सुविज्ञा जैन
पुरुष समानता की बात चले पांच दशक गुजर गए। उससे भी एक दशक पहले विश्वस्तर पर बात स्त्री की स्वतंत्रता से शुरू हुई थी। होते-होते आज स्थिति यहां तक पहुंची है कि देश में और सारी दुनिया में महिला सशक्तीकरण का नारा सुनाई देता है। अब तक हुआ क्या है? एक देश के रूप में इस मामले में हम कहां हैं? इसका आकलन मुश्किल काम है। तथ्यों के लिए सर्वेक्षण की जरूरत पड़ती है। और सर्वेक्षणों से हर सरकार को डर लगता है। हो सकता है इसीलिए गैर सरकारी संस्थाएं भी वस्तुस्थिति के अध्ययन से बचती हों। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि समानता के नजरिए से स्त्री और पुरुष के बीच अवसरों की असमानता की नापतौल हो ही न रही हो। मसलन इस खाई की चौड़ाई का आकलन वर्ल्ड इकनोमिक फोरम करता है। वैश्विक लैंगिक सूचकांक नाम के इस आकलन में विश्व के 144 देशों में हमारा नंबर 108 है। सन 2016 में हम 87वें नंबर पर थे। यानी दूसरे देशों की तुलना में हमारी दुर्गति गौरतलब है। छोटे-छोटे और विपन्न देश तक इस मामले में हमसे बहुत आगे हैं। इसलिए स्त्री-पुरुष समानता या महिला सशक्तीकरण के कुछ पहलुओं को और ज्यादा बारीकी से देखने की दरकार है।
क्या महिला की परंपरागत भूमिका में बदलाव आया?
वैश्विक स्थिति देखें तो वर्ल्ड बैंक की इंडिया डेवेलपमेंट रिपोर्ट 2017 के मुताबिक, महिला कार्यबल के मामले में हमारी स्थिति 131 देशों में 120वें नंबर पर है। महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में हमारी यह दुर्गति भीतर जाकर जांच पड़ताल की मांग कर रही है। यह निर्विवाद है कि अपने देश में परंपरागत रूप से औसत महिला खेत और घर के सारे काम निपटाने में लगी थी। कार्यबल में कृषिकर्मी को शामिल करने के बावजूद विश्वस्तर के आकलन में हमारा 120वां नंबर आने के मायने क्या हैं? दरअसल एक तथ्य यह भी है कि महिलाएं सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में खेती या घर के बाहर के दूसरे काम करती हैं। इस तरह विश्व स्तर की रैंकिंग में इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा है कि हमारे देश की महिलाएं खेती के काम में हाथ बंटा रही हैं। इसीलिए यह देखने की जरूरत है कि फिर हम कहां पिछड़ रहे हैं? इसे तलाशने के लिए कुछ और तथ्यों पर गौर करना पड़ेगा। दरअसल विश्वस्तर पर किसी देश के कुल कार्यबल की नापतौल के लिए उत्पादक कार्यों का वर्गीकरण भी किया गया है। इस वर्गीकरण में कृषि या कुटीर उद्यम के अलावा विनिर्माण और सेवा क्षेत्र भी शामिल हैं। विनिर्माण और सेवा-क्षेत्र को मिलाकर हम उसे तकनीकी भाषा में उद्योग जगत यानी कॉरपोरेट सेक्टर कहने लगे हैं। अपने देश में यह संगठित क्षेत्र ही समझा जाता है। देश के आर्थिक विकास के मापन में यह कॉरपोरेट क्षेत्र ही बड़ी भूमिका निभाता है। एक तरह से पूरी की पूरी हिस्सेदारी कॉरपोरेट की ही है। मसलन देश के सकल घरेलू उत्पाद में इस क्षेत्र की भागीदारी 85 फीसद है। लिहाजा जब यह देखेंगे कि कॉरपोरेट में महिला की हिस्सेदारी क्या है, तभी पता चलेगा कि उत्पादक कार्य के लिहाज से महिला की स्थिति कितनी बदली। तभी यह दिखेगा कि महिला की परंपरागत भूमिका में कितना बदलाव आया?
