किसी देश का इतिहास सिर्फ कागज पर दर्ज तारीखों में सांस नहीं लेता, बल्कि उसे इस बात से भी ताकत मिलती है कि वह देश अपनी धरोहरों और दस्तावेजों को कैसे सहेज-संभाल कर रखता है। वह अपनी धरोहरों, इतिहास से जुड़ी निशानियों को लेकर कितना संवेदनशील है। मगर हमारे यहां अपने इतिहास के पुराने दस्तावेजों की तो कौन कहे, स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े क्रांतिकारियों तक की निशानियां सहेज कर रखने का उचित प्रयास नहीं किया जा सका है। इसके चलते कई ऐतिहासिक तथ्य गड्डमड्ड होते रहते हैं या फिर उन्हें लेकर सवाल उठते रहते हैं। क्रांतिकारियों की ऐसी ही गुमनाम निशानियों के बारे में जानकारी दे रहे हैं सुधीर विद्यार्थी।
भारतीय क्रांतिकारी दल के संगठनकर्ता शचींद्रनाथ सान्याल ने 1922 में ‘हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ का संविधान रचा, जिसे ‘पीला पर्चा’ कहा गया। इस दल के गठन से पूर्व वे काला पानी की यात्रा से लौट कर ‘बंदी जीवन’ की रचना कर चुके थे। क्रांतिकारियों की गीता कही जाने वाली यह पुस्तक पहले बांग्ला में आई, फिर उसका हिंदी अनुवाद छपा, जो अत्यंत लोकप्रिय हुआ। इस आत्मकथा की मूल बांग्ला प्रति का आज किसी को पता नहीं। शचींद्र दा के निधन के सत्तर वर्षों बाद जब मैंने उनका पुराना बक्सा खोला, तो उसमें क्रांतिकारी संग्राम के इतिहास का अमूल्य खजाना देख कर दंग रह गया। उनकी पुस्तकें ‘विचार विनिमय’, ‘धर्म, समाज और विज्ञान’, ‘वंशानुक्रम विज्ञान’ के साथ ही बरेली, आगरा, नैनी, लखनऊ और देवली कैंप जेल की उनकी दुर्लभ डायरियां और ‘प्रताप’, ‘यंग इंडिया’ की पुुरानी फाइलें और उनके जेल से लिखे असंख्य पत्र, जिसके साथ रासबिहारी बोस के तोक्यो से लिखे पत्रों की अबूझ शृंखला और नेहरू और संपूर्णानंद के पत्र भी हंै, जो अब तक इतिहास लेखकों की पहुंच से दूर बने हुए हैं। खेद है कि इस दुर्लभ और अमूल्य इतिहास संपदा को न तो कहीं संजोया गया है और न इसके प्रकाशन या उपयोग के लिए कोई सार्थक प्रयास किए गए। भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की ऐसी कितनी ही सामग्री समय के साथ नष्ट होती चली गई और हम इस ओर उदासीन बने रहे। हमारे भीतर इतिहास चेतना की अनुपस्थिति का यह सबसे बड़ा प्रमाण है।
1988 की बात है, जब शहीदे-आजम भगतसिंह के साथी, काला पानी गए क्रांतिकारी जयदेव कपूर ने मुझे भगतसिंह की दो दुर्लभ निशानियां सौंपते हुए कहा कि इन्हें अपने शहर में संग्रहालय बना कर सुरक्षित रखूं। इनमें वह ऐतिहासिक घड़ी थी, जिसे देश छोड़ कर जापान रवाना होने से पहले रासूदा (रासबिहारी बोस) ने शचींद्रनाथ सान्याल को सौंप दी थी और बाद में शचींद्र दा ने वह घड़ी भगतसिंह को दी। उस घड़ी को हाथ में लेकर जयदेव दा अक्सर कहा करते थे कि कब बताएंगी इसकी सूइयां क्रांति का वह वक्त, जिसकी प्रतीक्षा में हमने जानें खपा दीं। और एक जोड़ी जूते, जिन्हें पहन कर भगतसिंह 8 अपै्रल 1929 को दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने गए थे। उन्हें पहली बार स्पर्श करते हुए हम सचमुच बहुत भावुक हुए थे। भगतसिंह की ये दुर्लभ निशानियां, जो इतिहास की धरोहर हो सकती थीं, आज पता नहीं कहां पड़ी धूल खा रही हैं।
