छोटे परदे को अपने देश में आए आज पांच-दशक हो रहे हैं, लेकिन जो बदलाव हमने पिछले साढ़े तीन दशकों देखे हैं, वह किसी अजूब से कम नहीं है। राष्ट्रीय प्रसारक के रूप में पंद्रह अगस्त 1982 से अपना नियमित कार्य प्रारंभ करने वाले ‘दूरदर्शन’ का वास्तविक चेहरा 1984 से देखने को मिला। इसी वर्ष टेलीविजन पर पहला धारावाहिक ‘हम लोग’ का प्रसारण शुरू हुआ। निर्माता-निर्देशक पी कुमार वासुदेव ने भारतीय दर्शकों को पहली बार धारावाहिक देखने का चस्का लगाया। वैसे भी, इस धारावाहिक में कोई बड़े और नामी कलाकार नहीं थे, फिर भी यह धारावाहिक उस समय का सर्वाधिक हिट साबित हुआ था। इससे पहली बार हिंदी सिनेमा के बड़े कलाकार दादामुनि अशोक कुमार ने दूरदर्शन पर बतौर सूत्रधार पदार्पण किया। काले कोट- टाई और काले चश्मे में अशोक कुमार की संवाद अदाएगी पूरी धारावाहिक की यूएसपी बन गई थी। इसी के साथ दूरदर्शन पर एक अन्य हास्य धारावाहिक भी शुरू हुआ-ये जो है जिंदगी। निर्माता -निर्देशक मंजुल सिन्हा के इस धारावाहिक में कहने को तो शफी इनामदार, स्वरूप संपत, राकेश बेदी और टीकू तलसानिया जैसे कलाकार थे लेकिन पार्श्व गायक किशोर कुमार का गाया शीर्षक गीत उन दिनों बेहद लोकप्रिय हुआ था।
धीरे-धीरे दूरदर्शन की बढ़ती लोकप्रियता ने कई बड़े फिल्मकारों को इस माध्यम से जोड़ लिया। शोले, सीता और गीता जैसी हिट फिल्म बनाने वाले ‘सिप्पी फिल्म्स’ ने दूरदर्शन के लिए ‘बुनियाद’ बनाया। विभाजन की पृष्ठभूमि पर बना ‘बुनियाद’ धारावाहिक उस जमाने में बहुत ही लोकप्रिय धारावाहिक साबित हुआ। लेकिन छोटे परदे की दुनिया में तहलका मचाने का श्रेय फिल्मकार रामानंद सागर को जाता है। कभी बच्चों के लिए विक्रम और बेताल, दादा-दादी की कहानियां जैसा धारावाहिक बनानेवाले ‘सागर आर्ट्स एंटरटेनमेंट’ ने 1987 में दूरदर्शन पर ‘रामायण’ ले कर आया। अरुण गोविल, दीपिका और सुनील लहरी के जीवंत अभिनय ने पूरे देश को राममय कर दिया। इस धारावाहिक में पहली बार स्पेशल इफेक्ट्स का इस्तेमाल किया गया था। ‘रामायण’ की सफलता से प्रभावित होकर फिल्मकार बीआर चोपड़ा ने छोटे परदे पर ‘महाभारत’ को उतारा। ‘महाभारत’ के साथ पूरा न्याय करने के लिए उन्होंने राही मासूम रजा, सतीश भटनागर, पंडित नरेंद्र शर्मा जैसे दिग्गजों को जोड़ा। स्पेशल इफेक्ट के लिए मशहूर ट्रिक फोटोग्राफर बाबूभाई मिस्त्री और और पीटर परेरा की सेवाएं लीं। दोनों धारावाहिक दूरदर्शन के लिए मील के पत्थर साबित हुए।
