योगेश दीक्षित
वह काली स्याह भयानक रात थी। मूसलाधार बारिश हो रही थी। वह पानी से बचते-बचाते विवेक के साथ बड़ी मुश्किल से चौकी पहुंची। देखा, वहां घुटनों तक पानी था। मोबाइल की मद्धिम रोशनी में एक चबूतरा दिखा। दोनों चढ़ कर उस पर बैठ गए। अंधकार पसरा हुआ था। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। चबूतरे का पत्थर टटोलते-टटोलते वृक्ष के तने से टिक गए। पानी की बौछार अब भी चालू थी। ठंडी हवा शूल-सी चुभ रही थी। एकाएक जोर से बादल गरजा। वह भय से कंपकंपाती विवेक के ऊपर गिर पडी।… घंटों दोनों चिपके बैठे रहे, उजाला होने का इंतजार करने लगे। आंख खुली तो देखा, दिन निकल आया था। कपड़े उसके अस्त-व्यस्त थे। बटन टूटे पड़े थे।… यह क्या हो गया, वह विस्फारित अपनी देह को देखती रह गई।… कहीं अनहोनी तो नहीं हुई। अनजाना भय उसकी आंखों में छा गया। चिंता की रेखाएं माथे में उभर आर्इं। जल्द से उसने कपड़े ठीक किए। विवेक अब भी गहरी नींद में सोया था। मानो थकान उतार रहा हो। उसे आश्चर्य हुआ। उसने तुरंत उसे हिला-डुला कर उठाया। वह आंख मलता हुआ उठा, बोला, ‘रात यहां बिता दी… अरे बाप रे, बड़ा गड़बड़ हो गया।
‘क्या…?’ वह अशंका से भर उठी।
‘घर वाले क्या सोच रहे होंगे। फोन भी तो नहीं लग रहा था।’ विवेक ने पसीजते हुए कहा।
रात कुछ न कुछ गड़बड़ हुआ है। उसने याद करने की कोशिश की, लेकिन कुछ याद नहीं आया। बदन में चींटियां-सी रेंग रही थीं।
‘क्या सोच रही हो?’ विवेक ने उसे गहरी सोच में डूबे देख कर पूछा।
‘कुछ नहीं।’ एकाएक चौंकते हुए उसने कहा। मन में तरह-तरह के खयाल पक रहे थे। चिंता भविष्य की थी, दाग से बचने की थी।
पानी रुक गया था, लेकिन हवा तेज चल रही थी। कपड़े फड़फड़ा रहे थे। दोनों उठ कर सड़क पर आए। एक ऑटो दिखा। तुरंत हाथ दिया, लेकिन वह भरभराता हुआ आगे बढ़ गया। जी धक से रह गया। खाली था, फिर भी नहीं रुका। कुछ दूर दोनों पैदल चले। एक बस आती दिखी, हाथ दिया, वह भी नहीं रुकी। मन में झल्लाहट-सी हुई। लगा पकड़ के मार ही दें। बदन वैसे भी गीले थे। रात से एक बूंद पीने का पानी नहीं मिला था, वाहन कोई रुक नहीं रहा था। आंखें थक-सी गर्इं। हताशा से भरे वे आगे बढ़ते गए। तभी दूर से उन्हें बस का हार्न सुनाई दिया। आशा जगी, वह बीच सड़क पर आ गई। ड्राइवर बस रोकता हुआ बोला, ‘दिखता नहीं क्या… क्यों मर कर हमें फंसा रही है, यहां स्टापेज नहीं है।’
‘नहीं भाई, चढ़ने दो इंदौर जाना है।’
‘ठीक है बैठो’, कंडक्टर बोला, ‘बस रोकने का यह कोई तरीका नहीं है।’
उसने सोचा, तरीके आजकल हैं कहां? सीधी अंगुली से तो घी निकलता नहीं। वह हरिश्चंद्र की राह पर चले तो वर्षों लग जाए… आजकल तो समय फास्ट है, जो जितनी जल्दी दौड़ेगा उसे उतनी जल्दी सफलता मिलेगी… नहीं तोे पीछे पड़े रहो। कौन सुनने वाला है, किसे फुरसत है आदि विचार उसके दिमाग में मथते रहे।
