ओमप्रकाश सिंह

गंगा को बांधने की कहानी काफी पुरानी है। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल में ही गंगा को बांधने का जो कुचक्र शुरू हुआ, वह स्वतंत्र भारत में भी जारी रहा। 1839 में ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल लार्ड आकलैंड के शासन काल में गंगा को बांधने के लिए प्रोफेसर बीटी कौटले ने हरिद्वार में एक सर्वेक्षण किया था। इसके बाद 1854 में अपर गंगा कैनाल और 1878 में लोवर गंगा कैनाल का कार्य पूर्ण हुआ। कौटले ने हिंदू भावना का सम्मान करते हुए सभी स्थानों पर रामधारा का विशेष प्रावधान गंगा के अविरल प्रवाह को बनाए रखने के लिए किया था। 1857 में ईस्ट इंडिया शासन के स्थान पर ब्रिटिश सरकार का शासन भारत में प्रारंभ हुआ। ब्रिटिश सरकार ने 1909 में भीमगोडा(हरिद्वार) में गंगा पर नए बांध का प्रस्ताव स्वीकारने के बाद 1912 में इस पर काम शुरू कराया। लेकिन हिंदू समुदाय के प्रबल विरोध के कारण 5 नवंबर 1914 में संयुक्त प्रांत के के ले. गवर्नर जेम्स मेस्टन ने गंगारक्षा समझौता किया। इस समझौते के पीछे सरकार की सोची समझी चाल थी। 1915 के प्रारंभ में हरिद्वार में कुंभ का आयोजन होना था। इस कारण हिंदू जनता के आंदोलन को रोकना जरूरी था। कुंभ मेले के बाद सरकार ने समझौते के विपरीत बांध का कार्य जारी रखा। इस बांध के विरोध में हिंदू जनता का भी विरोध जारी रहा। गंगा को बांधने से रोकने के लिए महामना मदन मोहन मालवीय गंगा रक्षा आंदोलन में लग गए।

महामना का हरिद्वार और गंगा से संबंध अतिनिकट का था। 1905 में महामना ने हरिद्वार में ‘गंगा महासभा’ की स्थापना की। उसके बाद, वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में लगे रहे। 1916 में विश्वविद्यालय की स्थापना की स्वीकृति के बाद वे ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम के एक उत्सव में भाग लेने हरिद्वार गए, तब उन्हें पता चला सरकार एक बांध बना कर गंगा के अविरल प्रवाह को रोकना चाहती है। साथ ही 1914 के समझौते का भी पालन नहीं करना चाहती। मालवीयजी ने बांध का विरोध किया। बांध के विरोध में उन्होंने सनातन धर्म सभा में प्रस्ताव पारित कराया। इसके बाद वे एक महीने तक हरिद्वार में रुके और ज्ञापन तैयार करके लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जेम्स मेस्टन को 5 दिसंबर 1916 को दिया। इस ज्ञापन पर महाराज कासिम बाजार राजा सर रामपाल सिंह, पूर्व न्यायाधीश, उच्च न्यायालय सर सुब्रहमण्यम, पुरी एवं शृंगेरी के शंकराचार्य, सच्चिदानंद सिन्हा(बिहार), सिख संत महंत लक्ष्मणदास देहरादून, आर्य समाज के स्वामी विश्वेसरानन्द सरस्वती, स्वामी मंगलनाथ-ऋषिकेश और मालवीयजी के हस्ताक्षर थे। इस ज्ञापन की प्रतियां देश के प्रमुख राजा-रजवाड़ों और संतों को भी भेजी गर्इं। मालवीयजी के इस ज्ञापन पर जेम्स गेस्टन ने 18-19 दिसंबर, 2016 को हरिद्वार में एक कॉन्फ्रेंस बुलाई, जिसमें महाराजा जयपुर, महाराजा ग्वालियर, महाराजा बीकानेर, महाराजा पटियाला, महाराजा अलवर और महाराजा बनारस, सात सरकारी अधिकारी और महामना मालवीय सहित सोलह जनता के प्रतिनिधि सम्मिलित थे।

