अमरेंद्रनाथ त्रिपाठी
हिंदुस्तान के इतिहास में बीती लगभग दो सदियां भाषाओं में मानकीकरण के लिहाज से अहम रहीं। इस दौरान जो भाषा-स्वरूप तय करने का काम हुआ, उसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के प्रभाव पड़े। भाषा-स्वरूप व्याकरण आदि के जरिए तो तय हुआ ही, साथ-ही-साथ तय किस्म के भावों-विषयों का भी दबाव इस पर पड़ा। इसका एक नकारात्मक प्रभाव यह रहा कि भाषा में जो लोक-सुलभ प्रवृत्ति, गति, जुड़ाव, रचनात्मकता और ग्राह्यता थी वह धीरे-धीरे छीजने लगी। नई स्थितियों और चुनौतियों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन यह भी झूठ नहीं कि साक्षरता और सुशिक्षा के आधुनिक बोध ने उस लोकधारा से अपने को अलग किया जिसमें जाने कितने अशिक्षितों के कंठों से निकला लोकसाहित्य अनायास ही बहता हुआ आया था। हिंदी भाषा और साहित्य पर यह नकारात्मक प्रभाव काफी पड़ा। जाने कितने जोखिम उठाते हुए गुजराती में झबेरचंद मेघाणी, उत्तर प्रदेश में राम नरेश त्रिपाठी आदि ने लोकगीतों को इकट्ठा करने काम किया। लेकिन जिस व्यक्ति ने इस दिशा में आंदोलन की तरह कार्य किया, वह और कोई नहीं, बल्कि देवेंद्र सत्यार्थी हैं। 28 मई, 1908 को संगरूर, पंजाब में जन्मे देव इंदर बत्ता यानी देवेंद्र सत्यार्थी जीवन भर लोकसाहित्य के अध्ययन-संकलन का काम करते रहे। जो काम संस्थाबद्ध रूप में किया जाना चाहिए, उसे उन्होंने अपने एकल प्रयास से कर डाला। नृतत्वशास्त्री श्यामाचरण दूबे ने उनके बारे में कहा था, ‘अभी लोगों को पता नहीं है कि उनके बीच कितना बड़ा आदमी उपस्थित है। बरसों बाद लोग उनके कामों के महत्त्व और लोकसाहित्य में असाधारण योगदान को समझेंगे।’ वे मानते थे कि शोर करने से बेहतर है अंधेरे में कोई दिया जलाया जाए।
सोचिए कि जिस समय सत्यार्थी ने बीस सालों तक लगातार बिना थके-रुके देश के कई अंचलों में घूम-घूमकर, गांवों-बीहड़ों में जा जाकर लोकसाहित्य के संग्रह का काम किया, वह कितना कठिन और जोखिम उठाने वाला रहा होगा। उन्होंने भारतीय भाषाओं के लगभग तीन लाख लोकगीत इकट्ठे किए। भीतर का उत्साह ही उनकी प्रेरणा थी। न कोई आर्थिक मदद, न कोई सरकारी सहयोग। देवेंद्र सत्यार्थी उस पीढ़ी के थे, जिसने पराधीन भारत में जन्म लिया और आजाद भारत में अपनी आखिरी सांस, पराधीनता और आजादी के अधिक व्यापक अर्थ को समझा और जीवन में कुछ आदर्शों को अपना लक्ष्य बनाया। अपने सोचे रास्ते पर त्यागपूर्वक यात्रा की। उनके लोकसाहित्य के प्रति समर्पित कार्य को सांस्कृतिक मुक्ति की मुहिम से जोड़ कर भी देखा जा सकता है। राजनीतिक आजादी तो पंद्रह अगस्त, 1947 को मिल ही गई, लेकिन क्या सांस्कृतिक रूप से भी हम औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त हुए, यह सवाल आज भी हमारे लिए प्रासंगिक बना हुआ है और आगे भी बना रहेगा। अपने देश की लोक-धारा में गहरे पैठना और उसे जन-जन की चेतना से जोड़ना औपनिवेशिक प्रभावों का सहज प्रतिरोध है। देवेंद्र सत्यार्थी जैसे लोक-संग्रही ने इस बात को बखूबी समझा। बंगाल के अकाल की लोरी है-खोका धुकालो, पाड़ा जुड़ालो। बरगी एलो देशे, बुलबुलीते धान खाएं। खाजना दिबो किशे ? यानी शिशु सो गया, मुहल्ला खामोश हो गया, देश में बरगी (आक्रमणकारी) आ गए, बुलबुलों ने धान खा लिया। सत्यार्थी के बगैर इस लोरी को बचा कौन रख पाता?
एक रोचक और प्रेरक प्रसंग है देवेंद्र सत्यार्थी से जुड़ा हुआ। यह बात तब की है जब भारत आजाद हुआ था। रेडियो के महानिदेशक थे-अहमद शाह बुखारी पितरस। पितरस ने सत्याथीर्जी से संपर्क किया और प्रस्ताव रखा कि वे अपने ढेर सारे लोकगीतों के संग्रह से अलग-अलग बोलियों और भाषाओं के एक हजार सबसे अच्छे लोकगीतों को चुन कर उन्हें दे दें। उन्होंने कहा कि उनका रेडियो पर प्रसारण होगा और उन पर कॉपीराइट आपका होगा जिससे उसका पारिश्रमिक आपको हमेशा दिया जाता रहेगा। इस पर सत्यार्थीजी ने कहा, ‘लोकगीत आप बेशक ले लें और जितने चाहिए उतने ले लें लेकिन उसका पारिश्रमिक लेने का हक मुझे नहीं है, उन पर कॉपीराइट मेरा नहीं, भारत -माता का है।’ यह सभी को आश्चर्य में डाल देने वाली बात थी। बाद में यह घटना तमाम लोगों को पता चली तो उन्होंने सत्यार्थी जी खूब मजाक उड़ाया। इसी को लेकर मंटो ने उन्हें ‘फ्राड’ तक कहा, क्योंकि वह यह कल्पना कर ही नहीं सकते थे कि कोई आदमी आदर्शवाद के चक्कर में घर आया पैसा भी ठुकरा सकता है। लोकगीतों के संग्रह के साथ-साथ देवेंद्र सत्यार्थी द्वारा उनका मर्मग्राही विवेचन-विश्लेषण भी लोकसाहित्य के अनूठे पाठ की तरह है। उनकी अन्य लोकसाहित्य पर केंद्रित पुस्तक ‘बेला फूले आधी रात’ बहुत अहम है। १

