निष्कासन और शंबूक की हत्या आदि ऐसे प्रकरण हैं, जो पाठकों के मन में करुणा का भाव पैदा करते हैं। ‘त्रेता’ महाकाव्य की विशेषताओं में विषय-वस्तु की भव्यता, अलंकारयुक्त भाषा का प्रयोग, विषय-शैली, मनोवेगों की तीव्रता, रचना-विधान आदि शामिल हैं, जो लोंजाइनस के उदात्तवाद की कसौटियां हैं, यह महाकाव्य इलियट की साहित्यिक अवधारणाओं के अनुरूप भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के मूल पात्रों को अंतर्वस्तु बना कर व्यक्तिगत के माध्यम से समष्टिगत की अभिव्यक्ति करता है। यहां कवि उद्भ्रांत ने एक मौलिक चरित्र ‘शंबूक की मां’ का भी निर्माण किया है, जो आधुनिक परिप्रेक्ष्य में त्रेताकालीन सामाजिक व्यवस्थाओं पर कई सवालिया निशान खड़े करता है। दिनेश कुमार माली ने ‘त्रेता’ पर काम करने में दो वर्ष से अधिक समय लगाया। इस विशाल महाकाव्य पर आलोचना ग्रंथ की रचना करना सहज नहीं था। इसके लिए उन्हें पूर्ववर्ती आलोचकों की पुस्तकों का भी अध्ययन करना पड़ा, जिनमें डॉक्टर आनंद प्रकाश दीक्षित की ‘त्रेता: एक अंतर्यात्रा, कंवल भारती की ‘त्रेता-विमर्श और दलित-चिंतन’ आदि हैं।
त्रेता : एक सम्यक मूल्यांकन : दिनेश कुमार माली; यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 495 रुपए।