काकोरी शहीद अशफाकउल्ला के कुछ पत्रादि एक समय पं. बनारसीदास चतुर्वेदी के प्रयास से राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित करा दिए गए थे, पर जो चीजें उनके घर में बची रह गई थीं, वे लापरवाही के चलते चोरी चली गर्इं। पर उनके शाहजहांपुर वाले पुराने घर में अब भी अशफाक की एक छोटी जेल नोट बुक और कुरान की वह प्रति सुरक्षित है, जिसे गले में लटका कर लब्बैक कहते हुए 19 दिसंबर, 1927 को फैजाबाद जेल में उन्होंने फांसी घर की ओर कदम बढ़ाए थे। इस कुरान के शुरुआती पृष्ठ पर अशफाक की हस्तलिपि भी सुरक्षित है। शहीद रोशन सिंह के भी कुछ पत्र उनके गांव नवादा वाले मकान में अभी बेतरतीब रखे हैं। मुझे याद है कि 10 अगस्त, 1972 को दिल्ली के चिरंजीलाल पालीवाल ने क्रांतिकारियों के कुछ हथियार, जिनमें तीन पिस्तौल, चार रिवाल्वर, एक टूटी और एक शॉटगन आदि थे, जो चालीस वर्षों से उनके गली बतासान चावड़ी बाजार के घर में लोहे के एक पुराने बक्से में सुरक्षित थे, वे उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भेंट किए। इन हथियारों में चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह की वे पिस्तौलें भी थीं, जिनसे उन्होंने अंग्रेज पुलिस अफसर सांडर्स को लाहौर में मारा था। साथ ही जगदीश कपूर और अन्य क्रांतिकारियों की पिस्तौल के साथ ही वह बैटरी भी थी, जिसकी मदद से तुगलकाबाद स्टेशन पर वायसराय की ट्रेन को उड़ाया गया था। उसमें कुछ सामग्री और भी थी, जिसमें भगतसिंह का छपा हुआ बयान, जिसे उन्होंने दिल्ली बम केस के बाद दिया और सुुखदेव का एक पत्र और क्रांतिकारी भगवतीचरण के ब्लॉक तथा पेंट थे। इस सामान का विवरण ‘इंडियन एक्सपे्रस’ के 19 अगस्त, 1972 के अंक में छपा भी था।
चिरंजीलाल अपने विद्यार्द्यी जीवन में हिंदू कॉलेज की पढ़ाई के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र यूनियन के सभापति थे और उस समय उन्होंने क्रांतिकारियों के संपर्क में रहते उनके हथियारों की सुरक्षा का भार अपने ऊपर लिया था। इंदिराजी ने क्रांतिकारियों की इन निशानियों को पाकर तब बहुत प्रसन्नता व्यक्त की थी, लेकिन नहीं पता कि बाद में उन चीजों का क्या हुआ। बनारसीदास चतुर्वेदी अपने शहीदों के मिशन के दौरान बार-बार कहते रहे कि हमें शहीद अशफाक का तमंचा तलाश करके किसी संग्रहालय में सुरक्षित करा देना चाहिए। पर वह हमें प्राप्त नहीं हो सका। यह आश्चर्यजनक है कि भगतसिंह की जेल नोटबुक की ओर हमारा ध्यान उनकी शहादत के तिरसठ वर्षों बाद तब जा सका जब एक विदेशी विद्वान एलबी मित्रोखिन ने 1981 में पहली बार प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘लेनिन ऐंड इंडिया’ में एक अलग अध्याय इस पर लिखा और फिर 1993 में अंगरेजी ‘इंडियन बुक क्रानिकल’ से भूपेंद्र हूजा और जीबी कुमार ने उसे अपनी भूमिका के साथ जयपुर से छापा। फिर 1999 में इसका हिंदी अनुवाद हुआ। पर ऐसा क्यों हुआ कि चार सौ पृष्ठों की इस जेल नोट बुक की एक फोटो प्रति तीन मूर्ति भवन के जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी में रखी रही और जिसे 1979 में अनेक शोधकर्ताओं ने देखा और पढ़ा, फिर भी उसके प्रकाशन की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। गुरुकुल कांगड़ी के तत्कालीन कुलपति हूजा 1981 में गुरुकुल इंद्रप्रस्थ, दिल्ली से बीस किमी दक्षिण तुगलकाबाद रेलवे स्टेशन के निकट दौरे पर गए थे, जहां संस्था के प्रमुख अधिष्ठाता स्वामी शक्तिवेश के गुरुकुल के ‘हॉल आॅफ फेम’ के तहखाने में सुरक्षित इस ऐतिहासिक धरोहर की एक हस्तलिखित डुप्लीकेट प्रतिलिपि दिखाई, जिसे हूजा ने कुछ दिनों के लिए मांग लिया। बाद में दिल्ली-फरीदाबाद के आर्यसमाजी भूमाफियों के हाथोें शक्तिवेश की हत्या हो गई और यह डायरी (प्रतिलिपि) हूजा के पास ही रह गई।
