भारतीय संदर्भ में बीसवीं सदी एक तरफदो-दो विश्व-युद्धों की त्रासदी की सदी रही तो साथ ही गांधी, सुभाष, भगतिंसह, आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और राम मनोहर लोहिया, नंबूदरीपाद, डांगे जैसे राजनीतिक मनीषियों के संघर्ष और त्याग की सदी भी थी। ये सभी लोकनायक होने के साथ चिंतक, विचारक और साहित्यानुरागी भी थे। इसके अलावा खुद साहित्यकारों के प्रेरणा-पुरुष भी थे। प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, माखन लाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, ‘उग्र’ जैसे साहित्यकारों से लेकर अज्ञेय, फणीश्वर नाथ रेणु, नागार्जुन और मुक्तिबोध तक चले आइए, लगभग सबके सब किसी न किसी रूप में राष्ट्रीय स्वतंत्रता-संग्राम से जन-प्रेरणा ही नहीं ले रहे थे, बल्कि अनेक आंदोलनों में अपनी सक्रिय भागीदारी का जोखिम भी उठा रहे थे। सभी कलम के वीर ही नहीं, कर्म के वीर भी थे। माखनलालजी तो एक पत्र ही निकालते थे ‘कर्मवीर’ नाम का। इस ‘कर्मवीरता’ का लोप होते जाना आजादी के बाद की सबसे बड़ी दुर्घटना है।
बीसवीं सदी ने राष्ट्रीय आंदोलन से जो ऊर्जा ग्रहण की थी, उसे बचाए रख पाने में हम आजादी के बाद सफल नहीं हो पाए। साहित्य का जो सीधा संपर्क समाज के सामान्य-जन से था, उसके सूत्र बिखरते गए। हालांकि, बीसवीं सदी अपने अंतिम दशकों में विचारों की जो उथल-पुथल भरी दुनिया इक्कीसवीं सदी को सौंप कर गई, उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हिंदी समाज वैचारिक स्तर पर एक नए तेज के साथ अग्रसर हुआ। तथाकथित उत्तर-आधुनिकतावादियों द्वारा भले ही पश्चिम में इतिहास, विचार आदि के अंत की घोषणाएं की जाती रही हों, लेकिन भारतीय समाज में विचारों के अंत का नहीं, विचारों की अनंतता का जो परिदृश्य है, वह अद्भुत है। साहित्य के आत्मसंघर्ष का आज सबसे बड़ा मोर्चा यही है कि विचारों के तेज, अनुभवों के ताप और संवेदना की तरलता को रचनात्मकता के बिंदु पर एक साथ कैसे साधा जाए।
विचारों के आधार पर कुछ लोग समकालीन ंिहदी साहित्य के भूगोल को भी अलग-अलग खानों में बांट देते हैं। लेकिन रचनात्मकता के मूल्यांकन के स्तर पर यह तथ्य भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि रचना में विचारधारा की इलाकाई हदों का भी अतिक्रमण का साहस अर्जित किया जा सका है या नहीं। विचारधाराएं भी कभी-कभी बौद्धिक-आतंक का रूप ले लेती हैं। विचारधारा के कुछ आग्रही तो अक्सर इतना उत्साहित हो उठते हैं कि रचना में उसके प्रमाण को, रचना में उसके परिणाम से ही आंक कर संतुष्ट हो लेते हैं। विचारधारा का आग्रह कभी-कभी साहित्यिक तानाशाही का वैसा ही रूप ले लेता है, जैसे विचारधारा से आत्यंतिक बचाव का आग्रह कलात्मक कायरता का रूप ले लेता है। सच्चा विचार अपनी प्रकृति में सामाजिक विसंगतियों का प्रतिरोधी बन कर साहित्य में एक मानवीय ऊर्जा का रूप लेकर आना चाहता है। लेकिन विचार के नाम पर साहित्य, भाषा में तामीर होती कोई शानदार इमारत जैसी बन जाए, तो इस इमारत को फिर से यथास्थितिवादी ताकतें ही अपना आवास बना लेती हैं और सच्चा विचार वहां से विस्थापित कर दिया जाता है। इसलिए विचारवान होने का तकाजा है कि साहित्य के साहित्य होने का अर्थ भी बदलते रहने की संभावना से निर्धारित होता रहे।
