अक्षय नेमा
विडंबना है कि एक ओर बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का अभियान चलाया जा रहा है और दूसरी ओर लड़कों की चाह में भ्रूण हत्या हो रही है। दोहरे मानकों के आधार पर एक ऐसा समाज निर्मित हो गया है, जहां महिलाओं-लड़कियों को आज भी उनके असली अधिकार नहीं मिले हैं। समाज में पितृसत्तात्मक सोच अपना घर बनाए हुए है। गर्भ में लिंग की जांच का धंधा तो भारत में लंबे समय से चल रहा है। कई बार तो लड़के की चाह में ओझाओं-तांत्रिकों के चक्कर में फंस कर बच्चों आदि की बलि तक चढ़ा देते हैं। बहुत सारे लोग तकनीक का फायदा उठाकर गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग का परीक्षण कराते हैं और अगर कहीं जांच में यह आ गया है पेट में लड़की है तो गर्भपात करा दिया जाता है। गर्भ में भ्रूण के लिंग की जांच को लेकर कड़े कानून होने के बावजूद बेटों के दीवाने दंपतियों ने अब नया और आसान रास्ता खोज निकाला है। वे भ्रूण के लिंग की जांच के लिए विदेश तक जाने लगे है। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अनुसार उसके पास ऐसी 234 शिकायतें आई हैं। ये शिकायतें केवल चार महीनों जनवरी 2017 से 5 मई 2017 के दौरान मिलीं, जिनमें 34 लोगों को नोटिस दिया गया। 123 को निजी रूप से चिकित्सा अधिकारी के समक्ष पेश होने की हिदायत दी गई। 77 के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज किया गया है। यह तो सिर्फ एक महानगर का हाल है। लोग बाकायदा एजेंटों के जरिए थाइलैंड, सिंगापुर और दुबई जैसी जगहों पर जाकर भ्रूण की जांच करा रहे हैं। अनुमान है कि राष्ट्रीय राजधारी क्षेत्र के औसतन हर साल साढ़े चार हजार दंपति लिंग जांच कराने या कन्या भ्रूण हत्या के लिए विदेश जाते हैं। यह सब तब हो रहा है जब लिंगानुपात राष्ट्रीय चिंता का विषय बना हुआ है। आंकड़ों के अनुसार 0-6 वर्ष के बच्चों के बीच पिछले 50 वर्षों में लिंगानुपातए प्रति हजार बच्चों में 1961 में 976 से गिरकर 918 हो गया है। जबकि भारतीय कानून के मुताबिक गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994 के तहत गर्भधारण पूर्व या बाद लिंग चयन और जन्म से पहले कन्या भ्रूण हत्या के लिए लिंग परीक्षण करना अपराध है।
भ्रूण परीक्षण के लिए सहयोग देना और विज्ञापन करना कानूनी अपराध है।

इसके तहत तीन से पांच साल तक की जेल व दस हजार से एक लाख रुपए तक जुर्माना हो सकता है। गर्भवती स्त्री का जबर्दस्ती गर्भपात करवाना अपराध है। ऐसा करने पर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है। धारा 313 के तहत गर्भवती महिला की मर्जी के बिना गर्भपात करवाने वाले को आजीवन कारावास या जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है। धारा 314 के तहत गर्भपात करने के मकसद से किए गए कार्यों से अगर महिला की मौत हो जाती है तो दस साल का कारावास या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। साथ ही आईपीसी की धारा 315 के तहत शिशु को जीवित पैदा होने से रोकने या जन्म के बाद उसकी मृत्यु के मकसद से किया गया कार्य अपराध होता है, ऐसा करने वाले को दस साल की सजा या जुर्माना दोनों हो सकता है। बेटियों की फिक्र को लेकर सरकारों के भी दोहरे चेहरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कहने को सरकारें प्राथमिकता से बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और कई योजनाएं चला रही है, लेकिन उनकी शिक्षा और विकास पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। पिछले दिनों आई यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया कि सुनियोजित लिंग भेद के कारण भारत की जनसंख्या से करीब पांच करोड़ लड़कियां और महिलाएं गायब हैं। संयुक्ट्र राष्ट्र ने भी बीते दिनों अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि भारत में प्रत्येक दिन औसतन दो हजार कन्या भ्रूण का गर्भपात होता है। हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है, क्योकि भ्रूण की जांच और गर्भपात करने वालों में पढ़े-लिखे और तथाकथित सभ्य समाज के लोग ही शामिल है। जो देश में प्रतिबंध होने के बावजूद विदेशों के अस्पतालों का पैकेज लेते है और गर्भ में कन्या भ्रूण होने पर उसे वहीं गिरा आते है। कुछ देशों में कन्या भ्रूण हत्या पर कोई पाबंदी नहीं है।

तमाम समाजों और परिवारों में लड़कियों के जन्म पर अपशगुन सा माहौल आज भी बना लिया जाता है। खुद लड़कियों को अपशगुन समझा जाता है। इस स्थिति के लिए परंपरावादी और दकियानूस पारिवारिक पृष्ठभूमि ही जिम्मेदार है। कई जगह तो लड़कियों के परिजन ही शिक्षा के बाद उनकी आजादी छीन कर उन्हें घर बैठा लेते हैं, जिससे उनके विचारों में रत्ती भर भी विकास नहीं हो पाता। लड़कियों को लेकर संकीर्ण विचारों में सामाजिक असुरक्षा के चलते भी तब्दीली नहीं आ पा रही है। सबसे पहले समाज की रूढ़िवादी मानसिकता और लड़कियों के प्रति संकीर्ण सोच को खत्म करना होगा। सरकारों को दोहरे मापदंडों से परहेज करते हुए त्वरित कदम उठाने होंगे। साथ ही ऐसा कोई कानून बनाना होगा जिससे कोई भी व्यक्ति विदेश में जाकर जांच न करा सके।