साधना अग्रवाल
जैसे वसंत को ऋतुओं का राजा यानी ऋतुराज कहा जाता है, वैसे ही त्योहारों में अनूठी होती है होली। क्योंकि इसकी परंपराएं भी अलग होती हैं और इसका अंदाज भी। वसंत आते ही भारत में प्रकृति सजने-संवरने लगती है और उसका रंग जनमानस पर छाने लगता है। जहां वसंत के स्वागत में कोयल कूकने लगती है तो मनुष्य का तन-मन अलसाने लगता है। शाम को गांवों में फागुनी बयार पर होली के गीत गूंजने लगते हैं। ऐसे मौसम में शहर और महानगर भी भला कैसे अछूते रह सकते हैं। फागुन तो व्यक्ति के मन में होता है जो मौसम के साथ मुखर हो उठता है।
फगुनाहट की हवा में आखिर ऐसा क्या होता है जो हमारे तन-मन को झंकृत करके एक ऐसी दुनिया में हमें ले जाता है, जहां हमारे बचपन के दिन ही नहीं होते हैं बल्कि कैशोर्य और जवानी के दिनों के प्रेम-प्रसंग भी होते हैं। यह हवा हमें जिस तरह से स्पर्श करती सहलाती है, तब हम अपनी भावनाओं पर आसानी से काबू नहीं कर पाते हैं। अब जब हमारे बीच हजारी प्रसाद द्विवेदी और विद्यानिवास मिश्र जैसे ललित निबंधकार नहीं रहे, तब कौन हमें ठीक से बताएगा कि वसंत आया और हमें छूकर चुपचाप गुजर गया। आधुनिक हिंदी कविता में वसंत के दो विपर्यय छोर हैं। एक तरफ यदि निराला का गीतकृ-‘सखि वसंत आया’, तो दूसरी तरफ सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता है-‘वीरों का कैसा हो वसंत’ है। हम रीतिकालीन कविता की ओर लौटें तो फागुन ऋतु में सराबोर प्रेम की स्वच्छंद दुनिया है। पद्माकर लिखते हैं-‘ फागुन में का गुन विचारि ना दिखाइ देत, ऐती वानि गाइ उन कानन में नाइ आउ। ये री इन नैननि के नीर में अबीर घोरि- बोरि पिचकारी चित-चोर पै चलाइ आउ।’ लेकिन होली का राग-रंग मनुष्यता के खुलेपन के जिस उत्कर्ष पर पहुंचता है, उसे फिर से पद्माकर ही अपने कवित्त में उठाते हैं-‘नैन नचाइ कही मुस्काइ लला फिरि अइयौ खेलन होरी।’
होली एक ऐसा त्योहार है जिससे हिंदी सिनेमा भी अछूता नहीं है। यह त्योहार सिनेमा के महत्त्वपूर्ण दृश्यों, कथानक और चरित्र के निर्माण में मददगार रहा है। समय के साथ इस बदलती दुनिया में बहुत कुछ बदला है लेकिन होली के रंग नहीं बदले क्योंकि यह त्योहार है उल्लास का। फिल्मी परदे पर होली और होली के गीतों ने हमेशा लोकप्रियता बटोरी है। 1937 में फिल्म ‘जीवन प्रभात’ के लिए सरस्वती देवी ने (जिन्हें भारतीय फिल्मों की जद्दनबाई के बाद) दूसरी पेशेवर महिला संगीतकार होन का गौरव प्राप्रत है) ‘होरी आई रे कान्हा’ गीत संगीतबद्ध किया था। यह फिल्म देविका रानी और किशोर साहू को लेकर बनाई गई थी और इसके गीतकार थे जमुना स्वरूप कश्यप ‘नातवां’। उसी दौर में महबूब की मशहूर फिल्म ‘औरत’ (1940), जिसे बाद में महबूब ने दोबारा ‘मदर इंडिया’ के नाम से करीब दो दशक बाद बनाया, के ग्रामीण परिवेश में जनमानस के बीच प्रचलित लोकरंग के गीतों की छटा ही बिखेर दी। इस फिल्म में गीतकार सफदर ‘आह’ के होली गीतों- ‘आज होली खेलेंगे साजन के संग’ और ‘जमना तट श्याम खेलें होली’ को संगीत बद्ध किया था।
1950 के दशक में फिल्मों में होली और होली की मस्ती को कई फिल्मों के गीतों में फिल्माया गया। ये गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने उस जमाने में हुए थे। ‘अन्याय’ का गीत ‘होली आई रे कान्हा’ और ‘गीत गोविंद’ का बालम का गीत ‘ अपने ही रंग रंग डारुं, ओ श्याम तोहे’ आज भी काफी लोकप्रिय है। इसी दौर में रवि शंकर के संगीत निर्देशन में ‘होली खेलत नंदलाल, ब्रज में’ बेहद मशहूर हुआ था। ‘जोगन’ फिल्म का गीत ‘रंग डारो रे रसिया’ भी काफी चर्चित हुआ। 1959 में ‘नवरंग’ में भरत व्यास का होली गीत ‘अरे जा रे हट नटखट’, को संगीत से सजाया था सी. रामचंद्र ने। काफी सराहा गया। 1960 में आई फिल्म ‘कोहिनूर’ में शकील बदायूंनी का गाना ‘तन रंग लो जी, आज मन रंग लो’ को संगीतबद्ध किया था नौशाद ने और फिल्माया गया था बॉलीवुड के ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार और मीना कुमारी पर। यह आज भी अपनी धूम मचाता है।
