राजकुमार कुंभज
कविता की कठिन अराजकता से मोहमुक्त होकर समकालीन हिंदी कविता में अपनी बेहद खास पहचान बनाने वाले धूमिल और जगूड़ी के साथ-साथ चंद्रकांत देवताले का भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। मराठीभाषी परिवार में पैदा हुए देवताले का मराठी भाषा के अनेक कविता आंदोलनों से जुड़े रहने का एक विस्तृत कारण यह भी था कि उनकी दलित कवि नामदेव ढसाल, अस्तित्ववादी दिलीप चित्रे और दलित-पैंथर आंदोलनकारी कवियों-लेखकों से गहरी मित्रता थी। एक ऐसे समय में जबकि ‘यकीनों के जंगल धू-धू कर’ जल रहे हैं और ‘अच्छाइयों का अपहरण’ हो रहा है, तब देवतालेजी की गैरहाजिरी अखरती है; क्योंकि ‘खुद पर निगरानी के वक्त’ में ताकत के यंत्रों द्वारा पेश की जा रही ‘उम्मीद’ भी अब ‘एक मुहावरा है/ गुमराह करने को’।
चंद्रकांत देवताले हमारे समय की ‘चैतन्यता का ताप’ रखने वाली ‘संवेदनशील छटपटाहट’ के कवि थे, ‘जबकि अगस्त दस्तक दे रहा था’। चौदह-पंद्रह अगस्त की दरम्यानी-रात, इक्यासी बरस की उम्र में चंद्रकांत देवताले का दिल्ली में निधन हो गया। रचनात्मक-विरोध, चैतन्यता का ताप, निर्विकार सहृदयता और संवेदनशील छटपटाहट के साथ ‘भाषिक-अनुशासन’ चंद्रकांत देवताले की ‘कविता के बृहत्तर औजार हैं’, जो कभी भी, कहीं भी, अपने आसपास, घर-परिवार, प्रेम, विद्रोह सहित मानसिक मित्रों और सामाजिक सरोकारों आदि के लिए सदा उपलब्ध हैं। उनकी ‘कविता में नारेबाजी’ से कहीं अधिक ‘जीवन के सौंदर्यबोध’ की स्थापना और मुक्त-अभिव्यक्ति दिखाई देती है। उनकी कविता ‘बताती’ कम और ‘जताती-जगाती’ ज्यादा है। इस मायने में चंद्रकांत देवताले हमारे समय की ‘पूर्व-निर्धारित विचारप्रणाली से मुक्त’ आवेदन देने वाली ‘वास्तविक अनुभूति’ के कवि थे।
वे सरल स्वभाव के विरल व्यक्ति थे, विरल कवि तो थे ही। उनकी कविताओं में वायवीय या ऐंद्रियता-बोध खूब जाहिर हुआ है। समयबोध के प्रति भी वे सदा सजग रहते थे। ‘शब्दों की मुक्ति’ के लिए भी उनके यहां पर्याप्त समय और पर्याप्त जगह है। वे अपने किसी भी साधारण अनुभव को असाधारण अभिव्यक्ति प्रदान कर देने में सिद्धस्त थे। उनकी कविताओं में ‘जीवन की उत्कट-तीव्रता’ और ‘अनुभव की तीव्र-तीक्ष्णता’ दिखाई देती है। इस मायने में चंद्रकांत देवताले हमारे समय की ऐंद्रियबोध और अभिव्यक्ति की असाधारणता के भी कवि थे। बहुत संभव है कि भावनात्मक और संवेदनात्मक दिशा-निर्देशों के अनुभवबद्ध अभिव्यक्ति के तार्किक संज्ञान में, कुछेक ‘ज्ञानात्मक-स्व’ अधिक विस्तार से मुखरता पा गए हों, लेकिन फिर कविता की उस असाधारणता को कैसे पाया जा सकता है, जो साधारण जीवन को देखने-समझने और जीने की उज्ज्वल-ज्वलंतता से आती है? क्या चंद्रकांत देवताले की ‘बौद्धिक अनुभूति’ में भावनात्मक और संवेदनात्मक दिशा-निर्देशों का एक चुलबुल उत्सवप्रिय नागरिक भी नहीं ढूंढ़ा जाना चाहिए? क्या तब कविता की उस दशा और दिशा का पता लगाया जाना थोड़ा अधिक सरल-स्वाभाविक नहीं हो जाता है, जिसमें कोई भी कवि जीवन भर अपने लिए मुट्ठी भर जगह ढूंढ़ने की स्वाभाविक उधेड़बुन में लगा रहता है? यह कविता का अवमूल्यन नहीं, बल्कि अर्थ-विस्तार की एक अवधारणा ही अधिक है। इस मायने में चंद्रकांत देवताले ‘अर्थ-विस्तार’ की ‘अवधारणा’ के एक सक्षम, सजग और समर्थ कवि थे।
अकविता आंदोलन से निकल कर चंद्रकांत देवताले ने प्रगतिशीलता को अपना केंद्रीय-विचार बनाया था, पर उन्होंने अकविता और प्रगतिशीलता दोनों को ही प्रश्नांकित भी किया था। इसी बीच वे अपनी कविता को निरंतर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से जोड़ते चले गए। चंद्रकांत देवताले किसी भी निरंकुश सत्ता के विरुद्ध अपनी तमाम कमजोरियों के साथ, कविता को ही अपना सार्थक हथियार बनाते हैं। वे अतीत की प्रश्नोत्तरी न रचते हुए, वर्तमान के व्याकरण का मानवीय सरलता और सहजता से पोस्टमार्टम करते थे। उन्होंने अपनी कविताओं में शब्दों के ताप का अनुकरणीय महापर्व रचा था।