मित्रोखिन का कृतज्ञ होना चाहिए कि हमारे अनेक साथियों की लापरवाही और दृष्टिहीनता के चलते भगतसिंह की जो जेल नोटबुक इतिहास के अंधेरे तहखानों में पड़ी उपेक्षा की धूल खा रही थी, वह उनके प्रयासों से प्रकाश में आकर हमारे क्रांतिकारी दस्तावेजों का अमूल्य हिस्सा बन सकी।
फिर भी यहां सवाल उठता है उन चार पुस्तकों का, जिन्हें भगतसिंह ने जेल के भीतर लिपिबद्ध किया था और फांसी से पहले अपने भाई कुलबीर सिंह की मार्फत बाहर लज्जावतीजी के पास भिजवा दिया था। वे पुस्तकें हैं- आइडियल आॅफ द सोशलिज्म, द डोर टु डेथ, आॅटोबायोग्राफी और द रिवोल्यूशनरी मूवमेंट आॅफ इंडिया। पता लगा कि इन पुस्तकों की जानकारी सिकंदराबाद (आंध्र प्रदेश) में रह रहे भगतसिंह के साथी विजय कुमार सिन्हा को थी। लज्जावती से जब भगतसिंह की इन पुस्तकों के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि वह देश की संपत्ति थी और उसे उन्होंने पं. नेहरू को सौंप दिया। आखिर उन पुस्तकों की खोजबीन क्यों नहीं की गई। आखिर भगतसिंह के परिवार वालों और उनके जीवित बचे साथियों ने भी इन महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों पर चुप्पी क्यों साध ली। विजय दा से अनेक बार पूछने पर भी उन्होंने हमें इसके बारे में नहीं बताया।… और भगतसिंह की कूट भाषा में लिखी जेल की उस डायरी की भी खोज-खबर नहीं मिल पाई, जिसके बारे में कुलबीर सिंह ने एक बार मित्रोखिन से चर्चा की थी। भगतसिंह के वकील प्राणनाथ मेहता भी एक डायरी रखते थे। पर बदकिस्मती से वह भी विभाजन के वक्त कुछ और कागजात के साथ लाहौर में छूट गई। फिर पता नहीं उन चीजों का क्या हुआ। यह प्रश्न अनेक बार उठा कि भारतीय क्रांतिकारी दल के अजेय सेनापति चंद्रशेखर आजाद अपने पास माउजर रखा करते थे, जिसे कई बार प्यार से वे ‘बमतुलबुखारा’ कहते थे। सांडर्स वध में उन्होंने इसी माउजर का प्रयोग किया था। लेकिन 27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश पुलिस से मुठभेड़ और अपनी शहादत के समय उनके पास से कोल्ट पिस्तौल प्राप्त हुई, जिसका विवरण इस प्रकार है: ‘कोल्ट पिस्तौल, पीटीएफए मैन्युफैक्चर्स कं., हार्टफोर्ड सीटी (अमेरिका) पेटेंटेड, अपै्रल 20, 1897-दिसंबर 22, 1903, कोल्ट आटोमेटिक कैलिबर, 32, रिमलैस ऐंड स्मोकलेस।’
इलाहाबाद के सरकारी मालखाने की छानबीन के बाद 27 फरवरी, 1931 के रजिस्टर में आजाद की इसी पिस्तौल का विवरण दर्ज है। इसके साथ यह नोट भी लिखा है कि यह पिस्तौल नट बावर एसएसपी को, जिनकी पहली गोली से आजाद घायल हुए थे, उन्हें इंग्लैंड जाते समय भेंट कर दी गई। चूंकि नट बावर उत्तर प्रदेश शासन से पेंशन पाते थे, ऐसी स्थिति में इलाहाबाद के कमिश्नर श्री मुस्तफी (जो बाद में लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे) की ओर से नट बावर को पिस्तौल वापस करने के लिए पत्र लिखा गया। कोई उत्तर न मिलने पर केंद्र की मदद से इंग्लैंड स्थित भारतीय उच्चायुक्त अप्पा साहब के प्रयत्नों से नट बावर ने वह पिस्तौल इस शर्त के साथ लौटाना स्वीकार किया कि भारत सरकार उसे एक अनुरोध पत्र के साथ ही आजाद के शहादत स्थल पर लगी मूर्ति का एक फोटोग्राफ भेज दे। इस तरह 1972 के प्रारंभ में आजाद की वह कोल्ट पिस्तौल दिल्ली आई और फिर 27 फरवरी, 1973 को लखनऊ के गंगाप्रसाद मेमोरियल हॉल के सामने क्रांतिकारी शचींद्रनाथ बख्शी की अध्यक्षता में आयोजित