रमेश चंद मीणा
आदिवासी सदियों से पढ़ाई-लिखाई से वंचित रहा है। लेकिन, आज तब हम इक्कीसवीं सदी में पहुंच गए हैं और चारों ओर पढ़ने-पढ़ाने का जोर है, तब भी उसकी स्थिति में सुधार न होना घोर चिंता का विषय है। शिक्षा बिना आदिवासी अब भी अंधेरे में हैं। कहने के लिए आदिवासी क्षेत्रों में स्कूल तो हैं, मगर वे महज कागजों पर हैं। उनके लिए परियोजनाएं हैं, लेकिन उनका लाभ बिचौलिए खा रहे हैं। आदिवासियों ने आजादी से पहले और बाद में भी देश की अपरिमित सेवा की है। इसके बदले उन्हें मिलता है विस्थापन, बेदखली और गोली। उनके क्षेत्र में बांध हैं, मगर फायदा कोई और उठाता है। सिंचाई कहीं और होती है। डूब उनके इलाके में आती है। समस्या का समाधान इस तरह से किया जा रहा है कि वे अपने अस्तित्व ही नहीं बचा पा रहे हैं।
लोकतांत्रिक समाधान संवाद से ही हो सकता है। इसमें पढ़ाई-लिखाई की बहुत जरूरत है। ज्ञान देने की जो आज स्थिति बनी हुई है, वह बेहद लचर और बाबा आदम के काल की है। अंग्रेजों से भी पीछे की ठहरती है। बिना उन्हें समझे, शिक्षित नहीं किया जा सकता। आज भी अंडमानी आदिवासी हर तरह की शिक्षा से दूर हैं क्यों? अगर बस्तर के आदिवासी को पढ़ाया जाएगा तो उनके पाठ्यक्रम में उनका परिवेश चाहिए। विकास से पहले उन्हें समग्र शिक्षा से जोड़े जाने की जरूरत हैं। शिक्षित किए बगैर उनके लिए विकास की योजनाएं उनका विनाश करती जा रही हैं। आदिवासियों की परेशानियों को समझने की जरूरत है। उन पर हर चीज थोप दी जाती रही है। आदिवासियों को ऐसा प्रस्तुत किया जाता है मानो वे विकास विरोधी हों। उन्हें समझने में आदिवासी साहित्य बड़ी भूमिका निभा सकता है। सरकारें अभी तक आदिवासियों को दबाने, हटाने और नष्ट करने का काम ही करती रही हैं। जरूरत है कि आदिवासी को उपयोगी माना जाए। सोचने की बात है कि वे पुराणों से भी पुराने हैं। सामाजिक और मानवीय मूल्य और पयार्वारण की चेतना से संपन्न ऐसे समुदाय हैं वे, जो समूची मानवता को मनुष्यता का पाठ पढ़ाने की कुव्बत रखते हैं। सच यह है कि वे हंै, तो जंगल है, पहाड़ और नदियां है। हकीकत यह है कि उन्हें नष्ट करने से आज जंगल और पहाड़ बर्बाद हो रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ कि हमारी नीतियों में खोट है और दूरदृष्टि का अभाव है।
आदिवासी को समझने में महाश्वेता देवी ने पूरी जिंदगी लगा दी है। इस वैश्वीकरण के युग में तो उन्हें और नजरअंदाज किया जा रहा है। आखिर क्या वजह है कि किसान और आदिवासी लगातार हाशिए पर चले जा रहे हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं और आदिवासी विस्थापित हो रहे हैं। इस विकास को केवल खास आदमियों से प्रेम है। हमारी सरकारें चहुंमुखी विकास के लिए बड़ी-बड़ी परियोजनाएं ला रही हैं, मगर उन्हें यह ध्यान नहीं है कि इससे आदिवासियों का जो विनाश हुआ है, उसकी भरपाई कैसे होगी?सरकारों को विकास के लिए बड़े-बड़े बांध चाहिए। टिहरी, नर्मदा, गढ़वाल, हरसूद और मणिबेली में रहने वाले गांववासी और आदिवासी के विस्थापन से उन्हें किसी तरह का लेना-देना नहीं रहा। आदिवासियों को एक ही झटके में अपनी मूल जमीन से बेदखल कर देना कितना पीड़ादायी है? इसका अनुमान तब तक नहीं लगाया जा सकता जब तक आदिवासी की मूलभावना नहीं समझी जाएगी।
