सन 1990 के बाद का समय हिंदी कविता के लिए कई अर्थों में चुनौतीपूर्ण रहा है। इसी अवधि में उदारीकरण और बाजारवाद ने भारत में अपने पांव पसारे। सांप्रदायिकता और पूंजीवाद अविराम मनुष्य-विरोधी गतिविधियों में संलग्न हैं। इस बीच पूंजीवादी सत्ता ने कविता की प्राथमिक वस्तु, उसके प्राणतत्त्व ‘कल्पना’ पर अभूतपूर्व प्रहार किया है। ‘कल्पना’ का इस तरह पूंजीवादी समुद्र में धीरे-धीरे खोना युवा कवियों के लिए चिंता का विषय है। कवियों की भीड़ में जो कवि सजग हैं, वे इस स्थिति का सामना कर रहे हैं। वे मनुष्य और मनुष्यता के पक्ष में खड़े होते हैं। ये कवि विस्मरण और नव-साम्राज्यवाद के उत्थान वाले इस कठिन समय में चेतना के पट खोलने का कार्य करते हैं। पिछले बीस वर्षों में सांप्रदायिकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विरुद्ध सभ्यता समीक्षा की जो कविताएं रची गई हैं उन्हें इस संदर्भ में याद किया जा सकता है। मनुष्य विरोधी गतिविधियों में संलग्न लोग चाहे जितना चिल्लाएं, उनके शब्द ‘साहित्य’ नहीं बन पाएंगे। अपनी प्रक्रिया और परिणति में वह शब्द साहित्य नहीं हो सकता, जिसमें प्रतिरोध की क्षमता न हो। और याद रखना चाहिए कि प्रतिरोध का आशय ‘मनुष्य विरोधी आकांक्षाओं का प्रतिरोध’ होता है।
पिछले पच्चीस वर्ष की कविता को समझने के प्रयास में ‘चित्त के बदलाव’ को समझना बेहद आवश्यक है। इस कालखंड में वर्ग, वर्ण और धर्म भेद बहुत गहरा हुआ है। समाज की बिलकुल नई पीढ़ी के पास आकांक्षाओं का कोई नैतिकशास्त्र नहीं है। वह विभ्रम में है। अधिकतर की आकांक्षा का एवरेस्ट अमेरिका है, जिसके पास स्वयं कोई नैतिकशास्त्र नहीं है। ऐसे समय में जबकि चित्त के बदलाव को भी ठीक-ठीक परिभाषित करना मुश्किल हो, तब साहिय का संघर्ष बड़ा हो जाता है। आजादी के बाद बहुत-सी मुश्किलें आर्इं, लेकिन ऐसा ‘दिग्भ्रमित समय’ इससे पहले नहीं आया था। आज हिंदी कविता का एक बड़ा संकट यह है कि कुछ लोग कविता की मूल प्रकृति को दरकिनार करते हुए, पाठकीय आकांक्षाओं को कालापानी देते हुए कुछ-कुछ लिखते रहते हैं और उसे कविता कहते हैं। ये वे लोग हैं, जो कविता की आदि ताकत ‘लोक’ और ‘लोकतत्त्व’ से घृणा करते हैं। जाहिर है, इनके लिए नागर जीवन ही ‘जीवन’ और ‘कसौटी’ है। यह अकारण नहीं है कि ऐसे कवियों की कविताएं पाठकों को रत्ती भर संवेदित नहीं कर पातीं।
आज हिंदी कविता जिस मोड़ पर है, वहां यह देखना बेहद जरूरी है कि निबंध के गद्य और कविता के गद्य में अंतर बना रहे अन्यथा अलग-अलग विधाओं के नाम की जरूरत ही क्या है? कविता में लद्धड़ किस्म का गद्य लिखना आसान है। इसलिए यह एक संक्रामक बीमारी का रूप लेता जा रहा है। हमारे समय में प्रतिभाशाली कवियों की कमी नहीं है, इसीलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि असाध्य होती जा रही इस बीमारी से शीघ्र ही मुक्ति मिलेगी। हिंदी कविता के समक्ष पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में जो चुनौतियां आई हैं, उनमें एक ‘संप्रेषणीयता’ की भी है। नब्बे के बाद कविता के पाठक और श्रोता कम हुए हैं। कविता-संग्रहों का प्रकाशन मुश्किल हुआ है। नए कवियों को छोड़ दें, प्रतिष्ठित कवियों के संग्रह भी नहीं छप पा रहे हैं। इसका एक कारण तो चित्त का बदलाव है, लेकिन दूसरा बड़ा कारण संप्रेषणीयता है। कविता के नाम पर अर्थहीन प्रयोग और लद्धड़ गद्य कोई क्यों पढ़ना चाहेगा? आज हमारे समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न कविता के परिसर को बड़ा बनाने का है। इन दिनों लिखी जा रही अधिकतर कविताओं में तीन बातें साफ-साफ देखी जा सकती हैं- लोकप्रिय होने के तत्त्वों का अभाव; प्रयोग के नाम पर अर्थहीनता का विस्तार और पढ़ने वाली कविता सुनने वाली नहीं रह गई है।