एक समारोह के बीच उसे लखनऊ संग्रहालय में संरक्षित कर दिया गया। बाद में जनता शासन के समय इलाहाबाद का नया संग्रहालय बनते ही आजाद की उस अंतिम निशानी को वहां एक विशेष कक्ष में स्थानांतरित कर दिया गया। उन्हीं दिनों इलाहाबाद संग्रहालय से आजाद के माउजर के चोरी चले जाने के समाचार से हड़कंप मच लगया, जो नितांत भ्रामक था। दरअसल, 27 फरवरी, 1931 को पुलिस मुठभेड़ में आजाद के पास कोल्ट पिस्तौल ही थी, माउजर नहीं। कोल्ट छोटी होती है, जिसे वे अपनी सुरक्षा के लिए सदा जेब में डाले रहते थे। माउजर का साइज बड़ा होता है, जिसे जेब में नहीं रखा जा सकता। यह सही है कि आजाद के पास माउजर भी रहता था, जिसका उन्होंने कई बार प्रयोग किया, पर जीवन के अंतिम क्षणों में उनका संग-साथ कोल्ट ने ही दिया था। लेकिन आजाद का माउजर कहां गया, यह सवाल अनेक वर्ष पहले बार-बार उठा।
इलाहाबाद के कटरा मुहल्ले में आखिरी दिन तक आजाद के साथ रहने वाले गढ़वाल के क्रांतिकारी भवानी सिंह रावत के मैं निकट संपर्क में था। रावतजी ने भी मेरे अनुरोध पर एक बार लेख लिख कर आजाद के माउजर पिस्तौल की खोजबीन का मामला उठाया, पर हमारी यह तलाश अधूरी ही बनी रही। क्रांतिकारी भवानी सिंह के साथ मैं आजाद की बलिदान अर्धशताब्दी पर इलाहाबाद के अल्फेड पार्क में गया था, जहां तब आजाद और भगतसिंह-युग के अनेक क्रांतिकारियों ने हिस्सेदारी की थी। हम रसूलाबाद घाट पर बनी आजाद की समाधि पर भी पुष्प चढ़ाने गए। इसके कुछ दिनों बाद ही समाचार मिला कि रसूलाबाद घाट पर बनी आजाद की उस समाधि को इलाहाबाद नगरपालिका के एक इंजीनियर ने तुड़वा दिया। यह था स्वतंत्र भारत में मुक्ति-युद्ध के एक सेनानी का सम्मान! आजाद की शहादत के बाद उनका दाह संस्कार उनके रिश्तेदार पं. शिवविनायक मिश्र ने इसी स्थल पर किया था। उन्होंने 2 मार्च, 1931 को उनकी अस्थियां बटोर कर त्रिवेणी संगम में विसर्जित कर दी थीं। कुछ अस्थियां वे अपने घर वाराणसी एक ताम्रपात्र में रख कर ले भी गए थे, जहां उन्होंने एक दीवार में छिपा कर रख दिया। 1975-76 में कुछ लोगों का ध्यान उधर गया और अस्थियां उनके घर से विद्यापीठ लाकर एक जुलूस में लखनऊ, मिर्जापुर, इलाहाबाद, प्रतापगढ़, रायबरेली, सोख्ता आश्रम, कालपी, उरई, झांसी, सातार तट-ओरछा, कानपुर और बदरका होते हुए पुन: लखनऊ लाकर 10 अगस्त, 1976 को जनता के दर्शनार्थ रखी गर्इं। यह स्वतंत्र भारत में सेनापति आजाद के अस्थि-कलश को हमारी अंतिम श्रद्धांजलि थी।
आजाद की शहादत पर नट बावर और ब्रिटिश खुफिया अधिकारी एसटी कालिंस का बयान भी हमारे क्रांतिकारी आंदोलन के प्रमुख दस्तावेज हैं, जिन्हें संरक्षित किए जाने की आवश्यकता है। भारतीय क्रांतिकारियों के अनेक पत्र, दस्तावेज, आलेख और चित्र आदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अनेक वर्षों तक विभिन्न लोगों के निजी संग्रह में उपलब्ध थे। फिर धीरे-धीरे उनका क्या हुआ, किसी को पता नहीं लगा। खुद मेरे पास क्रांतिकारी भवानी सिंह रावत, मन्मथनाथ गुप्त, दुर्गा भाभी, सुरेंद्र पांडेय, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, सदाशिवराव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर, वीरेंद्र पांडेय, कुलतार सिंह आदि की स्मृति के रूप में उनके दुर्लभ पत्रों का विपुल संग्रह है, जिसे प्रकाश में लाने की जरूरत है। मैंने अनेक बार मांग की कि दिल्ली में शहीदों और क्रांतिकारियों की निशानियों का एक बड़ा संग्रहालय स्थापित किया जाए।