उससे पहले बीआर चोपड़ा भारत के अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर पर टीवी धारावाहिक बना चुके थे, जिसमें मुख्य भूमिका चोपड़ा साहब के प्रिय कलाकार अशोक कुमार ने निभाई थी। इसमें एक विशेष चरित्र में राज बब्बर ने भी काम किया था। दूरदर्शन में देशप्रेम की भावना जगाने के लिए अभिनेता और फिल्मकार मनोज कुमार ने भी भारत के शहीद जैसा धारावाहिक बनाया। देशभक्ति के विषयों पर फिल्म बनाने में महारत हासिल करने वाले चेतन आनंद ने परमवीर चक्र विजेताओं पर इसी शीर्षक से धरावाहिक का निर्माण किया, जिसमें फारुख शेख, अन्नू कपूर, कंवलजीत सिंह, पुनीत इस्सर, पंकज धीर, नसीरुद्दीन शाह, गुरदास मान सरीखे कलाकारों ने मुख्य भूमिका निभाई। फिल्म अभिनेता डैनी डेंजोंग्पा ने भी दूरदर्शन के लिए अपनी एक कहानी पर अजनबी शीर्षक से धारावाहिक बनाया।
जम्मू-कश्मीर की समस्या को लेकर बने इस धारावाहिक की मूल कथा पर वे पहले एक नेपाली फिल्म भी बना चुके थे। धारावाहिक में डैनी के अलावा परीक्षित साहनी, दीपशिखा, टिन्नू आनंद, अन्नू कपूर और गोगा कपूर ने प्रमुख भूमिका अदा की थी। हिंदी के मशहूर मनोहर श्याम जोशी की कहानी पर जीपी सिप्पी और उनके निर्देशक बेटे रमेश सिप्पी ने ‘बुनियाद’ शीर्षक से धारावाहिक बनाया। यह धारावाहिक अपने जमाने में काफी लोकप्रिय हुआ। मनोहर श्याम जोशी के ही एक उपन्यास नेताजी कहिन पर बासु चटर्जी ने ‘कक्काजी कहिन’ शीर्षक से लोकप्रिय धारावाहिक बनाया। ओम पुरी और हास्य कवि शैल चतुर्वेदी के अभिनय से सजे इस धारावाहिक ने समकालीन राजनीति पर जबर्दस्त कटाक्ष किया। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक ‘करमचंद’ को देश का पहला जासूसी धारावाहिक माना जाता है। फिल्मकार पंकज पराशर द्वारा लिखित और निर्देशित इस धारावाहिक में पंकज कपूर और सुष्मिता मुखर्जी ने प्रमुख भूमिका अदा की। देश के प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे ने भी किस्सा काठमांडू का शीर्षक से अपने लोकप्रिय जासूसी शृंखला फेलू दा पर आधारित पहला हिंदी धारावाहिक बनाया, जिसमें उन्होंने मुख्य भूमिका में शशि कपूर को लिया। बाद में उन्होंने मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर ‘सद्गति’ शीर्षक से टेलीफिल्म बनाई। इस फिल्म को देश की पहली टेली फिल्म बनने का गौरव प्राप्त है। जासूसी विषयक धारावाहिकों में ‘तहकीकात’ भी काफी लोकप्रिय हुआ था।
फिल्मकार और अभिनेता विजय आनंद ने इस धारावाहिक से छोटे परदे पर पदार्पण किया। धारावाहिक का निर्देशन फिल्मकार शेखर कपूर ने किया। बाद में इसे लेखक करण राजदान ने निर्देशित किया। बीच में दो कड़ी का निर्देशन स्वयं विजय आनंद ने भी किया था। अंग्रेजी उपन्यासकार आरके नारायण की कहानी श्रृंखला ‘मालगुडी डेज’ इसी शीर्षक से फिल्मकार शंकर नाग ने धारावाहिक का निर्माण किया। धारावाहिक में गिरीश कर्नाड, अनंत नाग जैसे कलाकारों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण द्वारा रचित चरित्रों पर फिल्म निर्देशक कुंदन शाह ने वागले की दुनिया से हास्य धारावाहिक बनाया। अंजन श्रीवास्तव, भारती आचरेकर की मुख्य भूमिका वाली इस हास्य धारावाहिक को पहले छह कड़ी की मंजूरी दी गई लेकिन धारावाहिक की लोकप्रियता को देखते हुए इसे तेरह कड़ियों तक बढ़ाया गया। इसमें एक विशेष भूमिका में शाहरुख खान ने भी अभिनय किया। कुंदन शाह ने सईद मिर्जा और अजीज मिर्जा के साथ मिलकर ‘नुक्कड़’ जैसी लोकप्रिय धारावाहिक भी बनाया।