इस प्रकार उस कॉन्फ्रेंस में सर जेम्स मेस्टन सहित कुल तीस सदस्य थे। कॉन्फ्रेंस में मालवीयजी ने गंगा के अविरल प्रवाह के संबंध में कहा था, ‘…अपर गंगा नहर हजारों मील बहती है परंतु उसके किनारे घाट नहीं हैं। नहर के किनारे के लोग भी काफी व्यय करके गंगा में ही स्नान करते हैं। इस कारण गंगा का प्रवाह अविरल रहना आवश्यक है। ……।’ विचार विमर्श के बाद 19 दिसंबर, 1916 को गंगा रक्षा का समझौता संपन्न हुआ। उक्त गंगा रक्षा समझौता शासन के आदेश् से 26 सितंबर, 1917 को लागू हुआ। शासनादेश के पैरा-7 में उल्लेख है, ‘…इस आदेश द्वारा इस बात की गारंटी दी जाती है कि गंगा का अविरल प्रवाह जारी रहेगा। चैनल नंबर एक से न्यूनतम 1,000 क्यूसेक जल प्रवाह होगा। गंगा तल से ऊपर तक खुला प्रवाह जारी रहेगा तथा हिंदू समुदाय की पूर्व सहमति के बिना इस संबंध में अन्य कोई भी कदम नहीं उठाया जाएगा। मायापुर (हरिद्वार) में स्वतंत्र प्रवाह होगा और कनखल के घाटों पर भी 200 क्यूसेक जल प्रवाहित होगा। यह शासनादेश वर्तमान में भी संविधान की धारा-363 द्वारा रक्षित है। फिर भी गंगा पर बांध और बैराज खड़े हुए।

फरक्का बैराज और टिहरी बांध और गंगा पर अन्य बांध 1916 के महामना मालवीय के गंगा रक्षा समझौते के विपरीत होने के साथ-साथ भारत की संविधान की व्यवस्था के भी विपरीत हैं। मालवीयजी ने अपनी दूरदृष्टि से देखा था कि भविष्य में गंगा को बांधने का प्रयास हो सकता है। इसी कारण उन्होंने जीवन के अंतिम दिनों में तत्कालीन न्यायमूर्ति शिवनाथ काटजू से कहा था, ‘ हो सकता है कि मेरे बाद यह समस्या फिर खड़ी हो और उस (गंगा के प्रवाह में) पांच फुट के छेद को भी बंद करने का प्रयास किया जाए। अगर ऐसा कभी हो तो तुमसे मैं कहे जाता हूं कि उसका विरोध करना और जैसे भी हो ऐसा होने मत देना ….।’ इस प्रकार महामना को जीवन के अंतिम दिनों में भी अविरल गंगा की चिंता थी। महामना मालवीय के महाप्रयाण के बाद न्यायमूर्ति शिवनाथ काटजू भी नहीं रहे। फिर गंगा की रक्षा कैसे होगी और कौन करेगा, यह प्रश्न भारतीय जनमानस में था? उसकी पूर्ति प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में सौ साल बाद हुई।

महामना जीवन के अंतिम समय में भी 1916 के समझौते की रक्षा के लिए चिंतित थे। हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने गुलामी के दिनों में 1916 के समझौते का पालन किया। लेकिन, गंगा को बांधने का कार्य स्वतंत्र भारत में व्यापक पैमाने पर हुआ। महामना के प्रयासों से 19 दिसंबर, 2016 को संपन्न अविरल गंगा समझौता लागू करने का शासनादेश ब्रिटिश सरकार द्वारा 26 सितंबर, 1917 को जारी हुआ था। इस प्रकार यह उस शासनादेश का शताब्दी वर्ष भी है। स्वतंत्र भारत में कई ऐसे बांध बने, जिससे जिससे गंगा का अस्तित्व ही मिटने लगा। अपने उद्गम गो-मुख से गंगा सागर तक जाने वाली गंगा गर्त में बदलने लगी। स्मृतियों में उल्लेख है कि -धनु: सहस्राण्यष्टौ तु गतियार्सां न विद्यते। न ता नदीशब्दवहा गर्तास्ता: परिकीर्तिता:। यानी जिनकी गति(प्रवाह) अठारह हजार धनुष तक नही होती है, वे नदियां, नदी शब्द से नहीं कही जाती हैं। उनको ‘गर्त’ शब्द से व्यवहार किया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि स्वतंत्र भारत की अधिकतर सरकारों ने गंगा को देवदुर्लभ नदी को ‘गर्त’ बनाने का कार्य किया। हिमालय में गंगा पर इतने बांध बने और प्रस्तावित हुए जिससे ‘गंगा’ का प्रवाह निरंतर अठारह हजार धनुष से भी कम होने लगा। लेकिन गंगा को ‘गर्त’ बनाने से बचाने का श्रेय मौजूदा केंद्र सरकार को दिया जाना चाहिए। स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी मंत्रालय के नाम में गंगा संरक्षण शब्द सम्मिलित हुआ।

 

 

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