चद्रभान सिंह यादव

भक्तिकाव्य अकादमिक-आलोचना और आधुनिक ज्ञान-मीमांसा से बाहर होता जा रहा है, वैविध्यपूर्ण होने के बाद भी। यह दक्षिण से लेकर उत्तर तक के बौद्धिक विमर्श से उपजा आंदोलनधर्मी साहित्य है, जो प्रेम के साथ मानवमुक्ति का जयघोष करता है। इतिहासकारों ने इसके उद्भव के मूल में नगरीकरण और व्यापारिक विकास को माना है, जबकि इन्हीं प्रवृत्तियों की इसमें घोर उपेक्षा है। भक्तिकाव्य को आज की समस्याओं और नए जीवन संदर्भों में देखना-परखना जरूरी है, क्योंकि अपने समय के सवालों को उठाना और उसके आलोक में साहित्य का मूल्यांकन करना आलोचना का प्रधान धर्म है। आधुनिक काल में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मुक्तिबोध को लिखना पड़ा था कि ‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे/ उठाने ही होंगे/ तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब।’ अभिव्यक्ति के इन सारे खतरों को मध्यकाल के संत भक्त कवियों ने भी उठाया था। ये कवि न सिर्फ सत्ता की बल्कि उसकी राजभाषा अरबी-फारसी की भी उपेक्षा किए। इस काल के कवियों ने लोक भाषा में लोक प्रचलित कथानकों को अपनाया। वह कथानक चाहे राम, कृष्ण का हो या पद्मावती, चंदायन का। सत्ता की उपेक्षा करते हुए कुंभनदास ने तो यहां तक लिखा कि संतन को कहां सीकरी सों काम/ आवत जात पन्हैया टूटी बिसरि गयो हरि नाम/ जाको मुख देखे दुख लागै ताको करन परी परनाम।

आज देखें तो हालत उलटे हैं। ज्यादातर कवि-लेखक सत्ता का प्रसाद पाने के लिए आतुर रहते हैं। व्यंग्यकार शरद जोशी ने एक व्यंग्य ही लिख डाला था कि-संत सीकरी में व्यस्त हैं। पद-पुरस्कारों का निर्धारण भी राजधानियों से हो रहा है। कुछ तो सत्ता प्रतिष्ठानों की परिक्रमा करके ही अपने को धन्य महसूस करते हैं। इसमें उन्हें कुंभनदास की तरह दुख नहीं होता बल्कि सुखद अनुभूति होती है। गोस्वामीजी बड़े साफ शब्दों में लिखते हैं कि- हम चाकर रघुवीर के पठौ-लिखो दरबार/ अब क्या तुलसी होहिंगे नर के मनसबदार। ये पंक्तियां समकालीन बुद्धिजीवियों की मार्ग दर्शक हो सकती हैं।मध्यकालीन समाज वर्ण-धर्म और जाति के साथ विभिन्न मत-सम्प्रदायों में विभक्त था। हिंदू धर्म में निर्गुण और सगुण का वैचारिक संघर्ष था तो इस्लाम में सूफी और कट्टर इस्लाम का। एक ओर शास्त्रसम्मत सिद्धांत को मानने वाले लोग थे तो दूसरी ओर लोक में विश्वास करने वाले। ऐसे परिवेश में कबीर की यह चिंता स्वभाविक थी-
तोरा मोरा मनवा कइसे एक होई रे।
तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखिन की देखी।
अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा। (तुलसी)
हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा, सभ मह एक रक्त और मांसा। (रैदास)

