मुझे नहीं मालूम कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वसीयत लिखी भी थी कि नहीं। अगर नहीं लिखी थी, तो भी उनकी कविताएं एक तरह से उनका वसीयतनामा हैं। अपनी कविताओं के जरिए अटल जी ने अपने अंतर्मन की भावनाएं, आशाएं, अकांक्षाएं और समर्पण को पूरी तरह से अभिव्यक्ति प्रदान की है। वसीयतनामा, जिसे अंग्रेजी में लास्ट विल ऐंड टेस्टामेंट कहा जाता है, अमूमन दो भागों में होता है। एक भाग में व्यक्ति अपनी चल-अचल संपति के परिवार में बंटवारे की बात करता है, तो दूसरे भाग में वह बताता है कि उसके जीवन के क्या उद्देश्य थे और उनको पाने के लिए उसने कौन-कौन से प्रयास किए थे। वह अपने तजुर्बों से मिली सीख को भी जिल्दबंद करने के कोशिश करता है, जिससे उसके बाद वाली पीढ़ी उनसे फायदा उठा सके। एक तरह से वसीयत लिखने वाला व्यक्ति अपने निकटतम सगे संबंधियों और जानकारों को अपने जीवन का निचोड़ बताने की कोशिश करता है। उसमें उसका संपूर्ण व्यक्तित्व झलकता है। अक्सर जीवन के आखिरी लम्हों में वह अपनी चाहत को भी बताता है।
देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपना वसीयतनामा 1944 में लिखना शुरू कर दिया था। वे उस समय अहमदनगर फोर्ट में कैद थे। एक नजदीकी रिश्तेदार की अचानक मौत ने उन्हें वसीयत के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया था। उन्होंने वहीं पर वसीयत लिखनी शुरू तो कर दी थी, पर अगले दस साल तक वे उसे पूरा नहीं कर पाए थे। अंतत: 21 जून, 1954 को उन्होंने अपना वसीयतनामा सील बंद किया था। नेहरू कवि नहीं थे, पर उनका गद्य पद्य समान था। दुनिया में शायद ही कोई राजनेता ऐसा होगा, जिसने नेहरू की तरह इतना सारा और इतना अच्छा लिखा होगा। अपनी वसीयत में नेहरू ने अपने पार्थिव शरीर के साथ क्या करना है, बहुत स्पष्ट लिखा है। वे लिखते हैं कि अगर मेरी मृत्यु देश से बाहर होती है, तो अंतिम संस्कार वहीं पर कर दिया जाए। संस्कार संपन्न होने के बाद अस्थियों को भारत लाया जाए और उसमें से एक हिस्से को इलाहाबाद में गंगा में विसर्जित कर दिया जाए। बाकी हिस्से को हवाई जहाज से दूर असमान में ले जाया जाए और वहां से भारत की सरजमीं पर बिखरा दिया जाए, ताकि ‘मैं उस मिट्टी में मिल जाऊं, जिसमें मेरे देश के किसानों का पसीना बसा है। मेरी अस्थियों का कोई भी हिस्सा किसी भी प्रकार से सुरक्षित न रखा जाए।’
इंदिरा गांधी ने भी अपना वसीयतनामा नहीं लिखा था, हालांकि उनके हाथ से लिखा एक कागज बाद में जरूर मिला था, जिसमें उन्होंने अपनी हिंसक मृत्यु होने की संभावना जताई थी। उन्होंने लिखा था की अगर मेरी मृत्यु किसी हिंसक वारदात में होती है, जैसा कि कुछ लोगों को आशंका है और जिसकी कुछ गिने-चुने लोग साजिश कर रहे हैं, तो मुझे मालूम है कि हिंसा हत्यारे की सोच और क्रिया में होगी, न कि मेरी मौत में। इंदिरा गांधी को शायद आने वाले हिंसक पलों का अनुमान था। अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले ही उन्होंने ओड़ीशा की एक जनसभा में कहा था कि इससे फर्क नहीं पड़ता है कि वे मरें या जीएं… जब तक उनमें सांस है, वे देश की सेवा करती रहेंगी और उनके लहू की हर बूंद देश के लिए समर्पित रहेगी।