1968 में ‘आबरू’ में गीतकार जीएल रावल का होली गीत ‘आई आई रे होली, ओ रंग लाई रे होली, ओ नाचो नाचो बहारें संग लाई रे होली’ काफी चर्चा में रहा। इसको संगीत दिया था सोनिक ओमी ने। ‘नया रास्ता’ में एन. दत्ता के संगीत निर्देशन में और साहिर लुधियानवी का गीत ‘चूनर मोरी कोरी, उमर मोरी बाली, धीरे रंग डारो करो न जोरा-जोरी’ और ‘कटी पतंग’ में गीतकार आनंद बख्शी का ‘आज न छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली, चाहे भीगे तेरी चुनरिया चाहे भीगे रे चोली’ की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। 1974 में आई फिल्म ‘आपकी कसम’ में आरडी बर्मन के संगीत निर्देशन में आनंद बख्शी के गीत ‘जय जय शिव शंकर, कांटा लगे न कंकर कि प्याला तेरे नाम का पिया’ पर लोग झूमने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसी ही लोकप्रियता फिल्म ‘शोले’ (1975) के आरडी बर्मन के संगीत निर्देशन में आनंद बख्शी के गीत ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं’ को भला हम कैसे भुला सकते हैं।
धीरे-धीरे समाज बदला तो फिल्म कैनवस भी बदला। लोगों ने आधुनिक सिनेमा देखना पंसद किया जिसमें अव्वल रहा यशराज बैनर, जिसने होली के ऐसे रंग सजाए जिसमें लोग आज भी रंगना चाहते हैं। ‘सिलसिला’ के हरिवंशराय बच्चन के गीत और शिवहरि के संगीत निर्देशन में ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली’ में अमिताभ बच्चन ने ऐसा नशा भरा कि लोग इस पर थिरके बिना नहीं रह पाते। ‘नदिया के पार’ (1982) के रवींद्र जैन के गीत ‘जोगी जी धीरे-धीरे, जोगी वाह जोगी जी’ को हम यों ही गुनगुनाने लगते हैं। इसी वर्ष आई ‘राजपूत’ का आनंद बख्शी का गीत ‘भागी रे भागी रे भागी बृजबाला, कान्हा ने पकड़ रंग डाला’ को संगीत से सजाया था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने। फिल्म ‘मान मर्यादा’ (1987) का राम भारद्वाज का गीत ‘आज बिरज में होली रे रसिया’, जिसकी धुन बनाई थी उषा खन्ना ने, भी खूब सुना जाता है।
फिल्म ‘डर’ (1993) में आनंद बख्शी के गीत और शिवहरि के संगीत निर्देशन में आया गीत ‘अंग से अंग लगाना सजन हमें ऐसे रंग लगाना’ ने भी कई रिकार्ड तोड़े हैं। ‘बागवां’ में समीर के गीत और आदेश के संगीत निर्देशन में ‘होली खेलें रघुबीरा अवध में होली खेलें रघुबीरा’ पर भी लोग खूब नाचते हैं। 2005 में आई फिल्म ‘वक्त’ में अन्नू मलिक के संगीत निर्देशन में आतिश कपाड़िया के गीत,‘डू मी ए फेवर लेट्स प्ले होली, रंगों में है प्यार की बोली’ आज के युवा वर्ग में होली प्रेम को दर्शाता है। 2005 में ही आई एक और फिल्म ‘मंगल पांडे’ में जावेद अख्तर के गीत ‘देखो आई होली रंग लाई होली’, जिसको संगीत से संवारा है एआर रहमान ने, पर भी मन झूम उठता है। ‘कर्मा और होली’ (2009) में समीर पांडे के गीत ‘होली आई के होली विच कमाल हो गया’ को संगीत दिया है राजू सिंह ने। इसे सुनकर सचमुच दिल का मलाल दूर हो जाता है। फिल्म ‘दो दिल के खेल में’ (2010) में नफीस के गीत ‘जोगीरा सारा रारा’ को सुनकर तो ऐसा नशा छाता है कि भांग का नशा भी फीका पड़ जाता है। ‘ये जवानी है दीवानी’ में अमिताभ भट्टाचार्य के गीत और प्रीतम के संगीत ने दीपिका पादुकोण की ‘बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी, तो बोले रे जमाना खराबी हो गई’ तो आज के युवा वर्ग की पहली पसंद बना हुआ है। कह सकते हैं कि साहित्यिक होली की तरह सिनेमाई होली में भी लोगों का तन-मन और जीवन भीग-भीग उठता है। १