आज हमारे बुद्धिजीवी एक पक्षीय सोच के शिकार हैं- कुछ वामपंथी खेमे से बंधे हैं तो कुछ दक्षिणपंथी। जिन लोगों को गुजरात में मुसलमानों का उत्पीड़न-पलायन दिखायी देता है वे कश्मीरी पंडितों का उत्पीड़न-पलायन क्यों नहीं देख पाते हैं? बुद्धिजीवियों का वर्गीय दायरे में बंधे रहना कितना उचित होगा, खासतौर पर जीवन और मृत्यु के सवालों पर। मध्यकाल के संत-भक्त कवि मत-संप्रदाय से ऊपर की सोच रखते थे, महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर। उन्हें मत-संप्रदायों के सांचे और खांचे में बांध कर देखना ऐतिहासिक भूल होगी। निर्गुण भक्तिधारा के आदि आचार्य रामानंद (ब्राह्मण) रामावत संप्रदाय के प्रवर्तक हैं। इस संम्प्रदाय का मूल मंत्र है ‘सीताराम’। जबकि इनके शिष्य रैदास निर्गुण मत को मानने वाले हैं और उनकी शिष्या मीराबाई (क्षत्रिय) कृष्ण भक्ति में विश्वास रखती हैं। जातिवर्ण को लांघने वाली और ऐसी परस्पर विरोधी विचारधारा की गुरु-शिष्य परंपरा आज दुर्लभ होती जा रही है।
इस बात से कोई समाजवैज्ञानिक इनकार नहीं कर सकता कि आज की राजनीति और सांप्रदायिक दंगों के केंद्र में मंदिर-मस्जिद है। ऐसी जटिल समस्या का समाधान संतों के पास है। ‘मंदिर मस्जिद दोउ एक है, इन मह अतर नाहिं।’ (रैदास), जाने-अनजाने नानक जैसे उदार हृदय संत को उनके सिख धर्म तक सीमित कर दिया गया। उनकी व्यापक सामाजिक चेतना का समुचित मूल्यांकन नहीं हो सका- सुधी समीक्षकों द्वारा। नानक के साथ लंबे समय तक रहने वाले मरदाना पांचों वक्त के नमाजी थे। सांप्रदायिक-सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता के अनेक पाठ भक्तिकाव्य में मौजूद हैं।

धार्मिक संकीर्णता में जातिवाद कोढ़ में खाज से कम नहीं है। समाजशास्त्री यह उम्मीद लगा रहे थे कि शिक्षा के प्रसार और जनतांत्रिक मूल्यों के विकास के साथ जातिवाद खत्म हो जाएगा। लेकिन, उत्तर-आधुनिक समाज का सच कुछ और है। अंतरजातीय प्रेम-विवाह में अगर युवती उच्च कुल की है तो उसकी आॅनर किलिंग या युवक की हत्या की बराबर आशंका बनी रहती है। दलितों के संदर्भ में बात खैरलाजी और गोहाना तक ही सीमित नहीं है, आज भी अगर कोई बस्ती जलाई जाती है या सामूहिक बलात्कार होता है तो वह बस्ती, स्त्री दलित की होगी या अति पिछड़ी जाति से उसका संबंध होगा। यह सब पिछड़े-अशिक्षित क्षेत्रों में ही नहीं हो रहा है बल्कि विकसित और उच्च साक्षरता दर वाले क्षेत्रों (जैसे दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में भी घटित हो रहा है। जातिव्यवस्था न सिर्फ लोकतंत्र का नासूर है बल्कि मानवता के माथे पर कलंक भी। रैदास कहते हैं, ‘मनुषता को खात है,‘रैदास’ जात का रोग।’ कृष्ण भक्ति शाखा में जात-पांत पूछत नहिं कोऊ श्रीपत के दरबार। जब ईश्वर के दरबार में जातिव्यवस्था नहीं है तो उसके द्वारा निर्मित समाज में उसकी क्या आवश्यकता?

