अमित घर में सबका चहेता था। उसे नई किताबें पढ़ना और घूमना बहुत अच्छा लगता था। गरमी की छुट्टियों में वह कई जगह घूमने गया, पर उसे तो दूर-दूर घूमना था। सोचता था, काश कहीं उसके भी पंख निकल आते और पक्षियों की तरह पूरी दुनिया घूम लेता। अगर उसके पास जादू होता, तो जरूर वह अंतरिक्ष तक चला जाता। तब तो वह चंद्रमा और मंगल ग्रह की भी सैर कर आता। वह जागती आंखों से ही अनेक सपने देख लिया करता था। यही सोचते-सोचते अचानक वह हकीकत की दुनिया में आ गया। अभी कुछ दिनों पहले ही उसके पिताजी का तबादला हुआ था। अब उसे नए विद्यालय जाना था। नए मित्र मिलने थे। जब वह पहले दिन विद्यालय गया, तो उसके नए सहपाठियों ने उससे बात नहीं की। कोई उसका दोस्त नहीं बना, इसलिए वह उदास हो गया। छुट्टी होने पर वह घर आया और मम्मी से बोला- ‘मां! यह स्कूल मुझे अच्छा नहीं लगता, मैं इसमें नहीं पढ़ूंगा।’
अमित की बात सुन कर घर के सब लोग आश्चर्य में पड़ गए। अब तो दाखिला भी हो चुका था। आखिर पहले ही दिन क्या हो गया। मां ने उसे समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह गुमसुम-सा चला गया और दूसरे कमरे में लेट गया। सबके लाख मनाने पर भी उसने खाना नहीं खाया। भूखा ही सो गया। अमित के कारण सभी लोग चिंतित थे।अमित सोच रहा था कि काश उसके पास भी परियों जैसा जादू होता, तो ढेर सारे दोस्त बना लेता और धरती-आसमान सभी जगह घूमता फिरता। यही सोचते-सोचते न जाने कब उसे नींद आ गई। तभी रात में उसे सोनपरी ने जगाया। वह बोली- ‘चलो अमित, आज मैं तुम्हें अनोखी सैर कराऊंगी।’ सोनपरी को देख कर वह खुश हो गया। उसे सैर करना पसंद था, लेकिन वह उदास होकर बोला- ‘आप तो पंखों से उड़ लेंगी, लेकिन मेरे तो पंख नहीं हैं।’ सोनपरी ने अपनी जादुई छड़ी घुमाई और एक जादुई कालीन बना दिया। अमित खुशी-खुशी उस पर बैठ गया। देखते ही देखते सोनपरी के साथ कालीन भी खुले आसमान में उड़ने लगा।
उड़ते हुए सोनपरी ने पूछा- ‘अमित, आज तो तुम भूखे हो, तुमने खाना क्यों नहीं खाया?’ अमित तो जैसे सोनपरी से ढेरों बातें करना चाहता था। वह बोला- ‘परी मां, स्कूल में मेरा कोई दोस्त नहीं है। कोई मुझसे बात नहीं करता है। यह स्कूल मुझे अच्छा नहीं लगता।’ ‘तो इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम खाना ही न खाओ। लो, चलो यह खाओ।’ कहते हुए सोनपरी ने छड़ी घुमा कर स्वादिष्ट भोजन की एक थाली उसे पकड़ा दी। उसने कालीन पर बैठ कर भोजन किया। भोजन करने के बाद वे आकाश में चांद-सितारों के आसपास घूमने लगे। अमित ने कहा- ‘परी मां, मुझे चंद्रमा पर जाना है।’ इतना सुनते ही सोनपरी ने छड़ी घुमाई और अगले ही पल वे लोग चंद्रमा पर खड़े थे। वहां अमित ने चंद्रमा की मिट्टी और वहां के गड्ढों को देखा। इसके बाद दोनों ने दूर तक ग्रहों-उपग्रहों के चक्कर लगाए। अमित को सब कुछ अच्छा लग रहा था। तभी सोनपरी ने कहा- ‘बेटा, तो तुम नए दोस्त बनाना चाहते हो न!’
‘हां परी मां!’
‘तब तो तुम्हें खुद दोस्ती का हाथ बढ़ाना होगा।’ ‘लेकिन, वे सब तो अनजान बच्चे हैं। मैं किसी को नहीं जानता हूं।’ ‘सही कहा। जैसे तुमको वे बच्चे अनजान लगते हैं, उसी तरह उन बच्चों को तुम अनजान लगते हो। अब जान-पहचान बनाने के लिए दोस्ती का हाथ तो बढ़ाना ही पड़ेगा। तब देखना तुम्हें स्कूल में कितना अच्छा लगेगा।’ सोनपरी ने समझाया।‘हां परी मां, यह सही बताया आपने। लेकिन मैं उनसे क्या बातें करूंगा?’ वही सब बातें, जो तुम्हें अच्छी लगती हैं। उन्हें बताना कि तुमने छुट्टियां कहां और कैसे बितार्इं। तुम्हें क्या करना अच्छा लगता है और साथ ही साथ नए दोस्तों से पूछना कि उन्हें क्या-क्या अच्छा लगता है?’
‘वाह परी मां! यह तो बहुत अच्छी तरकीब है दोस्त बनाने की।’ वह प्रसन्न था। सोनपरी से कहा- ‘धन्यवाद परी मां। अब सुबह होने वाली है, मुझे विद्यालय जाना है और कई दोस्त भी बनाने हैं। कृपया मुझे मेरे घर तक छोड़ दो।’ सोनपरी ने छड़ी घुमाई और कालीन ने अमित को घर के सामने छोड़ दिया। अब वह सोनपरी को हाथ हिला कर विदा कर रहा था- ‘कल फिर आना परी मां, विदा… विदा।’अमित की मां ने उसे बिस्तर पर हाथ हिलाते देखा तो उसे जगाया और पूछा- ‘बेटा, किसको विदा कर रहे हो?’
अमित बिस्तर छोड़ कर मां से लिपट गया और बोला- ‘मां, अब मैं विद्यालय जाऊंगा।’
इतना सुनते ही सबके चेहरे खिल उठे। १

