मोनिका शर्मा
हाल ही में उच्चत्तम न्यायालय के जज न्यायमूर्ति एके सीकरी ने महिलाओं से जुड़े एक संवेदनशील और अहम विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि बच्चे को जन्म देना, गर्भपात कराना या गर्भावस्था रोकना वगैरह के बारे में फैसला लेने का अधिकार महिला का है। न्यायमूर्ति सीकरी के मुताबिक मातृत्व से जुड़े सभी निर्णय करना महिला की अपनी पसंद पर है। यह उसका अधिकार है। उन्होंने कहा कि प्रजनन अधिकार वास्तव में मानवाधिकार है और यह इंसान के मान-सम्मान से जुड़ा है। उनका कहना था कि भारतीय परिवारों में कब बच्चा हो, यह पति की पसंद या बुजुर्गों के कहने पर होता है। साथ ही यह भी कि बच्चा लड़का हो या लड़की, यह भी वही तय करते हैं। न्यायमूर्ति के ने कहा कि जब हम समानता की बात करते हैं तब महिला को अपने साथी के साथ मिलकर फैसला लेने का अधिकार होना चाहिए। देश में जब प्रजनन अधिकारों की बात होती है तो हम पाते हैं कि इसका चुनाव करने का अधिकार महिला के पास कम ही होता है। आश्चर्य है कि इक्कीसवीं शताब्दी में भी हम महिलाओं को इंसानी हक दिलाने में सक्षम नहीं हो सके, जबकि महिलाओं को ही शरीर रचना विज्ञान के हिसाब से इस पूरी प्रक्रिया से गुजरना होता है।
दरअसल, हमारे पारिवारिक-सामाजिक ढांचे में आज भी कई ऐसे अनकहे नियम मौजूद हैं जो महिलाओं से उनका यह मानवीय हक छीन रहे हैं। आज भी हमारे यहां गांव से लेकर शहरों तक, कई परिवारों में महिलाओं की शारीरिक सेहत और आयु वर्ग की अनदेखी करते हुए उन्हें मां बनने की नसीहत दी जाती है। बेटे की चाहत में बार-बार गर्भपात करवाने या महिला के न चाहते हुए भी कई बच्चों की मां बनने का दबाव बनाया जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मातृत्व या मां बनना एक औरत के जीवन का सबसे सुखद चरण है। पर सच यह भी है कि यही उनके जीवन सबसे जटिल चरण भी है। यही वजह है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की स्थिति बहुत जोखिम भरी होती है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में कई तरह के मनोवैज्ञानिक और शारीरिक कारक समस्याएं पैदा करते हैं। मां बनने की प्रक्रिया में महिला के शरीर में काफी परिवर्तन होते हैं और इस दौरान उसकी जरूरतें भी आम महिला से अलग हो जाती है। निसंदेह, परिवार के दबाव में आकर किसी महिला का मातृत्व को चुनना इन तकलीफों में और इजाफा ही करता है ।
बीते कुछ सालों में हमारे हर यहां हर क्षेत्र में महिलाओं का दखल बढ़ा है। उनका एक बड़ा प्रतिशत आज शिक्षित और आत्मनिर्भर है। संगठित ही नहीं असंगठित क्षेत्रों में भी महिला कामगारों की एक बड़ी संख्या कार्यरत है। ऐसे में सुरक्षित और सुखी मातृत्व चुनने का हक उनके हिस्से आना ही चाहिए। भारत में कृषि मजदूरी, घरेलू सेविकाओं और निर्माण क्षेत्र में महिला मजदूरों का बड़ा वर्ग कार्यशील है। ये महिलाएं परिवारजनों के दबाव में कभी बेटे को जन्म देने के लिए तो कभी बुजुर्गों की इच्छा पूरी करने के नाम पर बार-बार मां बनने को विवश की जाती हैं। शिक्षित परिवारों में भी यही हाल देखने को मिलता है। लेकिन विचारणीय यह भी है कि हमारे यहां प्रसव से जुड़ी परेशानियां इतनी हैं कि केवल बच्चे को जन्म देते समय ही तमाम महिलाएं