बस भरी हुई थी। दोनों खड़े-खड़े इंदौर गए। बीच रास्ते में सवारियां उतरीं भी तो सीट से टिके लोग बैठ गए। उन्हें बैठने का मौका नहीं मिला। इस दो घंटे के सफर ने उन्हें थका दिया। किसी तरह बस स्टैंड आया। राहत की सांस ली। अब चिंता घर पहुंचने की थी। वह जानती थी कि मां उसे इस हालत में देख बहुत नाराज होगी और पापा तो कहीं घर से बाहर निकलने का फरमान ही जारी न कर दें। तरह-तरह की चिंताएं उसके जेहन में उतर रही थीं। विचार समुद्र के ऊफान से उफन रहे थे।
घर आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा था। पापा सिंचाई विभाग में हेड क्लर्क थे। वेतन मात्र पंद्रह हजार माह। सात सदस्यों का परिवार था। पापा, मम्मी तीन लड़कियां और दो लड़के। बड़े भाई के बाद उसका नंबर लगता था। बहनों में वह बड़ी थी। उम्र के हिसाब से उसकी जिम्मेदारी ज्यादा बनती थी। पापा सदैव उसे जिम्मेदारियों का बोध कराते रहते थे। घर का खर्च कैसे निकलता था पापा ही जानते थे। लेकिन पापा ने कभी हिम्मत नहीं हारी। सभी की आवश्यकताएं पूरी की। बच्चों की फीस, यूनीफार्म, वाहन के पेट्रोल का खर्च, सभी प्रबंध करते रहे। कभी किसी की तबीयत खराब हुई, तो तुरंत डॉक्टर के पास दौड़े गए।
जीवन एक संघर्ष है, पापा इसे मान कर चलते थे। अपने लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। वे चाहते तो कार से ऑफिस जा सकते थे, लेकिन उनहोंने स्कूटी ही चलाई। पापा की मितव्ययिता हम सबके लिए एक मिसाल थी और उदाहरण भी। लेकिन जब कोई संतान ओक्षा कृत्य करे और उसकी शिकायत जब पापा को लगे तो वे क्या सोचेंगे यह सोच-सोच कर वह अधीर थी। मन यहां दुविधा में पिस रहा था। एक तरफ उसका पवित्र प्रेम था, तो दूसरी तरफ घर की मर्यादा। वह इनमें से किसी को भी तज नहीं सकती थी। इस स्थिति में उसे दोराहे पर खड़ा कर दिया।
गलती तो उससे हो ही गई थी। अलमस्ती में पता ही नहीं चला कि कदम उसके किस मोड़ पर जा रहे हैं।
विवेक बेहद शरीफ होनहार युवक था। उसके इरादे फौलाद से सख्त और मन गंगाजल सा पवित्र था। क्लब सोसायटी ग्लैमर से वह कोसों दूर था। उसमें व्यावहारिकता थी, गहराई थी। वेद संस्कृत का शोध परीक्षक था। यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के साथ सांस्कृतिक मंडल का अध्यक्ष था।
उसकी इसी विशेषता ने उसे उसके करीब ला दिया। जब वह अपनी एक थिसिस दिखाने उसके पास गई, तो उसने जो संशोधन और सुझाव दिए उससे उसका आर्कषण बढ़ गया। संस्कृति पर थीसिस की पूरी तैयारी विवेक ने कराई। छह महीने के इस प्रयास और मुलाकातों ने उसे उसके करीब ला दिया। धीरे-धीरे यह परिचय प्रेम में बदल गया। जिस दिन उसकी भेंट नहीं होती, वह दिन उसे नागवार गुजरता। यही हाल विवेक का था। जब तक मोबाइल से बात न हो जाती, उसे संतोष नहीं मिलता। युवावस्था का यह प्रेम प्रंसग किसी से छिपा नहीं रहा। यूनिवर्सिटी परिसर में यह सर्वत्र फैल गया। जिसे देखो वह इनकी मित्रता पर कटाक्ष करने से नहीं चूकता, लेकिन इन्होंने कभी परवाह नहीं की। अपनी धुन पर थिरकते रहे। संतोष था कि यह धुन उनके घर तक नहीं पहुंची थी और उसके परिणाम से वे अनभिज्ञ थे।
