शंभु गुप्त
समय के संदर्भ में साहित्य को देखना-समझना उसके साथ-साथ समय को भी देखने-समझने के लिए जरूरी है। ये दोनों परस्पर सापेक्ष और समांतर हैं। सृजन की तरह साहित्य का अधिगम भी समय या इतिहास के परिप्रेक्ष्य या सहकार में ही हो सकता है। हम अंदाजे या जोड़-तोड़ से साहित्य की व्याख्या कर तो लेते हैं, लेकिन वह इतिहास की कसौटी पर खरी उतरेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं। हिंदी में समय का अनुशासन लगभग छठे दशक में पीढ़ीगत अध्ययन के रूप में सामने आया, जब ‘भूखी पीढ़ी’, ‘श्मशानी पीढ़ी’ जैसे प्रत्यय उभरे। तबसे अब तक हिंदी-आलोचना की लगभग यह परिपाटी ही बन गई है कि हर विधा का पीढ़ीगत अध्ययन किया जाए। एक तरह से देखा जाए तो यह प्रथा नई पीढ़ी के दबाव के चलते शुरू होती है। ऐसा माना जाता है कि हिंदी में हर दस साल में एक नई पीढ़ी पैदा हो जाती है और वह पुराने सारे पैमानों और परिपाटियों को बदल देती है। साहित्य को समझने-समझाने, सृजन-प्रक्रिया, वस्तु-अंतर्वस्तु, सरोकार आदि के उसके अपने मानदंड होते हैं और अनिवार्यत: वे पिछले से भिन्न और आगे के होते हैं। नई पीढ़ी का दबाव होता है कि उसे उसके समय और ऐतिहासिक संदर्भ-विशेष में समझा जाए, परंपरा की लाठी से उसे न हांका जाए, पुरनिया पीछे हटें और हमें आगे आने दिया जाए। एक तरह से यह उचित ही है। इससे चीजें जल्दी विकसित होती हैं, नई प्रवृत्तियां रेखांकित होती हैं, साहित्य की वस्तु-अंतर्वस्तु में नवोन्मेष आता है, आलोचना के सामने नई चुनौतियां दरपेश होती हैं। यहां ध्यान रहना चाहिए कि परंपरा के विकासशील तत्त्वों की उपेक्षा न हो, पिछली पीढ़ी को पुराना या बासी कह कर किसी कोने में न डाल दिया जाए, नए के नाम पर अपने आप को स्वयंभू और सर्वोपरि न मान लिया जाए; जैसा कि कहानी से जुड़ी पीढ़ियों में हिंदी में कई बार ऐसा हुआ है।
युवा पीढ़ी के प्रति आलोचना का सबसे पहले और सबसे ज्यादा दायित्व होता है। आलोचना रचना को उसके समकाल के संदर्भ में बखूबी हर तरह से परखे और अपना पक्ष रखे; यह उसका सबसे पहला काम है। आलोचना की कमियों, कमजोरियों और लचर रवैए के चलते ही ऐसा होता है कि रचना का सही-सही मूल्यांकन नहीं हो पाता, जेन्युइन रचनाएं नोटिस लिए जाने के लिए तरसती रह जाती हैं, जबकि दूसरे-तीसरे दर्जे की रचनाएं महत्त्व पा जाती हैं। मित्रता, लेन-देन, मतवाद आदि के चलते ऐसी स्थितियां पैदा होती हैं। पेशेवर आलोचना की यह दुर्गति सचमुच आश्चर्यजनक है। यहां अधिकतर लोग एक-दूसरे की देखा-देखी कार्यरत हैं। जोखिम उठाने का माद्दा या तो खत्म हो गया है या बहुत कम रह गया है। समस्याएं ज्यों की त्यों अनसुलझी पड़ी हैं और लोग आत्मरति में निमग्न हैं। प्रतीत होता है कि इतिहास का डर उनके दिमाग से उतर गया है। इतिहास दरअसल, हर जिम्मेदार व्यक्ति से यही सवाल पूछता है कि आपने समय के तकाजों पर क्या रुख अख्तियार किया? ज्ञानरंजन ने ‘पहल’ के एक अंक के