शोभा सिंह
विश्वास
संबंधों की गहरी खरोंचें
देह पर
उभरी रक्त की नन्ही बूंदें
हां, विचारहीन नहीं हुई
बस टांग दिया खूंटियों पर
संवेदनाओं को निचोड़ कर
उनकी बहुरूपी दुनिया से
खामोश बहिष्कृत हो
उपेक्षा की तंग घाटियों से
खूब पैर जमा कर उतरती है
बनाती नई राह
फूट आए कंठ में
प्रतिरोध के स्वर
में भींग
नए संवाद के लिए
तैयार
वर्षों बाद- धागे सुलझाने
गुट्ठल तने से सटी
मन के भीतर की छांह
उसने तलाश ली
जख्म और विषाद
पहाड़ी नदी का वेग
बहा ले जाएगा
भरोसा है उसे।
गुहार
रुको ठहरो
सुनो और देखो
हमारा तीव्र गतिवाला क्षय
समय है कम
हमारे पास
हड़बड़ी का धागा
पांव में उलझ जाता
बार-बार
खड़खड़ाने लगी हैं हड्डियां
कितना कुछ देखना
कितना कुछ अभी जानना
दृश्यों को पीना है चुपचाप
डूबना फिर-फिर जीवन में
उतराना है समुद्र तट पर
निर्द्वंद्व गुहार
हमें शामिल करो
अपने साथ हमें भी देखो
हम तुम्हारा- तुमसे जुड़े
वक्त का हिस्सा
हम हैं तुम्हारी जड़ें
खट्टी मीठी स्मृतियों की मिठास
हमसे कर कर
हो सकता है हासिल करो
अनुभव का नया विस्तृत संसार
खुशबू की तरह फैल जाने का हुनर
सुनो-बस
पहुंच से दूर न जाना
एकान्त में ही नहीं समूह में भी
करती है आनंदित प्रकृति
शायद अधिक गहनता से
ओ मेरे बच्चों
हमारे मन भी छोटे बच्चे से रूठ जाते हैं
जब देखते लाभ हानि का फलसफा
हमारी पीड़ा समझो
एकाकी होने की अतृप्त
पथरीली छटपटाहट में
तुम हमारी उम्मीद
न बनो तुम
हमारी रोशनी की परिधि से
गायब संतानें।