यह भी सवाल पूछा जाना चाहिए कि असभ्य कौन है? वक्त को समझने का दावा करने वाले कितने गलत साबित हो रहे हैं? यह कुछ सालों पीछे नजर डालने पर पता चल जाता है। जो प्रकृति के रक्षक हैं, उन्हें तबाह किया जा रहा है। जो प्रकृति को वास्तव में नष्ट कर रहे हैं उन्हें सभ्य बताया जा रहा है। जो कथितरूप से बड़े सोच वाले हैं, उनकी असलियत खुल चुकी है। असल बात यह है कि आदिवासी हैं तो प्रकृति है, जंगल है, पहाड़ है।
विनोद कुमार शुक्ल अपनी एक कविता में कहते हैं, ‘जंगल उनका है जो जंगल के सबसे अधिक नजदीक है।’ यह साबित हो चुका है कि जंगल के रक्षक वही है, वही हो सकते हैं। उन्हें नजरअंदाज करना बड़ी भूल साबित होने वाली है। आदिवासी साहित्य पर गौर करना जरूरी है,क्योंकि वह बड़े संकट की तरफ भरपूर इशारा कर रहा है। इन्हें ठहरकर समझने की जरूरत है। आदिवासियों की जिजीविषा ही है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उनका वजूद बचाए हुए है। छोटा और कमजोर समझकर जिन्हें नकार दिया गया है, वे संविधान द्वारा संरक्षित हैं। फिर भी सुरक्षित नहीं है। यह सत्ताधारियों की गलती ही कही जाएगी कि आदिवासी समाज समस्याओं से उबर नहीं पा रहा है। आदिवासी, जो कम से कम में गुजारा कर रहा है, उससे उसका पहाड़, जंगल और जमीन छीनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी। आदिवासी सबसे अधिक पर्यावरण प्रेमी हैं। यह सिद्ध हो चुका है। वे स्वभावत: संतोषी, संयमी और दूसरों का कम से कम नुकसान करने वाले लोग हैं। इसके बावजूद वे बस्तर में गोलियों के शिकार हो रहे हैं तो दूसरी तमाम जगहों पर विस्थापन के।
क्या कारण है कि संविधान ने जिन्हें संरक्षित कर रखा है, वे तिल-तिल मरने को मजबूर हैं। उनकी गरीबी और अशिक्षा जाने का नाम नहीं ले रही है। आरक्षण के बावजूद शिक्षा के प्रकाश से सबसे अधिक दूर यही वर्ग ठहरता है। जब कभी विकास की बात आती है तो आदिवासी से उसका घर, जमीन और जंगल बेखौफ छीन लिया जाता है। दूसरों के हित के लिए बनने वाले बांध में अगर कोई डूबता है तो वह आदिवासी और इस देश का गरीब मूक किसान ही है। ‘डूब’ आदिवासी अर्थ में विचारणीय शब्द है। जिस पर कविता और साहित्य रचा जा रहा है, जिसकी गूंज राजनीतिक गलियारों में अनसुनी की जा रही है, नीति नियंताओं के कानों तक शायद नहीं पहुंच पा रही है। जब कभी आदिवासी के मुद्दों पर जांच समितियां या आयोग आदि बिठाए जाते हैं तो उसकी रिपोर्ट सरकारों को भेजी जाती है, लेकिन अंत तक सब कुछ रद्दी की टोकरी में चला जाता है। जिसे ढंग से पढ़ा ही नहीं जाता, उस पर कार्यवाही क्या होगी?