सनातन काल से स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रखा गया है। आज मध्यकाल जैसी बहुपत्नी प्रथा, परदा प्रथा, सती प्रथा भले ही न हों, लेकिन तथाकथित आधुनिक सभ्य समाज स्त्रियों के साथ मध्ययुग से ज्यादा बर्बरतापूर्ण व्यवहार कर रहा है। कहने को उसे समानता और अभिव्यक्ति का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। सामंती समाज में मीराबाई उद्घोष करती हैं, ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई/ जाके सिर मोर मुकुट मेरा पति सोई।’ उत्तर-आधुनिक समाज में अगर कोई विधवा स्त्री इस प्रकार कहेगी तो चरित्रहीन, डायन कहकर उसकी हत्या भी की जा सकती है। हत्या का खुलासा तक नहीं होगा, हत्यारे को सजा मिलना तो बहुत दूर की बात है। मीराबाई वर्चस्वादी पुरुषसत्ता और लंपट सामंती व्यवस्था को एक साथ कटघरे में खड़ा कर देती हैं, यह कहते हुए कि ‘थारे देसां में राणा साध नहीं है, लोग बसै सब कूड़ो।’ सूरदास की गोपियों में अभिव्यक्ति का अद्भुत साहस था। शास्त्रज्ञ उद्धव निरुत्तर हो जाते हैं गंवार गोपियों के लोक ज्ञान के समक्ष। यहां शास्त्रज्ञान पराजित होता है अनुभवजन्य लोक ज्ञान से- ‘आंखिन मूद-मूद क्यों देखे बधे ज्ञान पोथी कै।’ सूर के कल्पना लोक में यशोदा, राधा और अन्य स्त्रियों का जो स्वतंत्र व्यक्तित्व-चरित्र है वह उत्तर-आधुनिक समाज में भी दुर्लभ है। पुरुष के सान्निध्य के बिना स्त्री को पहचान कायम रखना कठिन है। यह बात काबिले गौर है कि गोपियों के प्रेम में त्याग तो है, लेकिन पराजयबोध नहीं, स्वाभिमान आरंभ से अंत तक है। कहीं हिंसा या प्रतिशोध नहीं। प्रेम-विवाह में तनाव आने पर हिंसक-तेजाबी मनोवृत्तियों की शिकार होती युवा पीढ़ी के मार्गदर्शन में सक्षम है कृष्ण भक्तिकाव्य।

कबीर के अनुसार ज्ञानी वही हो सकता है जो ढाई आखर का प्रेमी हो। इनके यहां प्रेम की पहली शर्त है अभिमान का त्याग: सीस उतारै भुइं धरै सो पैठे घर मांहि। काश तथाकथित प्रेम में सिर कलम करने वाले लोग भक्तिकाव्य के विचार-दर्शन को समझ पाते। जहां मानवीय प्रेम को स्वर्ग के समतुल्य माना गया है- मानुस प्रेम भयौ बैकुंठी, नाहिंत काह छारि भरि मुठी। (जायसी) पर्यावरण संकट सिर्फ भारतीय नहीं बल्कि वैश्विक समस्या है। नदियों के जल के प्रदूषित होने, जंगल-पहाड़ को काटने और मनुष्येतर जीव-जंतुओं की कमी से पर्यावरण असंतुलन बढ़ा है। भक्तिकाव्य में पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई नारेबाजी नहीं है, लेकिन इसके संतुलन को बनाए रखने वाले जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, नदी-पहाड़ों का चित्रण मानवीय भावबोध के साथ हुआ है। कृष्ण भक्तिकाव्य में यमुना, मधुबन, गोवर्धन पर्वत और गाय को विशेष महत्त्व मिला है। नागमती के वियोगावस्था में प्रकृति सहचरी की भूमिका में है। उसके संदेश वाहक व्यक्ति नहीं पक्षी हैं- ‘पिऊ सो कहौ संदेषणा, हे भौंरा हे काग।’ कबीर की उलटबांसियां जीव-जंतुओं से विमुख नहीं है- एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावै गाई। यहां सिंह अपनी मूल प्रवृत्ति हिंसा को छोड़ चुका है। उत्तर-आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति के केंद्र में बाजार और वस्तु संग्रह है। व्यक्ति के मूल्यांकन का आधार गुण-व्यवहार का स्थान भौतिक संसाधन ले रहा है। अब कोई यह कहने वाला नहीं रहा कि- सार्इं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाय। महंगे और बाजारू गिफ्ट के चलन से-‘ताहि अहीर की छोहरियां छछिया भर छाछ पर नाच नचावैं’ जैसी पंक्तियों का अर्थ समझना-समझाना कठिन है। सहयोग, संयम और सदाचार का जो पाठ भक्तिकाव्य में पढ़ाया गया है उसकी प्रासंगिकता तब तक रहेगी जब तक समाज रहेगा। ०

 

 

ल्ल