संरचनावाद से लेकर उत्तर-संरचनावाद तक ‘भाषा’ को संकेतों के वृहद-तंत्र (नेटवर्क) के रूप में जाना गया है। ‘संकेत’ संकेतक और संकेतित के युग्म द्वारा ‘भाषा’ में कार्यरत हैं। ‘संकेत’ स्वैच्छिक होते हैं। यानी वे किसी समय-समाज की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ जाते हैं, परंपराएं बदलती हैं तो ‘संकेत’ भी अपना प्रारूप बदल लेते हैं। जब तक लाल झंडी रहती है, रेलगाड़ी प्लेटफार्म नहीं छोड़ती। रेल का गार्ड जब हरी झंडी हिलाता है, तो रेलगाड़ी प्लेटफार्म छोड़ देती है। लाल और हरी झंडी किसी समय-समाज की स्वैच्छिक संकेतक है। आज ये लाल बत्ती और हरी बत्ती से तब्दील हो गए हैं। किसी अन्य समय-समाज में यह सफेद-पीली बत्ती का युग्म हो सकता था। इसलिए किसी एक समय-विशेष में ‘भाषा’ अपने लिए नियमावली गढ़ लेती है। संकेतार्थ, उनके आपसी रिश्ते, एक संगतिपूर्ण पर ‘अपरिवर्तनीय ठोस शिला-खंड’ से प्रतीत होते हैं। इस भाषा के ‘ठोस’ में परिवर्तन तो समानुसार होते रहते हैं, पर इसकी गति बहुत धीमी रहती है। ‘संकेतों’ के इस स्वैच्छिक दिक् में भाषा का यह ‘ठोस’ वाच्यार्थ/ पाठार्थ को स्थिरता तो देता ही है, उसके साथ-साथ ‘जो कहा जा सकता हो’ उसकी सीमा रेखाएं भी खींच देता है। यह इसलिए चूंकि ‘भाषा’ के वृहद तंत्र के ‘नियमों’ तले ही ‘संकेत’ चयनित होते हैं और अन्य ‘संकेतों’ के साहचर्य-माध्यम से वाच्यार्थ/ पाठार्थ संभव कर पाते हैं। इसलिए वाच्यार्थ/ पाठार्थ ‘संकेत-साहचर्य सापेक्ष’ तो हैं ही, नियमों के ‘ठोस’ से बंधे हुए भी हैं। दरअसल, संरचनावाद ने ‘संकेतक’ की बहुल-धर्मिता को स्वीकार नहीं किया, उससे बचने का प्रयास किया। इससे साहित्यक-पाठ का विश्लेषण किन्हीं पूर्व-निर्धारित संकेतक-संकेतित के युग्म पर ही आधारित रहा। ‘शब्दार्थ’ की भाषा तंत्र की नियमावली पर निर्भरता से प्रसिद्ध विचारक रोलां बार्थ ने यह निष्कर्ष लिया कि ‘पाठ’ रचनाकार की ‘अभूतपूर्व-सर्जना’ का परिणाम नहीं, बल्कि ‘पाठ’ की रचना भाषा तंत्र में ‘पूर्व-विद्यमान शब्दार्थ’ के माधयम से ही संभव है। रचनाकार तो एक संकलनकर्ता भर है, जिसका कार्य सांस्कृतिक-सामाजिक कोड्स से निस्सृत विभिन्न रूपाकारों का चयन है।
संकेतक और संकेतित के मध्य किसी दृढ़ या स्थिर संबंध पर उत्तर-संरचनावाद गहरा प्रहार करता है। उत्तर-संरचनावाद की मान्यता है कि ‘भाषा-तंत्र’ ‘विभेद’ पर कार्यरत है और कोई एक संकेतित किन्हीं अन्य संकेतकों का वाहक भी हो सकता है, जो पुन: किन्हीं अन्य संकेतित का हिस्सा हो जाते हैं। इस प्रकार संरचनावाद का ‘ठोस’ उत्तर-संरचनावाद में एक गतिशील भाषा-तंत्र के रूप में बदल जाता है। उनके अनुसार ‘पाठ’ को ‘लेखकीय मंतव्य’ से ही समझ पाना उसकी बहुआयामिता संकुचित कर देना या उसे एक अंतिम संकेतित दे देना होगा। जबकि ‘पाठ’ में किसी ‘भगवान स्वरूप रचयिता’ का कोई अंतिम संदेश छिपा नहीं रहता, उसका कोई एक शास्त्रीय अर्थ या कोई एक कुंजी नही होती। ‘पाठ’ की यह बहुलता किसी प्रकार की अस्पष्टता का वाहक नहीं बनती, बल्कि ‘पाठ’ की बुनावट त्रिविमितीय हो जाती है। ‘अर्थ’ किन्हीं पारंपरिक ‘कूट’ और परंपराओं से ही नहीं, उन्हें धवस्त कर भी संभव होता है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध भाषा-मनोवैज्ञानिक जूलिया-क्रिस्टेवा की मान्यता है कि कोई ‘नया पाठ’ दरअसल अंतर्पाठ (इंटर-टैक्स्चुयोलिटी) के दिक् में ही जन्म लेता है। इस नए पाठ की संकेत व्यवस्था, ‘अंतर्पाठ’ की भिन्न संकेत व्यवस्थाओं से क्रमांकित भी हो जाती है। ‘पाठ’ निरंतर ‘बनने’ की प्रक्रिया में ही रहता है- जिसमें पाठक की ‘अर्थ-गढ़ने’ की हिस्सेदारी महत्त्वपूर्ण हो उठती है। संरचनावाद और उत्तर-संरचनावाद की बहस ने लेखक की केंद्रीय भूमिका को निरस्त करके पाठक की भागीदारी को प्रमुखता दे दी।
लंबी रचना ‘कुआनो नदी’ (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना) का एक अंश इस प्रकार है: ‘मैं भागता हूं और देखता हूं/ यह खेतिहर मजदूर भूख से मर गया/ यह चैपाए के साथ बाढ़ में बह गया/ यह सरकारी बाग की रखवाली करता था, लू में टपक गया/ यह एक छोटे रोजगार सहारे जिंदगी काट ले जाना चाहता था पर न जाने क्यों रेल से कट गया।’
इसमें न तो कहीं मानवीकरण है, न ही प्रतीकार्थ। सिर्फ तथ्यात्मक ब्योरा है। फिर भी यह, तथ्यात्मकता से इतर कुछ सूचित कर रहा है। ब्योरे की हर पंक्ति दुख की एक लकीर खींच देती है। वह (जीवन से) चला गया की हर टेक के साथ यह लकीर और गहरी होती जाती है। मर गया, बह गया, टपक गया, कट गया का अनुप्रास, एक शुद्ध तथ्यपरक काव्य-पिंजर को दुख की कड़ियों से जोड़ देता है। दुख का यह केंद्रीय भाव इस काव्यांश को निर्दिष्ट करता है, और ‘एक संवेदनहीन-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था’ के विचार को प्रतिध्वनित भी कर देता है। रचनाकार ‘भाषा-तंत्र’ से ब्योरे तो संकलित कर ही रहा है, उन्हें ‘दुख’ की माला में पिरो भी रहा है, और क्या इसी बहाने अर्थ-रूढ़ि को झकझोर भी तो नहीं रहा।
सही कविता पहले एक सार्थक वक्तव्य है। कवि धूमिल ने इसकी उद्घोषणा अपने काव्य संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ में की थी। उनकी कविता ‘कवि-1970’ का एक काव्यांश इस प्रकार है: ‘कविता में जाने से पहले/ मैं आप ही से पूछता हूं/ जब इससे न चोली बन सकती है ना चोंगा/ तब आपे कहो इस ससुरी कविता को/ जंगल से जनता तक ढोनें से क्या होगा?’
