आज बच्चों का पालन-पोषण एक जटिल काम हो गया है। जिस तरह हर क्षेत्र में प्रतियोगिताएं बढ़ गई हैं, उसमें हर अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा बेहतर प्रदर्शन करे, कामयाबी की ऊंचाइयां चढ़े। इसलिए वे हर समय उसे कुछ न कुछ समझाते-सिखाते, अपने जीवन के अनुभव बताते रहते हैं। कई अभिभावकों को लगता है कि उनका बच्चा ठीक से फैसले नहीं कर पाता। मगर बदलते समय के मुताबिक बच्चे अपना भला-बुरा खुद समझ लेते हैं। बच्चों के पालन-पोषण में क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, बता रही हैं अनीता सहरावत।
आप कैसे अभिभावक हैं? क्या यह सवाल कभी आपने अपने बच्चों से पूछा है? आप में से काफी लोगों का जवाब हां होगा, काफी लोगों का जवाब ना भी होगा और बहुतेरे लोगों के लिए यह एक बेतुका सवाल होगा। यह सवाल पूछने की वजह सिर्फ इतनी है कि हमारे बच्चे हमसे कितना खुल कर बात करते हैं? अक्सर अपने बड़प्पन के चक्कर में बच्चों से बातचीत करने और उन्हें जानने-समझने की हम जरूरत ही नहीं समझते। आजकल बड़े होते बच्चे हर अभिभावक की चिंता का विषय हैं, क्योंकि यहां अनुभव और आधुनिकता का टकराव आपको हर जगह देखने को मिल जाएगा। मां-बाप और बच्चों के बीच बढ़ती दूरी की ठीकरा हम इंटरनेट और सोशल मीडिया के मत्थे मढ़ कर आगे सरक जाते हैं। कई बार महसूस होता है कि तकनीक उन्नत नहीं थी, तो जिंदगी ज्यादा आसान थी। सूचना और सुविधाएं जितनी नजदीक आती गर्इं, रिश्ते उतने ही दूर होने लगे। पर क्या वाकई तकनीक ने रिश्ते उलझाए हैं? नहीं, यह पेचीदगी हमारी अपनी समझ और संवाद से उपजी है। तब क्या यह मान लें कि पारिवारिक रिश्तों में कोई उम्मीद नहीं बची है। क्या बच्चों को उनका भला-बुरा न बताया जाए। आजादी के नाम पर उन्हें लापरवाह बनने दिया जाए? क्या बच्चे अपना भला-बुरा मां-बाप से बेहतर समझने लगे हैं?
दोस्त बनें, बॉस नहीं
किशोरावस्था और युवावस्था में बच्चों में बहुत से शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं, जिन्हें सुलझाने में उन्हें मुश्किल होती है। बच्चा बखूबी जानता है कि आप उसे सबसे बेहतर तरीके से जानते हैं, अगर आपका बच्चा खुल कर आपसे बात करता है, तो परेशानी के समय में मदद के लिए भी वह आप ही के पास आएगा। ऐसे में उसकी परेशानी को समझें, सलाह भी दें, लेकिन कोई अंतिम निर्णय थोपें नहीं। जबर्दस्ती आप एक-दो बार बातें मनवा सकते हैं, लेकिन अगली बार वह आपके पास नहीं फटकेगा। अभिभावक आप उसके हमेशा रहेगें, पर दोस्ती कमानी पड़ेगी।
जिम्मेदारियां सौंपें
कहावत है कि मां-बाप के लिए बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं। यह बात लाड़-प्यार तक तो ठीक है, लेकिन हमेशा सब-कुछ थाली में परोस कर भी न दें। शुरुआत उनकी जिम्मेदारियों से करें। अपने काम उन्हें खुद करने दें। गलतियों पर डांटे नहीं और न ही अपनी खूबियों का बखान करें। सीखने में मदद करें। इससे बच्चे में भी आत्मविश्वास के साथ-साथ जिम्मेदारी का भाव आएगा। इससे बच्चे का आप पर भरोसा भी बढ़ेगा।
भरोसा करना सीखें
हर मां-बाप जानते हैं कि उनका बच्चा कब, कहां और कितना झूठ बोल रहा है। लेकिन जरूरी नहीं कि आप हर बार पूरे सही साबित हों। हमेशा शक न करें, कभी-कभी जान-बूझ कर झूठ पर भी भरोसा दिखाएं, लेकिन यह भी जानने की कोशिश करें कि आखिर बच्चा आपसे झूठ बोल क्यों रहा है। सही वक्त देख कर बच्चे से इस पर खुल कर बात करें।
निर्णय में शामिल करें