फिल्मकार हृषिकेश मुखर्जी ने भी ‘तलाश’ धारावाहिक का निर्देशन किया जिसका निर्माण लोकप्रिय संगीत निर्देशक हेमंत कुमार के बेटे जयंत मुखर्जी ने किया। प्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार आशुतोष मुखर्जी की कहानी ‘सोनार काठी रुपोर काठी’ पर आधारित इस धारावाहिक में अभिनेत्री मौसमी चटर्जी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। धारावाहिक का शीर्षक गीत सांग हेमंत कुमार ने ही संगीतबद्ध किया था। बांग्ला लेखक बिमल मित्र के एक उपन्यास ‘आसामी हाजिर’ पर ‘मुजरिम हाजिर हो’ शीर्षक से धारावाहिक का निर्माण भी दूरदर्शन के लिए किया गया, जिसमें नूतन, उत्पल दत्त, राजीव वर्मा, रीता भादुड़ी जैसे कलाकारों ने काम किया।
दूरदर्शन के लिए जहां कई नामी गिरामी कलाकार और फिल्मकारों ने कई धारावाहिक बनाए, वहीं कई नौसिखियों ने भी अपनी पहचान बनाई। इसके अलावा फिल्मकार श्याम बेनेगल ने दूरदर्शन के लिए ‘भारत एक खोज’, गोविंद निहलानी ने ‘तमस’, गुलजार ने ‘मिर्जा गालिब’ बनाया। ‘फौजी’ के कमांडो अभिमन्यु शर्मा को भला कौन भुला सकता है। इसी धारावाहिक से ही बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान ने अपनी पहचान बनाई थी। हिंदी फिल्म उद्योग के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना ने भी दूरदर्शन के लिए धारावाहिक ‘आधा सच आधा झूठ’ का निर्माण किया था। इस धारावाहिक का शीर्षक गीत संगीतकार राहुल देव बर्मन ने तैयार किया था। बाद में फिल्मकार भरत रंगाचारी द्वारा निर्देशित धारावाहिक ‘सुबह’ के लिए उन्होंने शीर्षक गीत को अपनी आवाज दी।
नब्बे के दशक में दूरदर्शन के एकाधिकार को निजी चैनल जीटीवी ने चुनौती दी। और इसके साथ ही छोटे परदे की रंगत बदल गई। कभी भारतीयता से सराबोर छोटा परदा अचानक ‘बोल्ड एंड ब्यूटीफुल’ की राह चल पड़ा। भला तारा और दास्तान को कौन भुला सकता है। यह छोटे परदे का पहला बोल्ड धारावाहिक माना जाता है। स्टार टीवी के आने के बाद तो माहौल और भी रंगीन हो गया। सास-बहू के झगडेÞ को इसने इस कदर भुनाया कि देखकर ऐसा लगा कि मानो पहले अगर बच्चे बर्बाद होते थे तो आज बड़े भी बर्बाद हो गए हैं। पहले जहां एक ही चैनेल पर समाचार से लेकर कुकरी शो आते थे, अब सब इकाई स्वतंत्र होकर देश के अनगिनत चैनलों की भीड़ के हिस्से बन गए हैं। इसलिए अब मनोरंजन के लिए कोई एक चैनल पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रह गई है। १
