बुरा न मानो होली है। मस्ती की इस टेर पर न जाने कितनी चुहल और कितनी शरारतों ने अंगड़ाइयां भरी हैं। कमाल यह भी कि इस सबके पीछे संगीत का वह लोक पक्ष है, जिसमें व्यक्ति का मन और अंचल एक साथ धड़कता है। यह बात अपनी जगह सुस्थापित है और यह कहने के लिए अलग से किसी तार्किक कार्रवाई की भी जरूरत नहीं कि इस लोकपर्व की सबसे बड़ी थाती वे गीत रहे हैं, जो आज भी तकरीबन सभी लोक और शास्त्रीय घरानों की सांगीतिक पहचान में शुमार हैं। दुर्भाग्य से होली की ये पारंपरिक टेर आधुनिक बयार में या तो बदलती जा रही है या फिर अपने को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। नतीजतन जिन होली गीतों में स्त्री-पुरुष और पारिवारिक संबंधों को लेकर मर्यादित विनोद के रंगारंग आयोजन थे, वहां फूहड़ता इतनी बढ़ी है कि अर्थ की पिचकारी की जगह द्विअर्थी तीर सीधे कानों को बेधते हैं।
आज जबकि कहने-सुनने और देखने-दिखाने की पूरी दुनिया देखते-देखते हाथों में आए स्मार्टफोन में सिमट आई है, तब एक लोकरंग की बदरंगता किस तरह हमारे चौक-चौपाल से आगे घर के भीतरी परिवेश को नुकसान पहुंचा रही है, यह बात समझनी मुश्किल नहीं है।
दिल्ली की एक संस्था ने रेट्रो दौर में धूम मचाने वाले सीडी-एल्बमों का अध्ययन किया था, जिनकी बिक्री बाजार में लोकगीत-संगीत के नाम पर होती है। इनके कवर पर छपी तस्वीरों और टाइटल से कोई सहज ही इनके स्तर और विषयवस्तु का पता कर सकता है। अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि इस तरह के लो-कंटेंट की स्वीकृति मांग के कारण नहीं बल्कि बंपर आपूर्ति के कारण है।
इसी साल रिलीज हुई एक होली गीत की बानगी देखिए- ‘का करता है तू सब रे। इ रंग लगा रहा है कि लैकी के गाल पर पीडब्लूडी का रोलर चला रहा है।’ इस देशज संवाद के बाद सुनाई पड़ता है एक पारंपरिक होली गीत का बिगड़ैल संस्करण। गीत के बोल ऐसे कि जैसे लड़की को रंग लगाने से बहुत आगे का आमंत्रण दिया जा रहा हो। वैसे यह तो कम है, कई गीत तो अपनी मंशा से ज्यादा अपनी शब्दावली में ही इतने फूहड़ होते हैं कि आप उन पर कोई चर्चा तक नहीं कर सकते।
होली के नाम पर इस फूहड़ता का बाजार लगातार बढ़ रहा है। श्रोता और दर्शक थोड़े कम दोषी इसलिए हैं क्योंकि उनके पास चुनाव अब अच्छे-बुरे के बीच रहा ही नहीं। अब तो उपलब्ध ही यही है। बाकी के लिए तो करनी होगी धैर्र्यपूर्ण खोज एक मर्यादित लोक विवेक के साथ। लिहाजा, कान तो बाजार में लोक का पसारा लगाए बैठे उन लोगों के ऐंठने चाहिए जो होली के रंग-बिरंगे आयोजन को कुबेरी चाह में बदरंग कर रहे हैं। इस अनियंत्रित चाह के निशाने पर लोक परंपरा तो है ही, उससे ज्यादा महिलाएं हैं। क्योंकि सबसे ज्यादा फब्तियां और ओछी हरकतें उन्हें ही सहनी-उठानी पड़ती हैं। अगर इस पर जल्द ही लगाम नहीं कसी गई तो इस महान लोकपर्व को महिला विरोधी करार दिए जाने का खतरा बहुत दूर नहीं है।