बच्चों को बड़ा होने दें। हर मसले में नहीं, लेकिन घर के कुछेक जरूरी मामलों में उनकी भी राय को सुनें। इससे उन्हें लगेगा कि परिवार में उनकी भी अहमियत है। जरूरी नहीं कि हर सलाह मानें, लेकिन सलाह अगर सही लगे तो मानने में हिचकें नहीं। आजकल के बच्चे बहुत जिज्ञासु हैं, हर मामले में अपनी बात ऊपर रखने की आदत से बचें। कोई बात अगर नहीं माननी है तो उसकी सही वजह जरूर बताएं।
बच्चे आपको देखते हैं
बच्चे वही करते और सीखते हैं, जो वे आपको करते हुए देखते हैं। सही-गलत की कोरी भाषणबाजी से बचें। जो व्यवहार आप उनसे करवाना चाहते हैं, उसे पहले अपनी आदतों में शुमार करें। फिर वह अनुशासन की बात हो, बड़ों की इज्जत करनी हो, सामाजिक व्यवहार सीखना हो वगैरह। आज का बच्चा पलट कर सवाल और जवाब करता है, इसलिए नियम और शर्तें संभल कर लगाएं।
परिवार के साथ समय बिताएं
माना आजकल हर कोई व्यस्त है, लेकिन फिर भी सप्ताह में एक दिन परिवार के लिए जरूर रखें। एक दिन फोन, कंप्यूटर, लैपटॉप को अलमारी में आराम करने दें। परिवार के सभी लोग साथ समय बिताएं। साथ में टीवी देखें, घूमने जाएं या फिर घर में ही खाली बैठ कर बतियाएं और खाएं। घर के बुजुर्गों को भी इसमें शामिल करें। इससे आपका ही नहीं, आपके बच्चों का भी परिवार से लगाव बढ़ेगा, परिवार में नजदीकियां आएंगी।
अहसान न जताएं
अक्सर जब भी बच्चे को समझाने की बात आती है, तो हम सभी अभिभावक अचानक बड़े दार्शनिक हो जाते हैं। हम जताना शुरू कर देते हैं कि हमने तुम्हारे लिए अपनी इच्छाओं का कितना बलिदान किया है, और कर रहे हैं। आप एक जिम्मेदार मां-बाप की हर जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं, इसे कभी-कभार कहना और समझाना कतई गलत नहीं, लेकिन इसे आदत न बनाएं। आप उन्हें पाल कर अहसान कतई नहीं कर रहे हैं, यह चुनाव आपका खुद का था। न ही हर बार अपने आप को महान घोषित करें। यह बात बच्चे खुद तय कर लेंगे, क्योंकि आज का बच्चा इतना बेवकूफ नहीं है। भले आप न देख पाते हों, लेकिन वह आपको हर पल देखता है।
चुनाव खुद करने दें
हरेक मां-बाप की ख्वाहिश होती है कि उनके बच्चे करिअर में कामयाब हों। सफलता की बुलंदियां छुएं। आज सबसे ज्यादा परेशानी और टकराव अभिभावकों और बच्चों में चुनाव को लेकर है। आप अपने बच्चों से क्या चाहते हैं, यह बताने से पहले यह भी जानें कि आपका बच्चा आपसे क्या उम्मीद रखता है? आप अभिभावक हैं, आपके बच्चे की क्षमताएं आपसे बेहतर कोई नहीं जानता। आमतौर पर हम ऐसा करते हैं कि जिस विषय में बच्चा कमजोर है, जो काम उसे नहीं आता, हम उसे सिखाने के लिए जी-तोड़ कोशिश करते हैंं। लेकिन जिस विषय या काम में वह बेहतरीन है, उसमें उसे आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं करते। इसलिए जो भी क्षेत्र या विषय वह चुनना चाहता है, अगर वह उसके लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, तो रोड़ा मत अटकाइए। अगर ऐसा नहीं है और आपके समझाने के बावजूद वह नहीं समझना चाहता तो उसके चुनाव के साथ ही चलें। उसी विषय में उसे बेहतरीन बनने में मदद करें।
वह न थोपें, जो आपने जिया है
प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हम अपने बच्चे को अपने जैसा ही बनाना चाहते हैं। क्योंकि हमें लगता है कि हमारी परवरिश सबसे बेहतरीन थी। बेशक मां-बाप हर स्थिति और परिस्थिति में अपने बच्चों का भला ही चाहता है। पर इसका मतलब यह नहीं कि जो हमने जिया वही हमारे बच्चों के लिए भी उत्तम है, क्योंकि तब और आज के माहौल में बहुत फर्क है। उम्र के बदलाव का यह समय आपने भी जिया है, अब अपने बच्चों को बड़ा होने दीजिए, कुछ चीजें खुद सीखने दीजिए।
संबंधों में जादू जैसी कोई चीज नहीं होती। अपने अनुभव में थोड़ा-सा संतुलन भी मिलाइए। अपने बढ़ते बच्चों को उम्र के इस पड़ाव पर सबसे ज्यादा आप ही के साथ और समझ की जरूरत है। साथ चलिए, पीछे मत भागिए।