भारत में महिला की भागीदारी
कोई भी सुनकर चौंक सकता है कि इतने भारीभरकम प्रचार और नारेबाजी के बाद भी कुल महिला कार्यबल में से कारपोरेट सेक्टर में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 17 फीसद है। विश्व बैंक की इंडिया डेवेलपमेंट रिपोर्ट 2017 का यही वह आंकड़ा है जिसने हमें 131 देशों की महिला कार्यबल की सूची में सबसे निचले स्तर यानी 120वें नंबर पर डाल रखा है। हमारे देश में महिलाओं के शिक्षण और प्रशिक्षण की स्थिति वैसे कोई बहुत अच्छी नहीं रही। फिर भी चिंताजनक बात यह है कि भारत की कुल स्नातक महिलाओं में 65 फीसद महिलाएं आर्थिक रूप से किसी भी उत्पादक कार्य पर नहीं लगाई जा सकी हैं। शिक्षित और अशिक्षित मिलाकर भी कुल आबादी की 26 फीसद महिलाएं ही भारत के कार्यबल का हिस्सा बन पाई हैं। वैसे बहसतलब होकर कहा जा सकता है कि इस समय देश में रोजगार के अवसर पैदा ही नहीं हो पा रहे हैं। यहां याद दिलाया जा सकता है कि बात कॉरपोरेट कार्यबल में महिलाओं की समतुल्य बराबरी की हो रही है। इस तरह वाद यह है कि जितने भी अवसर पैदा हो रहे हैं उनमें महिलाओं की हिस्सेदारी समतुल्य क्यों नहीं है। इसके अलावा एक और बात है। जब हमने मान रखा है कि बराबरी देने के लिए उनके आर्थिक सशक्तीकरण की जरूरत है तो उसे खारिज करने के लिए कोई यह बहाना न बनाने लगे कि उन्हें रोजगार देने के लिए उनके पास शिक्षा या प्रशिक्षा नहीं है। वे यह कुतर्क भी दे सकते हैं कि महिला को पहले शिक्षण प्रशिक्षण की जरूरत है। इसीलिए यह आंकड़ा दिया गया है कि इस समय 65 फीसद स्नातक शिक्षित प्रशिक्षित महिलाएं भी बेरोजगार हैं। यानी अगर हम चाहें तो हमारे पास तत्काल ही और पूरा मौका है कि उन महिलाओं को रोजगार के समान अवसर देकर उनका सशक्तीकरण कर दें। हालांकि फिर वे देश के पास संसाधनों का तर्क ले आते हैं। उनसे कहा जा सकता है कि मसला प्राथमिकता का तो बनता ही है। खासतौर पर तब तो और भी ज्यादा जब देश के कुल महिला कार्यबल में कॉरपोरेट भारत में उनकी भागीदारी सिर्फ 17 फीसद ही हो। बाकी इस जटिल मसले पर सरकारी विद्वान और गैरसरकारी विद्वान लोग आपस में बहस करके कुछ तय कर दें कि आर्थिक रूप से महिला सशक्तीकरण के लिए क्या किया जाए।

मिथक पर भी कर लें मंथन
महिलाओं को नौकरी न देने के पीछे कई साल से चले आ रहे मिथक भी हैं। मसलन महिलाएं पुरुषों की तुलना में नौकरियां जल्दी बदलती हैं। वे तनाव में काम नहीं कर पातीं। बाहरी परियोजनाएं नहीं कर पातीं। घर और काम को एक साथ संभाल पाएंगी या नहीं। घूमने वाली नौकरी नही कर सकतीं। भावनात्मकता में फैसले लेती हैं। तय समय से ज्यादा रुक कर काम नहीं कर सकतीं। और भी ऐसे कई रूढ़िवादी तर्क महिलाओं के साथ जोड़कर रखे गए हैं। गौर से सोचेंगे तो पता चलेगा कि ऐसी सोच संस्थागत खामियों के बजाए सामाजिक विषमता के कारण बनी बनी है। और यही बात नियोक्ता संस्थानों या प्रतिष्ठानों के रवैए को तय करती है। आमतौर पर दिखता है कि जितनी महिलाएं उद्योग जगत में रोजगार पाई हैं उन्हें सिर्फ प्रवेश स्तर और मध्य स्तर की नौकरियों तक सीमित करके देखा जाता है। अपवादों को छोड़कर ऊपर की भूमिका तक बहुत कम महिलाएं पहुंच पाती हैं। इस मुद्दे पर कुछ समय से पूरी दुनिया में बातें उठ रही हैं। ‘ब्रेकिंग द गिलास सीलिंग’ से लेकर ‘मी टू’ कैंपेन में उद्योग जगत, मनोरंजन और राजनीति जैसे कई क्षेत्रों की महिलाओं ने भाग लिया। यह साबित करता है कि महिलाओं में अपने लक्ष्य हासिल करने की इच्छाशक्ति बढ़ रही है। बस उन्हें बराबरी के मौके चाहिए।
ज्यादा जरूरी क्यों है महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना
