नेहा मिश्रा
देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली में साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों का तांता-सा लगा रहता है। देखा जाए तो इधर के समकालीन विमर्श इन आयोजनों के केंद्र में होते हैं। इसलिए इन पर विचार जरूरी है। विमर्श जब एक ‘वाद’ के रूप में हमारे सामने आते हैं तो तुरंत एक प्रतिवाद जन्म लेता है और अगर प्रतिवाद न हो तो ये विमर्श एकपक्षीय लगने लगते हैं; संवाद की स्थिति पैदा नहीं हो पाती। अक्सर यह देखने में आता है कि गोष्ठियों में इन्हीं विमर्शों या अनुशासनों के पैरोकार उपस्थित होते हैं। वे ही आयोजक होते हैं वे ही वक्ता और वे ही अध्यक्ष। ‘उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ, हमें यकीं था हमारा कुसूर निकलेगा’ (अमीर कजलबश)। एक बेहतर संवाद के लिए पक्ष-विपक्ष का होना अनिवार्य है। गोष्ठियों में ‘अन्य’ की अनुपस्थिति संवादहीनता को जन्म देती है। इन विमर्शों के विशेषज्ञ गिन-चुने होते हैं। उनके वक्तव्यों में एक पुनरावृत्ति देखी जा सकती है। यह उनकी सीमा नहीं भी हो सकती है, एक समान विषयाधारित गोष्ठियों की पुनरावृत्ति भी इसका कारण हो सकती है।
बीते दिनों एक विश्वविद्यालय में दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। गोष्ठी अपने विषय को लेकर अनूठी थी। अनूठी इस अर्थ में कि विषय अंतरानुशासनिक ढंग का था। ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंधों में मनोविमर्श’ (चिंतामणि भाग-एक) विषयाधारित इस गोष्ठी में हिंदी, मनोविज्ञान, अंगे्रजी, आभियांत्रिकी जैसे विषयों के विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। चिंतामणि भाग-एक में संकलित निबंधों (आरंभिक दस निबंध) को मनोविकार की श्रेणी में रखने का साहस हिंदी के सुधी आलोचकों ने ही किया। आचार्य शुक्ल ने अपनी पुस्तक में कहीं भी यह दावा पेश नहीं किया है कि ये निबंध मनोविकार से संबंधित हैं। आज कुछ आलोचक शुक्लजी के निबंधों में मनोविमर्श को एक सिरे से नकारते हैं। उनका कुल लब्बोलुआब यह है कि शुक्लजी की ‘साहित्यिकता’ अपने सबसे ऊंचाई पर उन स्थानों पर है, जहां वे साहित्यिक विषयों पर लिख रहे होते हैं। जैसे ही वे मनोविज्ञान के क्षेत्र में उतरते हैं वे असफल हो जाते हैं। इसलिए शुक्लजी के निबंधों को मनोविमर्श संबंधी दृष्टि से नहीं बल्कि साहित्यिक दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए। इन निबंधों पर मनोविमर्श की दृष्टि से विचार एक तरह की ज्यादती होगी। कुछ आलोचक इन निबंधों की साहित्यिकता का बचाव करते हुए यहां तक कह उठते हैं कि ‘भाव या मनोविकार विषय से संबंधित निबंधों के आधार पर कुछ लोगों ने शुक्लजी को मनोवैज्ञानिक एवं उनके निबंधों को मनोविज्ञान समझ लिया गया है। सच्चाई यह है कि शुक्लजी के मनोविकार संबंधी निबंध मनोवैज्ञानिक नहीं है।… मनोविज्ञान व्यक्ति या समूह के क्रियाकलापों के आधार पर एक अध्ययन प्रस्तुत करता है लेकिन शुक्लजी ने किसी एक व्यक्ति के मन को आधार बनाकर निबंध नहीं लिखा है। उनके निबंधों में व्यक्ति का मन मूल केंद्र में नहीं है।’ इस कथन से शुक्लजी के निबंधों में मनोविज्ञान है कि नहीं या उसे मनोविज्ञान की श्रेणी में रखें या न रखें, इसकी जानकारी के साथ-साथ हिंदी के आलोचकों का मनोविज्ञान आसानी से समझा जा सकता है।
यह नहीं कहा जा सकता कि शुक्लजी के निबंध मनोवैज्ञानिक तर्क सरणियों को आधार बनाकर लिखे गए हैं। हर अनुशासन में लेखन की अपनी पारिभाषिक शब्दावली और अपनी तर्क सरणियां होती हैं। संभव है कि शुक्लजी ने उन तर्क पद्धतियों का अनुसरण न किया हो, पर जितना किया है उसकी जांच-पड़ताल करने में किसी को कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए। लेकिन उस जांच-पड़ताल की संभावना को खत्म कर देना कहीं से भी न्यायप्रद नहीं है और न ही लोकतांत्रिक। मनोविज्ञान और मनोविमर्श दोनों भिन्न है। जैसे ही किसी पद में विमर्श जुड़ जाता है वह तात्कालिकता और समसामयिक घटनाक्रमों की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करता है। जैसे ही विमर्श की बात होती है उसमें यह देखा जाता है कि वह विमर्श हमारे समय में कितना प्रासंगिक है। ‘विमर्श’ इतिहास के तथ्यों की वर्तमान में प्रासंगिकता देखता है। अगर यह विचार या तथ्य