विमल कुमार
इस वर्ष हिंदी नवजागरण के दो अग्रदूतों- महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य शिवपूजन सहाय की सवा सौवीं जयंती है। भारतेंदु और महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जिस हिंदी नवजागरण का सूत्रपात किया था, उसे राहुल जी और शिवपूजन जी ने हिंदी वांग्मय का स्वरूप प्रदान किया था। यह भी संयोग है कि दोनों का जन्म एक ही वर्ष 1893 में हुआ था और निधन भी एक ही वर्ष 1963 में हुआ। इस तरह दोनों ने लगभग एक ही आयु पाई थी। राहुल जी कम्युनिस्ट थे और शिवपूजन जी गांधीवादी, लेकिन दोनों की मित्रता में कभी विचारधारा आड़े नहीं आई। राहुल जी ने शिवपूजन जी को लिखे एक पत्र में उनके सोवियत प्रेम का भी जिक्र किया है। यह हिंदी साहित्य का वास्तविक जनतंत्र है, क्योंकि दोनों आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। राहुल जी जेल जाकर, तो शिवपूजन जी ने सरकारी स्कूल की नौकरी से त्यागपत्र देकर। दोनों के लिए देश की जनता महत्त्वपूर्ण थी और राष्ट्र की परिकल्पना में लोक केंद्र में था।
दोनों हिंदी के सवाल पर एक थे। हिंदी, हिंदुस्तानी के विवाद में दोनों हिंदी के साथ डट कर खड़े थे। राहुल जी तो भाषा के सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी से निकाल दिए गए, लेकिन बाद में वे फिर उसमें शामिल भी हुए, क्योंकि उनकी प्रतिबद्धता गहरी थी। लेकिन भाषा और लोक के अलावा जो चीज दोनों को जोड़ती थी वह है हिंदी को ज्ञान विज्ञान, शोध, कोश, इतिहास से समृद्ध करने का संकल्प और परंपरा तथा संस्कृति से नाता जोड़ने का मानस। दरअसल, राहुल जी और शिवपूजन जी दोनों रूढ़ अर्थों में न तो मार्क्सवादी थे और न ही गांधीवादी। राहुल जी मार्क्सवाद के रास्ते होते हुए धर्म, परंपरा, संस्कृति, भाषा और सभ्यता के सवालों से टकराते थे और उनमें आज के वामपंथियों की तरह संकीर्णता भी नहीं थी। वे डॉ राजेंद्र प्रसाद के साथ एक मंच से किसानसभा को संबोधित करते थे, तो स्वामी सहजानंद सरस्वती और रामबृक्ष बेनीपुरी के साथ किसानों के लिए लड़ते थे। शिवपूजन जी गांधीवाद के रास्ते होते हुए उसी लोक तक पहुंचते थे और गांव तथा किसान से खुद को जोड़े रखते थे। यही कारण है कि उनके 1926 में छपे उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का भोलानाथ और ‘कहानी के प्लाट’ की पात्र भगजोगिनी उस किसान जीवन के दुख-दर्द का बयान करते हैं, जो बाद में ‘गोदान’ में एक बड़े फलक पर उस पीड़ा को धनिया और होरी व्यक्त करते हैं।
गौरतलब है कि शिवपूजन जी की ये रचनाएं ‘गोदान’ से करीब दस वर्ष पहले की हैं, लेकिन शिवपूजन जी ने सृजन का रास्ता छोड़ कर साहित्य सेवा का रास्ता अपना लिया। वह भी मौन रह कर। शायद यही कारण है कि उन्हें हिंदी का दधीचि, अजातशत्रु और ऋषि तक कहा गया। निराला ने उन्हें हिंदी भूषण की संज्ञा दी। रामबृक्ष बेनीपुरी ने उन्हें साहित्यिक पिता बताया था।
दरअसल, महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद जिस व्यक्ति ने संपूर्ण हिंदी जगत को अपना घर-परिवार बना कर हिंदी की अहर्निश सेवा की थी, वे शिवपूजन जी ही थे, क्योंकि द्विवेदी जी की तरह वे भी हिंदी को समृद्ध करना चाहते थे। शिवपूजन जी के लिए आराध्य द्विवेदी जी ही थे। यही कारण है कि द्विवेदी जी पर अभिनंदन ग्रंथ निकालने का प्रस्ताव शिवपूजन जी का ही था, जिसे काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने स्वीकार किया। इस कार्य के लिए वे बनारस से इलाहबाद के इंडियन प्रेस का चक्कर लगते रहे और इस काम के लिए बाबू श्यामसुंदर दास ने उन्हें रेलवे का एक मासिक पास भी बनवा दिया था, लेकिन अभिनंदन गं्रथ में उनका न तो लेख गया और न ही नाम। परदे के पीछे बने रहने की उनकी प्रवृत्ति के कारण उन्हें उतना यश नहीं मिला, जितने के वे अधिकारी थे। मगर उस जमाने में प्रेमचंद से लेकर प्रसाद तक उनसे विशेष लगाव रखते थे। उनकी रचनाओं का संपादन-संशोधन करने का श्रेय भी उनको जाता है। जब शिवपूजन जी को मैट्रिक पास होने के