यह एक बड़ी विडंबना है कि बहुत से कवियों को हिंदी कविता की लंबी परंपरा का कोई बोध नहीं है। अगर हम लंबे समय तक संप्रेषणीयता के प्रश्न को स्थगित करेंगे तो यह हिंदी कविता के भविष्य के लिए शुभ नहीं होगा। हमें समझना होगा कि ‘लोकप्रिय होने’ का अर्थ ‘सस्ता’ होना नहीं होता। इसी प्रकार वही प्रयोग अर्थवान होता है, जो अपनी परिणति में अपनी व्याप्ति को बड़ा बनाने की सामर्थ्य रखे। वही कविता कालजयी और कालजीवी होती है, जिसमें पढ़ने, सुनने और गुनने की ताकत होती है। इसलिए आज फिर छंद का प्रश्न बड़ा है। बहुत संभव है कि इक्कीसवीं सदी में हिंदी का बड़ा कवि वह हो जो ‘डिटेल्स की महिमा’ के साथ-साथ ‘छंद और प्रगीतात्मकता की महिमा’ को भी आत्मसात करे।
पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में दलित, स्त्री और आदिवासी विमर्शों के उभार ने बहुत से नए प्रश्न खड़े किए हैं। दलित और आदिवासी साहित्य का व्यापक विस्तार हो रहा है, लेकिन इस सवाल से नहीं बचा जा सकता कि जिसे मुख्य धारा का साहित्य कहा जाता है, उसमें इनकी उपस्थिति बहुत कम है। दलित और आदिवासी जीवन हमारी बहुत कम कविताओं में आया है।
चुनौतियां ढेर सारी हैं। पिछले ढाई दशक की हिंदी कविता पर दृष्टि डालें तो यह साफ-साफ दिखाई देता है कि ‘कविता में लोकतत्त्व’ तो है, लेकिन ‘ग्रामीण जीवन के यथार्थ’ न के बराबर हैं। जिन कवियों ने अपने आरंभिक दौर में ‘ग्रामीण जीवन के यथार्थ’ को चित्रित करने वाली कविताओं से पहचान पाई थी, वे भी अब या तो वह मार्ग छोड़ चुके हैं या कृत्रिम ढंग की कविताएं लिख कर यशस्वी हो रहे हैं। मगर ऐसा भी नहीं कि शहरी जीवन का यथार्थ और उसकी विडंबनाएं कविता में उल्लेखनीय ढंग से आ रही हैं। समस्या इस इलाके में भी है। यहां यह उल्लेख भी जरूरी है कि नगरों-महानगरों में तेजी से समाप्त हो रही जमीन अभी ठीक से काव्य-चिंता में शामिल नहीं हो पाई है। यह ‘विकास और विनाश’ का अद्भुत उदाहरण है। ऐसे में कविता को किसी सरल उपाय का विकल्प न चुनकर इस समस्या की जटिल संरचना से टकराना होगा। इधर के वर्षों में कविता को खेल समझने का भी चलन बढ़ा है। यह महज कविता के लिए नहीं, संपूर्ण साहित्य के लिए चिंता का विषय है। साहित्य खेल नहीं, जीवद्रव्य होता है।
वह मनुष्य को उबारता है। यहां हारने-जीतने का कौशल महत्त्वपूर्ण नहीं होता, मनुष्य-संस्कृति की चिंताएं महत्त्वपूर्ण होती हैं। आज के जटिल समय में खेल तो चिंता का विषय हो सकता है, लेकिन मनुष्यता की चिंताएं खेल नहीं हो सकती हैं। उन्नीस सौ नब्बे के तुरंत बाद सोवियत संघ के पतन और भूमंडलीकरण-उदारीकरण के वेश में मुक्त पूंजी के वहशी नृत्य ने बहुत सारी चीजों को धुंधला कर दिया। साहित्यिकों के बीच एक बड़ा वर्ग भी जाने-अनजाने दिग्भ्रमित हुआ। साहित्य को खेल समझने और खेल में बदलने की प्रवृत्ति भी ‘इसी दिग्भ्रम या अतिरिक्त चालाकी’ की कोख से पैदा हुई है। इस प्रवृत्ति से आर-पार का संघर्ष बेहद जरूरी है। यहां यह याद करना भी आवश्यक है कि पिछले वर्षों में हिंदी कविता में स्वयं पर संदेह करने और अपने को दुरुस्त करने की प्रवृत्ति का ह्रास हुआ है। यही वजह है कि आज हम सब काव्यात्मक विविधता के विरुद्ध खड़े हैं। पिछले पच्चीस वर्ष की हिंदी कविता का एक ऋणात्मक पक्ष यह भी है कि इसके पास अपना कोई मुकम्मल आलोचक नहीं है। अग्रज पीढ़ी के आलोचक ही कभी-कभार इधर भी ताक लेते हैं। इस कालखंड में सैद्धांतिक पक्ष पर तो काम नहीं ही हुआ, उत्कृष्ट अर्थ-मीमांसा का भी कोई उदाहरण याद नहीं आता। इस कालखंड की कविता को समझने-समझाने के लिए ऐसे आलोचकों की सख्त जरूरत है जो सर्जनात्मक कल्पना से रहित न हों। ०
जितेंद्र श्रीवास्तव