विचारवानता की जिस बुनियादी प्रकृति की बात हमने की, उसके बारे में एक बात और ध्यान रखने योग्य है। आज के बाजारवादी युग में कुछ विचारवादियों ने ‘विचारों के बाजार’ की भी संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी हैं। ऐसे विचारवादियों को यह याद दिलाना जरूरी है कि बाजार की मजबूरी है कि चीजों को स्थूल रूप में लाए बिना वह उन्हें महत्त्व नहीं दे सकता। जबकि विचार अपने चरित्र में स्थूल होने से इनकार करते हुए आते हैं। विचार रचना में हमेशा किसी निर्जीव वस्तु की तरह नहीं, बल्कि किसी सकर्मक दर्शन को जगह देते हुए आते हैं। बाजारवाद का वश चले तो वह हमारे युग को नितांत दर्शनविहीन युग बना दें। बाजार, विचार और दर्शन की कद्र करना नहीं जानता। विचार की सकर्मकता और दार्शनिकता की कद्र करने की तमीज हमें हमारा साहित्य ही दे सकता है।साहित्य में विचार केवल राह ही दिखाते नहीं आते। आज आवश्यक है कि विचार को ऐसे यात्रियों की तरह आने दिया जाए, जिन्हें किसी भी तरफ निकल पड़ने की आजादी हो। हालांकि यह स्थिति कभी-कभी अराजकता जैसी भी प्रतीत हो सकती है। मगर अराजकता से बचाव संभव है, अगर साहित्यकार को अपने वैयक्तिक और सामाजिक सरोकारों से अपने-अपने सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विचारों को संतुलित करने का विवेक बना रहे।
इक्कीसवीं सदी सूचनाओं की चकाचौंध में है, तो साथ ही संदेहों की चकाचौंध में भी। ऐसे में यह आशा कैसे की जा सकती है कि साहित्य की मूल्यवत्ता पर भी बहुत आत्मविश्वास से हम कुछ कह सकेंगे ? कोई चाहे तो यह अपेक्षा भी कर सकता है कि बहुत आत्मविश्वास से न सही, संदेह से ही बात क्यों न शुरू की जाए! तो, कुछ संदेहों से ही अपने को व्यक्त होने दिया जाए। मसलन संदेह है कि सामान्यतया साहित्य को अब कोई इतना मूल्यवान समझता होगा कि अगर किसी हादसे में तमाम चीजें नष्ट हो रही हों तो साहित्य को दौड़ कर बचा लेने का जोखिम कोई उठाएगा। संदेह है कि साहित्य को अब तक जिस रूप में देखने के हम आदी रहे हैं, वह अपने उसी रूप में अपने को आगे भी सुरक्षित रख पाएगा। संदेह है कि साहित्य अपनी किसी भी अभिव्यक्ति पर बहुत दिनों तक अपने एकाधिकार का दावा बनाए रख पाएगा, जिसमें हम मनुष्य के मनुष्य होने की पहचानें पाते रहें हैं। लेकिन फिर यह कि साहित्य के संदर्भ में संदेह भी कम मूल्यवान नहीं हैं। इनकी मूल्यवत्ता यह है कि साहित्य को अगर सचमुच अपने किसी भविष्य की राह ढूंढ़ने की जिद ठाननी है तो इन तमाम संदेहों को अपने लिए एक चुनौती के रूप में लेने के सिवा उसके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। यानी साहित्य को खुद एक सच्चा संदेह-विमर्श भी बनना है।
सं देहों की सार्थक अभिव्यक्ति हमारी सप्रश्नता की वृत्ति में होती है। प्रश्न उठाना भी एक तरह से ‘रचना करना’ है। प्रश्न उठाना मानवीय स्वतंत्रता की महानतम अभिव्यक्तियों में से एक है। यह जो आज के विमर्शों का परिदृश्य है, यह इसलिए संभव हुआ है कि व्यवस्थाओं ने समय-समय पर जो ‘संरचनाएं’ प्रस्तुत कीं, उनके प्रति संदेह जागे और उन संदेहों को हम अपने लिए प्रश्न करने के अधिकार में परिणत कर सके। अपनी संस्कृति और अपनी परंपरा की कुछ ज्यादा ही चिंता करने वाले भारतीय यह देखकर अक्सर क्षुब्ध होते हैं कि जो नए प्रकार के विमर्श हैं-स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श वगैरह, इनमें ऐसे सवाल उठाए जा रहे हैं जो हमें अपनी लंबी परंपरा और उनकी आदर्श विरासतों से विच्छिन्न करने वाले हैं। लेकिन इन फिक्रों में ज्यादा दुबला होने की जरूरत नहीं है। जब हम किसी पर संदेह कर रहे होते हैं तो इसका अर्थ यह कतई नहीं होता कि परंपरा से या संस्कृति से हम अपने को नितांत विच्छिन्न कर रहे हैं। या ‘डिसएसोशिएट’ कर रहे हैं। पॉल टिलिच का एक लेख है-डाइलेक्टिक्स आॅफ फेथ। इसी तर्ज पर डाइलेक्टिक्स आॅफ आस्किंग भी हो सकती है। तात्पर्य यह कि जिस पर हम संदेह कर रहे होते हैं, उससे हम अपने को सर्वथा विलग नहीं कर रहे होते, बल्कि उसको अपने से संर्दिभत करने की संभावनाएं टटोल रहे होते हैं।