कोई एक दशक से हम दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा में हैं। बड़े-बड़े जानकार सुझाव दे रहे हैं कि देश की आधी आबादी होने के नाते महिलाएं आर्थिक वृद्धि में एक बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। हाल ही में दावोस में हुई वर्ल्ड इकनोमिक फोरम की बैठक में आइएमएफ प्रमुख क्रिश्चयन लेगार्ड ने एक शोध का हवाला देते हुए कहा है कि भारत के कार्यबल में अगर पुरुषों के साथ महिलाओं को भी बराबरी का मौका दिया जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 27 फीसद तक बढ़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक अगर महिलाओं को ज्यादा अवसर दिए जाएं तो भारत की वृद्धि दर 4 फीसद तक बढ़ सकती है। ऐसी ही बात पिछले साल ग्लोबल आंत्रप्रेन्योरशिप समिट में भी निकल कर आई थी। ये बातें इस समय ज्यादा महत्त्व की इसलिए हैं कि जहां एक तरफ बेरोजगारी का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ कॉरपोरेट जगत से आए दिन सुनने को मिलता है कि कुशल और रोजगार के लायक कामगार नहीं मिलते। महिलाओं का एक बहुत बड़ा तबका है जो कॉरपोरेट जगत के इस प्रवेश स्तर से लेकर ऊपर तक के पदों के लिए जरूरत को पूरा कर सकता है। ऐसा हो पाने के लिए बस कुछ मिथकों से बाहर निकलने की जरूरत है। महिलाओं को सिर्फ उनकी वास्तविक योग्यता और अनुभव के आधार पर ही काम करने का मौका देना ही काफी है।
मसला कौशल विकास का
हालांकि कौशल विकास के नारे का सरोकार सिर्फ नीली कमीज रोजगार तक सीमित है। इस तरह कारपोरेट के लिए सफेद कमीज रोजगार से उसका ज्यादा संबंध नहीं दिखता। फिर भी बढ़ती बेरोजगारी के इस दौर में प्रशिक्षित महिलाओं को भी कौशल विकास का सुझाव मिल रहा है। मसलन सभी के लिए समय प्रबंधन का कौशल, टेलीकॉन्फ्रेंसिंग और ऑनलाइन मीटिंग की तकनीक जैसे कई हुनर देने के लिए उन्हें अतिरिक्त कौशल देने की बात हो रही है। कॉरपोरेट जगत के कुछ प्रतिष्ठानों ने महिलाओं के लिए उनके जीवन और काम के बीच तालमेल के लिए कई प्रशिक्षण कार्यक्रम भी विकसित कर लिए हैं। इन कार्यक्रमों से महिलाओं को यह भरोसा मिल रहा है कि उनके हुनर को प्रतिष्ठान की तरफ से सम्मान भी दिया जा रहा है। वैसे संसाधनों की कमी से जूझ रहे इस दौर में एक ही व्यक्ति से कई कई काम करवा लेने का लालच स्वाभाविक है। ऐसे में पहले से प्रशिक्षित पेशेवर युवा को अतिरिक्त कौशल विकास की जरूरत से कौन इनकार कर सकता है। रोजगार के लिए भयंकर मारामारी के दौर में हम सिर्फ अपने क्षेत्र में विशेषज्ञता वाले काम तक सीमित रहने का तर्क नहीं दे सकते। यह बात महिलाओं के सशक्तीकरण पर सोचते समय मान ही लेना चाहिए।
कॉरपोरेट के जिम्मे ही दिखता है यह काम
पूरे विमर्श के बाद यह तो तय हो गया कि आर्थिक विकास में 85 फीसद योगदान करने वाला कॉरपोरेट जगत ही स्त्री-पुरुष समानता के काम में बड़ी भूमिका निभा सकता है। समर्थ भी वही है। अब बात यह आती है कि कैसे? सुझाव देने के पहले बताया जा सकता है कि अभी प्रतिष्ठान का सांगठनिक ढांचा पुरुषों से काम लेने के लिहाज से बना हुआ है। यानी महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे ही खुद को प्रतिष्ठान के लिहाज से ढालें। लेकिन ऐसा हो सकने में देश की सामाजिक गति एक अड़चन बनकर सामने खड़ी है। लिहाजा सामाजिक गति के मद्देनजर सुझाव यह है कि उद्योग प्रतिष्ठान को महिला केंद्रित नई नीतियां और सपोर्ट स्ट्रक्चर बनाने की जरूरत है। जैसे लचीली कार्यप्रणाली, काउंसलिंग, प्रतिष्ठान के नेतृत्व में कौशल निर्माण की पहल, बच्चों के लिए विश्वसनीय पालनाघर आदि।