अपने जीवन से हाथ धो बैठती हैं। गर्भधारण के बाद सही पोषण, स्वास्थ्य देखभाल की उचित सलाह और टीकाकरण के अभाव में भी स्त्रियां अपनी जान गंवाती हैं। सुरक्षित प्रसव और सेहतमंद मातृत्व बड़ी चुनौती है। परिवारजनों का दबाव सहते हुए मां बनना महिलाओं के लिए कष्टदायक है। यही वजह है कि मातृत्व के चुनाव को लेकर महिलाओं के निर्णय को प्राथमिकता दिए जाने की बात हमारे यहां लंबे समय से बहस का विषय बनी हुई है। यह एक कटु सच है कि जीवन देने वाली महिलाओं को ही मातृत्व की प्रक्रिया के दौरान न केवल कई रोगों की शिकार होने बल्कि मृत्यु का भी सबसे अधिक खतरा रहता है। बार-बार मां बनना, कुपोषण, असुरक्षित गर्भपात और कम उम्र में मां बनना जैसे कई कारण हमारे यहां न केवल महिलाओं के गिरते स्वास्थ्य बल्कि शिशु और मां की मृत्यु के आंकड़े बढ़ाने के लिए भी जिम्मेदार है। विश्व भर में प्रति वर्ष ढाई लाख महिलाएं गर्भाशय के कैंसर के कारण मृत्यु का शिकार होती हैं। इनमें से अधिकांश विकासशील देशों की हैं। बीते कुछ बरसों में भारत में हालात बेहतर हुए हैं, फिर भी मांओं की सुरक्षा और जीवन रक्षा के मामले में भारत अब भी विकसित देशों से बहुत पीछे है। भारत में हर एक लाख प्रसवों में 407 मांएं मौत के मुंह में समा जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में दुनिया भर में प्रसव और गर्भधारण की जटिलताओं के चलते करीब पौने तीन लाख महिलाओं ने अपनी जान गंवाई। जिनमें से एक तिहाई मौतें नाईजीरिया और भारत में हुई हैं। अफसोसनाक ही है कि भारत में हर साल एक लाख से अधिक महिलाओं का गर्भावस्था संबधी कारणों से मरना जारी है। ये आंकड़े केवल संख्या भर नहीं हैं, बल्कि देश में आधी आबादी की उस तस्वीर को दिखाते हैं जो दुर्भाग्यपूर्ण है। मातृत्व को जीने के पहले ही स्त्रियों का यो काल कवलित हो जाना सरकार और समाज दोनों के लिए चिंतनीय है।
ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि मातृत्व के चुनाव को लेकर फैसला करने का यह मानवीय अधिकार अब तक स्त्रियों के हिस्से क्यों नहीं आया है? साथ ही, बदलते समय में भी हमारे यहां परिवार की भूमिका सहयोग भरा न होना भी एक बड़ा सवाल है। लैंगिक स्वास्थ्य के हालात हमारे यहां आज भी बेहद चिंतनीय हैं। क्योंकि संस्थागत प्रसव और सुरक्षित मातृत्व महिलाओं के हिस्से नहीं आया है। भारत आज भी अपनी महिला नागरिकों को संस्थागत प्रसव और सुरक्षित मातृत्व देने में बहुत पीछे है। राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक हमारे यहां संस्थागत प्रसव का राष्ट्रीय औसत इकतालीस फीसद है। देश में केरल में सौ फीसद संस्थागत प्रसव होते हैं तो नगालैंड में केवल बारह प्रतिशत। हरियाणा 39 फीसद, राजस्थान 32 फीसद, मध्य प्रदेश 30 प्रतिशत, बिहार और उत्तर प्रदेश 22 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 16 फीसद संस्थागत प्रसव होते हैं। देश एक कई हिस्सों में आज भी प्रसव से जुड़ी जटिलताएं, कुपोषण और संसाधनों की कमी बड़ी समस्या बनी हुई है।
आंकड़े बताते हैं कि उचित खानपान नहीं मिलने के कारण देश में करीब तैंतीस प्रतिशत महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं। गरीब तबके की महिलाओं में कुपोषण के ये हालात और भी तकलीफदेह हैं। विशेषकर गर्भावस्था में तो पोषण की कमी कई बार जानलेवा साबित होती है। यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मातृत्व मृत्यु दर का एक बड़ा कारण कुपोषण ही है। ऐसे में अपनी सेहत और परिस्थितियों के देखते हुए मां बनने का फैसला करने का हक स्त्रियों के पास ही होना चाहिए । क्योंकि गर्भधारण के निर्णय को लेकर महिलाओं को मानवीय हक मिलने का सीधा संबंध उनके सशक्त और सेहतमंद होने से है। समर्थ और स्वस्थ जननी देश,समाज और परिवार की रीढ़ होती है। इसीलिए उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य सरकार ही नहीं परिवारजनों की प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। सरकारी योजनाओं के साथ ही समाज और परिवार की मानसिकता और व्यवहार में आए सकारात्मक और समझ भरे बदलाव से ही देश के हर हिस्से, हर तबके की महिलाओं को सुरक्षित मातृत्व का हक मिल सकता है। जो उनके सबलीकरण में भी अहम भागीदारी निभा सकता है । ०
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