बावजूद हिंदी का प्राध्यापक बनाया गया, तो रामचंद्र शुक्ल और बाबू श्यामसुंदर दास द्वारा दिए गए प्रमाणपत्र ही उनकी योग्यता के सबूत माने गए। हिंदी में शायद ही किसी मैट्रिक पास को कॉलेज का प्राध्यापक बनाया गया, लेकिन नियमों में यह छूट केवल शिवपूजन सहाय को मिली। दरअसल, उनके व्यक्तित्व की विनम्रता, सरलता और सदाशयता ने उनकी छवि को निरीह बना दिया, जिससे वे साहित्य की आपाधापी से दूर रहे। बनारसीदास चतुर्वेदी ने, जिनका उन दिनों साहित्य में बहुत डंका बजता था, एक पत्र में स्वीकार किया है कि आपका योगदान मुझसे अधिक बड़ा है, लेकिन उतना प्रचार आपको नहीं मिला। मगर यह हादसा औरों के साथ भी हुआ। खुद प्रेमचंद को मंगला प्रसाद पारितोषिक नहीं मिला, जो उस जमाने का ज्ञानपीठ पुरस्कार माना जाता था और न वे कभी हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति नहीं बनाए गए। पर बाद में प्रेमचंद को बहुत ख्याति मिली। राहुल जी और शिवपूजन जी के अवदान को आजादी के बाद रेखांकित किया गया और दोनों को 1960 में जयप्रकाश नारायण के साथ मानद डीलिट मिली और दोनों पद्म भूषण से सम्मानित किए गए।
पर धीरे-धीरे दोनों विस्मृत होते गए और नई पीढ़ी का उनसे उतना संवाद नहीं बना, क्योंकि वर्षों तक दोनों की सारी पुस्तकें उपलब्ध नहीं थीं। 1993 में दोनों की जन्मशती के मौके पर हिंदी समाज का ध्यान उनके अवदान की तरफ गया। फिर दोनों की रचनाओं के समग्र और वांग्मय सामने आए, जिससे उनके विशाल योगदान का पता चला।
राहुल जी केवल लेखक नहीं थे। वे साहित्य और हिंदी के कार्यकर्ता, आंदोलनकारी तथा स्वंत्रता सेनानी भी थे। प्रेमचंद, निराला और प्रसाद की तरह उनका लेखकीय व्यक्तिव विरल था, लेकिन हिंदी में वे अब तक अपने यात्रा संस्मरणों और ‘वोल्गा से गंगा तक’ तथा ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ के लेखक के रूप में जाने जाते रहे, पर उनका योगदान इससे बड़ा और बहुआयामी भी है। राहुल जी जैसा एक्टिविस्ट लेखक फिर नहीं मिला हिंदी को। विश्व के अनेक देशों की यात्रा करने वाले राहुल जी हिंदी के पहले लेखक थे। इतना ही नहीं, वे अपनी विद्वत्ता के कारण पचास के दशक में श्रीलंका और रूस में अतिथि प्रोफसर भी रहे। इस मायने में वे हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने वाले हिंदी के पहले लेखक थे, जो प्रभाकर माचवे के शब्दों में तीस-बत्तीस भाषाएं जनते थे।
शिवपूजन जी ने राहुल की चार किताबें भी छापी थीं, जिनमें ‘सरहपा कोष’, ‘दखिनी हिंदी काव्यधारा’ और ‘मध्यशिया का इतिहास’ शामिल हैं। राहुल जी चाहते थे कि नई चेतना फैलाने के लिए जनता का लेखन करना और जनता से जुड़ना भी जरूरी है। इस मायने में वे प्रेमचंद, निराला से आगे रहेशिवपूजन जी का व्यक्तित्व अलग है। ‘मतवाला’ के अग्रलेखों में उनके व्यक्तित्व की अलग छाप मिलती है। वे अंगरेजी हुकूमत पर कड़ा प्रहार करते हैं। तब लगता ही नहीं कि ये वही शिवपूजन जी हैं, जो निरीह नजर आते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने समय का सारा विष अंदर ही पी लिया था। उनके गद्य लेखन के भी कई रूप हैं। उनके लिए हिंदी की सेवा ही राष्ट्र की सेवा रही, लेकिन राहुल जी राजनीतिक संघर्ष में यकीन करते थे। आजादी की लड़ाई में जेल जाने और किसान आंदोलन में भाग लेने वाले विरल लेखक थे। बाद में उसी रास्ते पर बाद में बेनीपुरी जी भी चले थे, हालांकि वे समाजवादी थे। राहुल जी और शिवपूजन जी की मित्रता इस बात का प्रमाण है कि हिंदी नवजागरण का एक रंग, एक रूप नहीं था। उसमें कई धाराएं थी। एक धारा प्रगतिशीलों की थी, तो एक राष्ट्रवादियों की धारा थी, लेकिन उसमें आज की तरह सांप्रदायिकता नहीं थी, हालांकि उस दौर में हिंदू महासभा और मुसलिम लीग की राजनीति जरूर सांप्रदायिक थी। मगर हिंदी का कोई बड़ा लेखक इस राजनीति का पक्षधर नहीं था और यही कारण है कि राहुल जी और शिवपूजन जी समेत सभी लेखकों ने गांधीजी की हत्या की भर्त्सना की थी। हिंदी नवजागरण के इस भाव को भी समझे जाने की जरूरत है। ०

