हिंदी साहित्य और आलोचना में जो दो बीज शब्द हैं, वे हैं- लोक और परंपरा। लोक के साथ कल्याण का अभिप्राय आरंभ से जुड़ा रहा है। यही नहीं, लोक के साथ एक और बात जो गहरे तरीके से जुड़ी है, वह है उसकी रागात्मकता। देश में कोरोना से जब दूसरी-तीसरी मौत ही हुई थी, तब से मैथिली, भोजपुरी और अंगिका जैसी बोलियों-भाषाओं में इस महामारी को लेकर गीत न सिर्फ बनने शुरू हो गए बल्कि लोकप्रिय भी होने लगे।
कह सकते हैं कि कुछ दिनों में ही भारत एक ऐसे देश के तौर पर समाने आया, जो एक तरफ कोरोना से संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस महामारी के आगमन की क्रूर आकस्मिकता और उसकी विदाई की लोककामना को गाने भी लगा। अखबारों, टीवी चैनलों पर आज अगर ऐसी खबरें आ रही हैं कि लोग खुद से पहल करके कोरोना संक्रमण के खतरों के बीच अपनी रोजी-रोटी खोने वालों के लिए जनता रसोई चला रहे हैं, तो यह कहीं न कहीं दिखाता है कोरोना का कहर मानवीय करुणा को संक्रमित करने में असमर्थ है।
शकील का गीत सुनने का वक्त
आजादी के एक दशक बाद बनी थी फिल्म ‘मदर इंडिया’। फिल्म में जीवन की अपनी त्रासदी और सामाजिक उत्पीड़न के साथ संघर्ष करती दिखती एक महिला। इस किरदार को नरगिस ने जिस तरह निभाया, वह तारीखी मिसाल है। महिला का पूरा परिवेश ग्रामीण है। वह कृषि प्रधान कहे जाने वाले भारत के विरोधाभासों के उभार के बीच जूझती दिखती है। फिल्म में महिला को जब इन हालात में टूटते, फिर अगले ही क्षण अपनी बिखरी उम्मीदों को बटोरते और संघर्ष करते हुए दिखाया जाता है, तो गीत गूंजता है- दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा, जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा।
इस गीत को लिखा है शकील बदायूनगी ने। बताते हैं कि शकील साहब चाहते थे कि वे ऐसा गीत लिखें, जिसमें जीवन का आशावाद इस तरह फूटे कि कम से कम गीत सुनने के बाद लोगों का भरोसा गाढ़े से गाढ़े वक्त में उनका साथ न छोड़े। पर इसमें कठिनाई यह थी कि फिल्म की नायिका जिस तरह जिंदगी के तमाम मोर्चों पर हांफती-जूझती है, वह पीड़ा कहीं इकहरी न दिखने लगे। लिहाजा शायर ने गीत का ‘टोन’ थोड़ा ‘डाउन’ ही रखा है। गीत में आगे है- गम जिसने दिया है, वही गम दूर करेगा। यह संकट में पड़े व्यक्ति का अचानक भाग्यवादी हो जाना नहीं बल्कि पूरी आस्था के साथ अपने भीतर इस यकीन को उतारना है कि जीवन नदी की तरह है और बहाव उसका लक्षण ही नहीं बल्कि उसकी नियति भी है।