साहित्य के सामने समस्या दरअसल उस संदर्भबिंदु को तलाशने की है, जिसको ध्यान में रख कर आज के तेज गति वाले जीवन का कोई मानचित्र हमारी चेतना में आकार ले सके। प्रौद्योगिकी और टेक्नालॉजी के विकास ने हमारे जीवन में गति के प्रचलित मिथकों और बिंबों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। भूमंडलीकृत रूप में हमारी समाज-व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए र्निमत हो रहे शक्ति-समीकरणों ने विज्ञान और टेक्नालॉजी की गति को भी अपने वर्चस्व-विस्तार का साधन कुछ इस प्रकार बनाया है कि गति हमारे जेहन में अब सर्वथा एक नए बिंब के रूप में उभरने लगी है-‘गति की जड़ता’ के बिंब के रूप में। हम आज गति-प्रसूत जड़ता के दौर में हैं। प्रसिद्ध उर्दू शायर गÞालिब ने अपनी गजल के एक शेर में जिस अवस्था का जिक्र किया था, वह बदले हुए परिवेश में आज हमारी भी है-हम वहां हैं जहां से हमको भी कुछ हमारी खबर नहीं आती।
साहित्य के सामने आज यहीं इसी बिंदु पर एक मुश्किल यह दरपेश है बल्कि एक नई जिम्मेदारी यह आ पड़ी है कि मनुष्य इस समय जहां कहीं भी है, वहीं ठीक उसी मुकाम से मनुष्य के मनुष्य होने की खोज खबर कैसे पहुंचाई जाए। वैश्वीकरण की चालकशक्ति सूचना तकनीक है। जो हमारे ज्ञानात्मक अनुशासन हैं वे लगभग सारे के सारे हमें हद-से-हद ‘एक अच्छी तरह सूचित’ व्यक्ति के रूप में ही ढालने में लगे हैं। हमें उत्कंठित मनुष्य बनाए रखने में उनकी दिलचस्पी लगभग नहीं के बराबर है। हमारी स्मृति में जो रचनात्मक उद्दीपन के बिंदु हैं, उन्हें निरी सूचनाओं से विस्थापित किया जा रहा है।
तो क्या हम मान लें कि साहित्य का काम विज्ञान और टेक्नालॉजी से और समूचे सूचना-तंत्र से चिढ़े हुए मनुष्य को ईजाद करना है। हरगिज नहीं। साहित्य का काम आज मनुष्य को अपनी एक ऐसी आंतरिक लय की खोज में आत्मीय सहयोग देना है, जो सूचना की शक्ति को संवेदना की शक्ति से विच्छिन्न न होने दे। विडंबना यह भी है कि आज साहित्यकारों की संख्या बढ़ी है लेकिन ‘साहित्य का समाज’ निरंतर सिकुड़ता जा रहा है। आज ‘समाज के साहित्य’ की मांग बहुत की जाती है, लेकिन ‘साहित्य का समाज’ कैसे बने, इसकी चिंता कम की जाती है।इक्कीवीं सदी के साहित्य का एजेंडा क्या हो, इस संबंध में यहां जो कुछ कहा, उसको समेटते हुए अंत में कुछ बातें ये भी विचारणीय है-इक्कीसवीं सदी में यह चिंता सर्वोपरि होनी चाहिए कि ‘साहित्य का अपना समाज’ कैसे बने। दूसरी बात यह कि साहित्य की रचनात्मकता का मूल्य आंकने में केवल चंद आलोचक विद्वानों की राय पर ही भरोसा करके नहीं रह जाना चाहिए। आलोचना ऐसी हो, जो रचना के मूल्यांकन में सामान्य पाठकों को भी भागीदार बनाए। सामान्य पाठक-वर्ग अपने स्वयं के विवेक और संवेदना से किसी रचना के बारे में क्या राय बना सका है, इसको भी महत्त्व दिया जाना चाहिए। तीसरी बात यह कि यह वर्ष मुक्तिबोध का शताब्दी वर्ष भी है। मुक्तिबोध की कविता में ‘सत्चित्वेदना’ और ‘सकर्मकता’ जैसे पद बार-बार आते हैं।
अपनी सकर्मकता के बल पर ‘साहित्य अपनी सत्ता’ का प्रमाण दे सकता है। कुछ विचारकों और समाज सुधारकों की अमानुषिक हत्या होने पर साहित्यकारों और अन्य कलाकर्मियों ने जो विरोध दर्ज किया, उससे यह प्रमाण मिला कि सत्ता सिर्फ राजनीति की ही नहीं होती, बल्कि साहित्य की भी होती है। मौजूदा सदी में इस सकर्मकता के साहित्य में निरंतर विस्तार होते रहना चाहिए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी साहित्य का अपने समाज से जो रिश्ता था, वह धीरे-धीरे छीजता चला गया। इसके लिए हम चाहे बाजारवाद को कोसें या यह दोष किसी और के मत्थे मढ़ दें, हकीकत यह है कि स्वयं साहित्यकार और पाठक इसमें बराबर के हिस्सेदार हैं। ऐसा क्यों हुआ कि जब समाज को साहित्य की ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है, तब साहित्य का रकबा घटता जा रहा है। इसकी पड़ताल कर रहे हैं राजेंद्र कुमार।