लेकिन जब बात प्रणय सूत्र बंधने तक बढ़ गई तो उसे मां तक पहुंचाना आवश्यक लगा। इस दरमियान उसने मां से जिक्र कर ही दिया। मां ने कहा था, बेटा ऐसा कदम न उठाना कि पापा को ठेस पहुंचे। उन्होंने सदा तुम सबके लिए अपना सर्वश्व न्योछावर किया। तुम्हारा एक गलत प्रयास उन्हें आहत कर देगा।
वह यह सोच ही रही थी कि घटना को कैसे बिसारे, तुरंत शादी भी नहीं हो सकती थी। सामाजिक संस्कार इसकी इजाजत भी नहीं देते, वह स्वयं इस तरह बंधी थी कि इससे अलग कुछ सोच भी नहीं सकती थी। दो छोटी बहनों की जिंदगी का सवाल था। उसका एक गलत फैसला परिवार को तोड़ देगा और उसका दोष उस पर मढ़ा जाएगा।
इसी ऊहापोह में फंसी वह घर पहुंची। मां उसकी सूरत देखते ही समझ गई कि कोई अनहोनी हुई है। उससे मां का सामना करते हुए भी नहीं बना था। चेहरे पर सदा खिली रहने वाली दीप्ति को वह बरकरार नहीं रख पाई थी। दौड़ कर अपने कमरे में चली गई। इस तरह विस्तर पकड़ना संदेह तो देता ही है। मां तुरंत उसके पास पहुंची, ‘बेटा क्या हुआ, परेशान दिख रही हो…?’
‘कुछ नहीं मां।’ चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेरते हुए उसने कहा।
‘मुझसे मत छिपाओ… बताओ क्या है?’
मां मैं कॉलेज टीम के साथ भैरव मंदिर (उज्जैन) गई थी। अचानक भयंकर बारिश आ गई। बाढ़ का सैलाब आ गया। मैं विवेक के साथ बाइक से निकली, लेकिन रास्ता कुछ समझ नहीं आया…। बाइक भी खराब हो गई। पानी लगातार गिर ही रहा था। हम दोनों छिपने के लिए मंदिर की तरफ बढ़े, लेकिन उफनते नाले के कारण नहीं पहुंच पाए। चौकी में रात बिताई। सुबह हुई तो बस से वापस आई।
‘यह तो ठीक है, लेकिन तुम्हारा चेहरा कुछ और कहता है?’
‘नहीं मां, ऐसा कुछ नहीं हुआ। विवेक बहुत शरीफ आदमी है।’
‘मैंने कब कहा कि वह शरीफ नहीं है… लेकिन बात कुछ और है, जो तू मुझसे छिपा रही है। मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकतीं… बताओ क्या बात है?’
‘मां’ वह फूट-फूट कर रो पड़ी। अंदर की व्यथा बाहर छलक गई।
‘बोल क्या हुआ?’
उसने सिसकते हुए कल रात की घटना बता दी। कैसे जंगल में उसने विवेक के साथ रात बिताई। कितने घंटे वे साथ रहे।
यह सुन कर मां को जैसे काठ मार गया। उन्हें सब कुछ बर्बाद होता दिखा। अनहोनी में घटी घटना कहीं नासूर न बन जाए, मां को यही दुख था। वह इस दुख से निकलने का उपाय सोचने लगी। एक खयाल उनके दिमाग में जमा। उन्होंने तुरंत कहा, ‘बेटा… विवेक को बुलाओ मुझे उससे बात करनी है।
‘ऐसा क्या मां…?’
‘जो कहती हूं करो… फोन लगाओ, मुझे तत्काल मिलना है।’
उसने फोन लगाया। एक घंटे बाद विवेक आ गया। मां ने उसे शादी करने को कहा। वह कबसे इसकी प्रतीक्षा कर रहा था।
अगले दिन उसकी विवेक से साथ सगाई हो गई।