संपादकीय में लिखा था- ‘पुराने होनहारों में सन्नाटा है, उनके भीतर खिलेगा तो देखेंगे की मनोवृत्ति कायम है। यह दबंगई है। हैसियत बना लेने वाले और पुराने समर्थ रचनाकारों की चाल में एक सफलीभूत गवीर्लापन आ गया है। ये दरारों में अपना घर बना रहे हैं, ये पंक्तियों को आगे-पीछे करते हैं, शीर्षकों को बदलते-बदलते ही शाम हो जाती है पर इनका एक मजबूत संयुक्त परिवार है। ये प्रतिबद्धताओं से परे चले गए हैं।’ वर्तमान साहित्यिक समय को पहचानते हुए आगे वे लिखते हैं- ‘कठिनाई यह है कि इधर कलह, तू तू, लांछन, दंगा, दंगल, और वकालत बहुत बढ़ गई है। जो विश्वसनीय और मजबूत स्वर थे वे भी इसी मिर्च-मसाले के शिकार हुए या अवसादग्रस्त हुए। मारकाट मची हुई है, सहमे हुए बच्चे गर्दन घुमा-घुमा कर देख रहे हैं, चुप हैं, विचलित हैं या इंटरनेट की शरण में हैं। कुछ हैं जो चौराहों पर रुके हैं, भांप रहे हैं कि क्या करें। या वही कि खिलेगा तो देखेंगे। जबकि हिंदी का विश्व साम्राज्य बढ़ रहा है, प्रकाशकों का विश्व साम्राज्य बढ़ रहा है। अमीरी आ रही है, विभोर कर रही है, प्रतिरोध ठप है या खुदरा है।’
आगे फिर वे आलोचना को कठघरे में लाते हैं और सवाल-दर-सवाल करते हुए- जिनका कोई जवाब फिलहाल उसके पास नहीं है और सचमुच वह अभियुक्त जैसी स्थिति में है- उस पर आरोपों की झड़ी लगा देते हैं- ‘आलोचक और मार्गदर्शक क्या कर रहे हैं? आलोचना की पीठ अध्यापकों के पास हैं। वे वाचाल हैं, लोकार्पित हैं, अध्यक्षताएं कर रहे हैं, जगह-जगह जाकर उन्होंने शताब्दी तमाशा मचाया हुआ है, क्योंकि कोश और श्रद्धा उसी जगह है। वे व्यस्त हैं, वे उद्घाटन और नियुक्तियां करेंगे, भक्त बनाएंगे, छोटे-छोटे लिटरेरी क्लब बनवाएंगे, फुटकरों का संग्रहण करेंगे। वे आपको पुरस्कृत करेंगे और प्रतिदिन एक समारोह मचाएंगे। एक धारा बन गई है, उस लीक पर वृद्धों की राह पर प्रौढ़ भी चल पड़े हैं, अब नवतव्यों की बारी है।’ स्पष्ट है कि हमारी सबसे पहली चिंता यह है कि वर्तमान के प्रति हमारा रुख क्या है? वर्तमान की हमारी समझ क्या है? वर्तमान को हम किस रूप में लेते हैं और उसमें हमारा कुछ हस्तक्षेप है या नहीं और अगर है तो उसकी तत्त्व-प्रकृति और प्रवृत्ति क्या है? हमारी प्राथमिकताएं और वरीयताएं क्या हैं और कुल मिलाकर हम किस भूमिका में हैं? क्या हम अपने समय के मुद्दों को पहचान और आगे बढ़ा पा रहे हैं? ‘तद्भव’ के संपादकीय में अखिलेश ने हिंदी के वर्तमान के संदर्भ में लिखा था- ‘हिंदी साहित्य के तमाम प्रपंचों, पुरस्कारों, फेलोशिप, पदों, कमेटियों, विदेश यात्राओं, प्रशस्तियों, समीक्षाओं, षड्यंत्रों, रणनीतियों और गप्पों, अफवाहों के कोलाहल कोहराम में अनेक मुद्दे, सिद्धांत, विचार, संवेदन, वाद-विवाद अभिव्यक्त होने के लिए पुकार रहे हैं। क्या हम उन्हें सुन पा रहे हैं या सुनने की इच्छा रखते हैं?’ अखिलेश के इस प्रश्न में ही शायद उत्तर भी छिपा हुआ है और वह यह कि ‘शायद नहीं!’