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, सोनिया और राजीव गांधी अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर बेहद सशंकित थे। हिंसक मौत होने की सारी संभावनाएं थीं और इसलिए सोनिया और राजीव ने लिखा था कि अगर वे मारे जाते हैं, तो उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में एक साथ हो। वे शायद अपने रिश्ते और लगाव को जिंदगी रहते और मौत के बाद भी रेखांकित करना चाहते थे। राजनेताओं और प्रसिद्ध व्यक्तियों के लिए अपनी वसीयत में लिखने के लिए बहुत कुछ होता है। अपने कार्य के प्रति निष्ठा और उससे प्राप्त उपलब्धि उनके जीवन का खुला दस्तावेज होती है। पर वसीयतनामा लिखते समय हर व्यक्ति थोड़ा भावुक होकर अपने अंतर्मन की बात भी अक्सर कह जाता है- जैसे उसके जाने के बाद लोग उसे उसकी किस विशेषता को याद करें। वह संकेत देने की कोशिश करता है कि वह जो कुछ दिखता था, उससे थोड़ा-सा ज्यादा और कुछ भी था। शायद इसीलिए वह अपने भीतर छिपी भावनाओं को वसीयतनामे के जरिए व्यक्त कर देता है। अपनी असली पहचान बताने का प्रयास करता है। नेहरू ने गंगा का लंबा भावनात्मक जिक्र करके ऐसे ही किया था।
नामी-गिरामी लोगों को अगर छोड़ दें, तो एक आम आदमी का वसीयतनामा क्या हो सकता है? हमारी-आपकी ‘लिगेसी’ क्या है? सिर्फ संपति या पद नाम? या फिर सामाजिक गरिमा, जो एक सीमित स्तर पर हमने हासिल की है? वास्तव में, अगर हम अपने को टटोलें, तो पाएंगे कि हमारे पास ठोस कुछ नहीं है। एक हाथ से जो अर्जित किया था वह दूसरे हाथ से खर्च हो गया है। हममें खालीपन पैठ गया है और साल-दर-साल हमारे निजी अंधे कुएं का विस्तार होता ही जा रहा है। शायद हममें से कोई बिरला ही होगा, जो अपने वसीयतनामे में यह लिखने की हिम्मत करे कि वह एक अच्छा इंसान या सच्चा इंसान था। हां, हममें से बहुत सारे लोग यह जरूर लिख पाएंगे कि वे ‘बड़े इंसान’ थे, जिनकी उपलब्धियां उनके भीतर के इंसान से कई गुना बड़ी थीं और उन पर पूरी तरह से हावी थीं।
एक तरह से मेरी भीतरी पहचान ही मेरी असली वसीयत है। अच्छा आदमी होना, सच्चा आदमी होना मेरे जैसे आम आदमी के लिए अतुल्य व्यक्तिगत और सामाजिक उपलब्धि है। आज की तारीख में सच्चा आदमी अच्छा आदमी नहीं माना जाता है। आज अच्छा आदमी वही है, जो सच के साथ गाहे-बगाहे थोड़ी-बहुत छेड़खानी करता रहे यानी अपनी ‘इमेज’ बनाए रहे। वास्तविकता चाहे कैसी भी हो, पर इमेज जरूर अच्छी होनी चाहिए। यह माना जाने लगा है कि सब इमेज का ही खेला है, बाकी व्यर्थ है। सालों पहले मुझे मेरे पिता ने अपना वसीयतनामा दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर तुम अच्छे आदमी बनोगे, तो तुम्हारे साथ सिर्फ अच्छी चीजें होंगी। आज मैं संतुष्ट हूं, क्योंकि अमूमन मेरे साथ अच्छा ही हुआ है और इसी वजह से अगली पीढ़ी के लिए मेरा भी यही वसीयतनामा है कि अगर अपने लिए अच्छा चाहते हो, तो सच्चा-अच्छा आदमी बनो। सिर्फ ऐसे आदमी के अंदर कोई अंधा कुआं नहीं होता है।