कविता का चोली या चोंगा न बन पाने की ‘असमर्थता’ एक अर्थ में उसकी उपयोगिता पर सवाल तो है ही, एक अन्य अर्थ विस्तार में उपयोगिता चोली या चोंगे की नहीं, दरअसल एक डरे-निहत्थे समाज का हथियार न बन सकने की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न है।
इसके तुरंत बाद की पंक्तियां चैकाती हैं: ‘आपै जवाब दो/ मैं इसका क्या करूं?/ तितली के पंखों में पटाखा बांध कर/ भाषा के हल्के में कौन-सा गुल खिला दूं।’ यहां एक महत्त्व की बात यह है कि अगर ‘तितली’ शब्द को ‘पतिंगा’, ‘भंवरा’ या ‘चिड़िया’ कर दिया जाए, तब पंक्ति का चमत्कार ही नहीं, अर्थ विस्तार का भी क्षय होता है। यह काव्य पिंजर शब्द ‘तितली’ तथा शब्द ‘पटाखा’ पर ही संतुलित है। दरअसल, इस काव्य पंक्ति में विलोमों का आमना-सामना करा दिया गया है- ‘कोमलता’ (तितली) और ‘धवंसात्मकता’ (पटाखा) का। तितली में जो कोमल/ नाजुक होने का भाव है, वह ‘पंतिगें’/ भंवरे/ चिड़िया में नहीं है। विलोमों की इस टकराहट के कारण काव्य-पिंजर टूट-फूट नहीं रहा, बल्कि अधिक संतुलित हो गया है। यह पंक्ति सांकेतिकता से परिपूर्ण ही नहीं, ‘बहुल-धवन्यात्मकता’ के अस्थिर उप-पाठ को भी रच लेती है। क्या ‘तितली’ कोमल/ नाजुक होने का संकेत भर है? या उसका निहितार्थ है कि ‘मात्र शब्दों से परिवर्तन संभवन नहीं’ या क्या ‘तितली’ ‘एक कमजोर मधयवर्गीय बौद्धिक का संकेत तो नहीं, जो ‘शब्दाडंबर’ में ही जीवन व्यतीत कर देता है? यह भाषा का कौन-सा हल्का है, जहां कवि ‘गुल’ खिलाना चाहता है? क्या वाकई उसका मंतव्य ‘जर्जर हो रही सामाजिक-आर्थिक और क्रूर होती जा रही राजनीतिक व्यवस्था से है? या फिर वह बौद्धिकता पर चुपचाप एक कड़ा व्यंग्य-प्रहार कर रहा है? यही पंक्ति की ‘बहुल ध्वन्यात्मकता’ है। यही तो ‘अखंडनीय बहुवचन’ (इररैडयुसिबिल प्लूरल) है।
अब अगर हम इस पंक्ति का व्यजनार्थ देखें: ‘एक कमजोर मधयवर्गीय बौद्धिक के हाथ में धवंसात्मक हथियार पकड़ा देने भर से किसी समाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल की उम्मीद बेकार है।’ इसकी तुलना ‘तितली के पखों में/ पटाखा बांध कर’ से करें तो कितना स्पष्ट है। जो चमत्कार इस पंक्ति में है- वहीं चमत्कार उसी पंक्ति के विश्लेषित-व्यंजनार्थ में नहीं है।
इससे स्पष्ट है कि ‘थियरी’ सर्जना के पीछे ही रहती है। निष्कर्षत: काव्यभाषा संकेतों का परिमार्जित रूप है। यहां संकेत मूल उद्गम से अस्थिर ही नहीं हो जाते, संकेतक और संकेतित बहुमुखी भी हो जाते हैं। आम बोलचाल की भाषा, गद्य की भाषा भी, विचारों/ अलंकारों/ रूपकों का उपयोग करती है, अंतर बस यह है कि काव्यभाषा में ये संवेगों में कहीं अधिक डूब कर आते हैं और रचना में इसी कारण उद्दीप्त हो उठते हैं। तंत्रिका विज्ञान के शोधों से यह तो माना जा चुका है कि मष्तिष्क के ‘प्री फंटल कोरटैक्स’ के कई हिस्से, विचार तर्क संवेग के संधि स्थल हैं। इसलिए विचारों/ अलंकारों/ रूपकों का संवेगों में कहीं अधिक डूब कर आना विज्ञान सम्मत है। ०