शायद यही वजह है कि अरसे से हिंदी में किसी नए विमर्श, किसी नई सैद्धांतिकी की खोज का काम बंद पड़ा है। लोगों को दूसरे कामों से फुरसत मिले तब तो वे ऐसा करें! अखिलेश के ही शब्दों में कहें तो- ‘हम इधर देख रहे हैं कि हमारे समूचे रचनात्मक पटल पर गंभीर वैचारिक मंथन की परंपरा क्षीण होती जा रही है। इतिहास पर दृष्टि डाली जाए तो हिंदी साहित्य अनेक ऐतिहासिक महत्त्व के विमर्शों, बहसों और विवादों से समृद्ध दिखेगा।… किंतु क्या हम ठीक इसी तरह नई सदी के किसी नए विचारोत्तेजक वाद विवाद संवाद को भी रेखांकित कर सकते हैं, जिसने साहित्य-जगत को मथा हो? अगर बीते एक दशक को साक्ष्य के रूप में लें तो दिलचस्प सच्चाई सामने आती है कि हमारे बीच न तो साहित्य की किसी नवीन सैद्धांतिकी का जन्म हुआ न बड़े सरोकारों वाले विषय को लेकर वैचारिक संग्राम छिड़ा। बड़े वाद विवाद हुए भी तो उनकी पृष्ठभूमि में प्राय: आचरण संबंधी समस्याएं अधिक रहीं, न कि चिंतन और सृजन के बड़े प्रश्न।… आज सृजन की दुनिया में जड़ता और नींद को तोड़ देने वाला कोई वैचारिक विस्फोट नहीं हो रहा है।’ इधर एकदम नई स्थिति पैदा हुई है। कारपोरेट्स को साहित्य के प्रति अचानक भारी लगाव पैदा हो आया है। उन्होंने ‘लिटरेरी फेस्टीवल’ की शृंखला शुरू की है, जिसमें वामपंथी संगठनों से जुड़े बहुत सारे लोग बकायदा हिस्सेदारी कर रहे हैं। वे इनके सलाहकार, संयोजक, संचालक, प्रवक्ता आदि बने हैं और गौरवान्वित हैं। यहां कारपोरेट वर्चस्वकारी भूमिका में है और वही एजेंडा तय कर रहा है।
आज सचमुच ही लेखक संगठनों की भूमिका बहुत बढ़ गई है। वे इस सारी स्थिति का नोटिस लें और लेखकों और आम लोगों को इसके खतरों से आगाह कराएं। लेखक संगठन सिद्धांत या अवधारणाओं के स्तर पर पर्याप्त चौकस होते हैं। खासकर नई पीढ़ी के युवा साथियों के लिए ये बहसें और संवाद बहुत काम के और दृष्टि-निर्माण में सहायक होते हैं। नए और अधुनातन विमर्शों से सब लोग परिचित होते चलते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि हमारी समझ लगातार तीखी होती चलती है। हमारे यहां यह प्रक्रिया अरसे से थमी पड़ी है। लेखक संगठन एक तरह के बौद्धिक/ वैचारिक प्रशिक्षण के केंद्र हुआ करते हैं। आज लेखकों और उनके संगठनों की भूमिका और बढ़ जाती है कि वे शब्द की दुनिया से कर्म की दुनिया में भी उतरें और राजनीतिक कार्यकर्ता की हैसियत में आ जाएं। दरअसल, प्रतिरोध और हस्तक्षेप अंधेरे और विकल्पहीन समय का सबसे बड़ा इलाज हैं। लेखक संगठन अगर तय कर लें और अपनी सीमाओं से निजात पा लें तो निश्चय ही उजाले और विकल्प की गुंजाइश पैदा होे सकती है। ०