वे बड़े कद के महत्त्वपूर्ण, किंतु परिवर्तनशील कवि थे। देश, काल और परिस्थिति के मुताबिक उनकी कविताओं में राजनीतिक हस्तक्षेप की सघनता का विचार-विस्तार साफ-साफ देखा जा सकता है। चर्चित-अचर्चित की बाजारवादी मूल्यपरकता के स्वभावगत आश्रय से वे नितांत मुक्त थे, तभी तो ‘असहिष्णुता’ के मुद्दे पर उन्होंने अपना ‘साहित्य अकादेमी सम्मान’ लौटाने से खुद को अलग कर लिया था।
वे अपनी भाषा के मैदान में बेहद मासूमियत के साथ आत्मा की खिड़की खोलते थे। वे एक ऐसी कविता की तरफ बेधड़क चल पड़े, जहां प्रेम, दांपत्य, समाज, घर, परिवार, मां और प्रतिबद्धता से परिपूर्ण राजनीतिक समझ और प्रगतिशील आशय भरे पड़े थे। हिंदी में एमए करने के बाद उन्होंने अध्यापन का पेशा चुना और मुक्तिबोध पर नए अर्थ खोजने वाली पीएचडी भी की, पर उन्हें जल्द ही आभास हो गया कि यह दुनिया सिर्फ आपकी नहीं है, यहां ‘लकड़बग्घे’ भी रहते हैं।
मध्यप्रदेश शिखर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और साहित्य अकादेमी सम्मान जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित देवताले का कविता संसार उनकी दर्जन भर से अधिक कविता पुस्तकों में सुरक्षित है। गजानन माधव मुक्तिबोध पर लिखी उनकी दो पुस्तकें खासकर याद रखने लायक हैं। उन्होंने मराठी से तुकाराम के अभंगों और दिलीप चित्रे की कविताओं के हिंदी अनुवाद पर कठोर श्रमसाध्य, ज्ञानसाध्य काम किया था, जिसे आधुनिक हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर माना गया है। वे नई कविता में नए परिवर्तनों और नई अवधारणाओं के एक ऐसे कवि थे, जिन्हें प्रेमचंद सृजन पीठ का निदेशक होने का गौरव भी मिला था, पर इन सबका उन्हें कभी कोई दंभ नहीं था, बल्कि इन सब चीजों को अपने परिचय से वे अलग ही रखते थे।
उनकी कविताओं में आधुनिक चुनौतियों पर राजनीतिक विमर्श तो है ही, वे दलितों, वंचितों, शोषितों और आदिवासी जीवन की चिंताओं को भी अपनी कविताओं के केंद्र में ले आते थे। वे साधारण आदमी की साधारण संवेदनाओं और साधारण चिंताओं के असाधारण कवि थे, जिसमें आज भी ‘भूखंड तप रहा है’ और ‘लकड़बग्घा हंस रहा है’! ‘लकड़बग्धा हंस रहा है’ में वे कहते हैं: ‘इस अंधेरी रात की नब्ज को थामे हुए/ कह रहा हूं/ यह तीमारदार नहीं, हत्यारे हैं/ और वह आवाज/ खाने की मेज पर/ बच्चों की नहीं/ लकड़बग्घे की हंसी है/ सुनो…/ यह दहशत तो है/ चुनौती भी/ लकड़बग्घा हंस रहा है।’ नेहरू युगीन महास्वप्न से मोहभंग का साक्षात्कार करने वाली एक समूची पीढ़ी बदल गई। देश और दुनिया ने कई राजनीतिक परिवर्तनों से साक्षात्कार कर लिया। ठेठ राजनीति ही नहीं, समाज और सामाजिक मूल्यों में भी आमूलचूल मनुष्यविरोधी परिवर्तनों ने ‘हैरतअंगेज जगह’ हथिया ली और ईमानदारी आदि जैसे संवेदनशील मानवीय मूल्यों को अपदस्थ करते हुए शिखर पर शिकारियों ने अतिक्रमण कर लिया। किसानों की आत्महत्या और स्त्रीदेह से जैसी पाशविकता, आजादी के बाद बढ़ती गई, वह ‘दुर्लभ शर्म’ का विषय बन गई, तभी तकरीबन चालीस बरस पहले लिखी गई चंद्रकांत देवताले की ‘औरत’ कविता आज भी स्त्री विमर्श के नए अर्थ और नए द्वार खोलती है। चेहरे बदल गए, नेता-अभिनेता बदल गए, रंगमंच के आकार-प्रकार बदल गए, पार्टियों के डंडे-झंडे बदल गए, लेकिन चरित्र नहीं बदला। और वक्त का कमाल देखिए कि आज भी अपनी अंतर्शक्ति से ओत-प्रोत ‘लकड़बगघा हंस रहा है’। १