वर्तमान में प्रासंगिक है तो विमर्श के योग्य है अन्यथा नहीं। मनोविज्ञान और मनोविमर्श की पैरवी करना इस लेख का मकसद नहीं है लेकिन आलोचकों की यह मान्यता ‘आचार्य शुक्ल ने किसी व्यक्ति या समूह के आधार पर अपने विचार नहीं दिए हैं’ के संदर्भ में इन आलोचकों का ध्यान निबंधों के उन प्रसंगों की ओर भी जाना चाहिए जहां वे बाल-मनोविज्ञान, राम का क्रोध, गोपियों के प्रेम आदि को आधार बनाकर अपनी साहित्यिक स्थापनाएं देते हैं। ये सारी स्थापनाएं साहित्यिक विषयों से जुड़ी हुई हैं। शुक्लजी के ही आलोचनात्मक पदों के माध्यम से कहें तो उनके भाव या मनोविकार संबंधी निबंध ‘साधनावस्था’ के निबंध हैं और इन निबंधों की ‘सिद्धावस्था’ उनकी व्यावहारिक आलोचना में देखी जा सकती है। सारांश यह कि मनोविकारों या भावों की गुत्थियों का जो सूक्ष्म विश्लेषण इन निबंधों में है, आचार्य शुक्ल द्वारा की गई व्यावहारिक समीक्षा उसी का प्रतिफलन है।
संपूर्ण लेखन की कोशिश जीवन-सत्य को उद्घाटित करना ही है। विधा या अनुशासन चाहे जो भी हों। सत्य ही उनका अभिप्रेत है। जहां तक साहित्य की बात है, साहित्य तो सम्मिश्रण है। यह विशाल डिस्कोर्स का एक भाग है। सांस्कृतिक अध्ययन इस बात पर बल देता है कि साहित्य एक ऐसा कोलाज है जिसमें अन्य समस्त तत्त्व जो साहित्येतर समझे जाते हैं, भी शामिल होते हैं। इसलिए साहित्य का अपना कोई विशिष्ट गुणधर्म नहीं होता। वह उन गुणों की भी बात करता है जो दूसरे डिस्कोर्सों में सामान्यतया पाए जाते हैं। जब दो या दो से अधिक अनुशासन आपस में मिलते हैं तो एक दूसरे को खत्म नहीं करते, बल्कि साझा उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक-दूसरे को समृद्ध करते हैं। इसके उदाहरण हमारे इतिहास में भरे पड़े हैं। इतिहासकार कश्मीर के इतिहास को जानने के लिए कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ को अपने अध्ययन का हिस्सा बनाते हैं। प्लेटो का ‘रिपब्लिक’ राजनीति से संबंधित ग्रंथ होने के साथ-साथ कविता का भी उम्दा उदाहरण है।
यह दीगर बात है कि प्लेटो अपने आदर्श-राज्य से कवियों के निष्कासन की बात करते हैं। अभी कुछ वर्ष पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने अपने एक फैसले में शेक्सपियर के ‘हेमलेट’ की पंक्तियों को उद्धृत किया था – ‘समथिंग इज रॉटेन इन दी स्टेट आॅफ डेनमार्क।’ इसी तरह इतिहास के कालक्रम निर्धारण में भास के नाटकों का उपयोग इतिहासकारों ने किया है। इतनी दूर क्यों जाएं, हमारे हिंदी साहित्य में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘संपत्तिशास्त्र’ जैसे अर्थशास्त्रीय ग्रंथ की रचना की है या किन्हीं भारतेंदु में राजनीति और अर्थशास्त्र जैसे अनुशासनों की परस्पर आवाजाही देखी जा सकती है। ऐसे समय में या पहले किन्हीं भी समयों में कोई भी ज्ञान तब तक मुकम्मल नहीं होगा जब तक वह अंतर-अनुशासनात्मक न हो। अपने ही अनुशासन में सिमटे रहना जड़ता और जकड़बंदी का उदाहरण है।
एक और बात, वह यह कि अगर रचनाकारों की सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक दृष्टि पर हम विचार कर सकते हैं, करते भी आए हैं, फिर मनोविमर्श पर दृष्टि डालने में इतनी आपत्ति क्यों! क्या आचार्य शुक्ल पर हिंदी वालों का ही विशेषाधिकार है? क्या मनोविमर्श मनोवैज्ञानिकों का ही ‘ज्यूरिसडिक्शन’ है? क्या ये निबंध साहित्यकार की केवल इंटलेक्चुअल फ्लाइट मात्र हैं या निबंधों में सारी साहित्यिकता वहीं है जहां हृदय ने अपनी बात कही है? इन प्रश्नों को उठाते हुए आचार्य शुक्ल के प्रसिद्ध निबंध ‘श्रद्धा-भक्ति’ की एक पंक्ति को उद्धृत करना जरूरी है। ‘श्रद्धा के लिए आवश्यक यह है कि मनुष्य किसी बात में बढ़ा हुआ होने के कारण हमारे सम्मान का पात्र है…, जिस पर हम श्रद्धा रखते हैं, उस पर चाहते हैं कि और लोग भी श्रद्धा रखें।’ अगर सच में हम शुक्लजी को बड़ा आलोचक मानते हैं, बड़ा न भी मानें केवल हिंदी का आलोचक मानें तो भी हमें इस बात से रत्ती भर शिकायत नहीं होनी चाहिए कि शुक्लजी के निबंधों में या लेखन में दीगर दृष्टियों से विचार किया जा रहा है। बल्कि आलोचकीय प्रयास इस दिशा में हों कि हम पुन: एक बार इस भाव को जी सकें-‘यन्न भारते तन्न भारते’ (महाभारत)। यह शुक्लजी के लिए और प्रकारांतर से हिंदी के लिए बड़ा शुभ होगा।१
