पूजा मेहरोत्रा
शादी यानी ढोल, नगाड़ा, बारातियों का बेसुध नाचना, हंगामा, ठिठोली, रस्मो-रिवाज और बहुत सारी मस्ती। अरे, अरे शादियों में एक जरूरी आइटम तो भूल ही गए- असलहे यानी बंदूक, रिवॉल्वर, राइफल, पिस्तौल से फायरिंग। लाइसेंसी नहीं है तो गैरलाइंसेंसी तमंचा तो है ही। बारात है तो फिर वह भी तो चाहिए न-बोतल-सोतल, दारू-सारू, नशा-वशा। शक्ति प्रदर्शन की न जाने कौन-सी मानसिकता इस तरह की आत्मघाती परंपराओं को कायम रखे हुए है? नकली रोब दिखाने का मंसूबा तब तक पूरा होता नहीं दिखता जब तक खुशी के मौकों पर फायरिंग न हो। भले ही कोई ढेर ही क्यों न हो जाए। कभी-कभी तो ‘तमंचे पर डिस्को’ ने शादी के सरताज तक को नहीं बख्शा है। इस नुमाइशी शौक ने तो कई बार दूल्हा-दुलहन का ही काम तमाम कर दिया है। शादी- विवाह या दूसरे खुशी के अवसरों पर होने वाली फायरिंग से सैकड़ों घर उजड़े हैं। देश के हर कोने से विवाह के मौके पर शक्ति प्रदर्शन की वजह से कइयों की मौतें हुई हैं और जाने कितने घायल हुए हैं। बारातों की खुशी को पल भर में मातम में बदलते देखा गया है। असलहों का शौक इतना गहरा है कि इससे हमारे साधु संत भी नहीं बचे हैं। घर संसार का मोह छोड़ चुकी साध्वी भी जब वर वधू को आशीर्वाद देने पहुंचीं तो फायरिंग कर दीं, जिससे तीन चार घर उजाड़ गए। बिहार, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों में तो शादियों में जो जितने राउंड गोली चलाता है वह उतना ही ताकतवर माना जाता है। इसी ताकत के प्रदर्शन में सैंकड़ो राउंड गोली चलाना फैशन बन गया है।
पिछले पांच दिसंबर को पंजाब के बठिंडा जिले के मोड़ मंडी में शादी के दौरान एक गोली चली और गर्भवती डांसर कुलविंदर कौर की मौत हो गई। कुलविंदर को गोली उस समय लगी जब स्टेज पर चार लड़कियां डांस कर रही थीं। अचानक स्टेज के बिल्कुल सामने एक युवक ने बंदूक से फायरिंग की। गोली स्टेज पर डांस कर रही कुलविंदर को लग गई, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। गोली चलाने वाला आरोपी युवक तुरंत बंदूक फेंककर घटनास्थल से फरार हो गया। कुलविंदर शादियों में चलाई जा रही गोलियों की न तो पहली शिकार हैं न आखिरी। कुलविंदर से पहले भी तमाम लोग इस तरह की घटना के शिकार हुए हैं और अगर प्रशासन अब भी नहीं चेतता है तो लोग शिकार होते रहेंगे। हरियाणा के करनाल में तो अखिल भारतीय हिंदू महासभा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष साध्वी देवा ठाकुर एक शादी समारोह में गई थीं। वहां साध्वी और उनके सुरक्षा गार्ड ने फायरिंग की। इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और चार घायल हो गए थे। दिल्ली में 17 दिसंबर को सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी के बेटे ने नशे में धुत होकर गोली चलाई, जिससे कैटरिंग के एक कर्मचारी की मौत हो गई। 11 दिसंबर को शादी के मौके पर दुलहन के भाई की हर्ष फायरिंग में मौत हो गई।
अहम सवाल है कि क्यों असलहा आज शादियों में इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है? क्यों और कब यह हमारे परिवारों और खुशियों का अहम हिस्सा बन गया? क्या शादियों में असलहे लहराए बिना शादियां नहीं हो सकतीं? इन सवालों को समाजशास्त्री सीधे तौर पर बाजारवाद से जोड़ते हैं। समाजाविज्ञानी बद्रीनारायण बताते हैं कि असलहों का प्रदर्शन सामंतवाद से प्रभावित है। ये देन भी सामंतवाद की ही है। शक्ति प्रदर्शन पुराने जमाने में जरूरी होता था। राजे रजवाड़ों के यहां शादी विवाह के मौकों पर प्रशिक्षित तलवार बाज आदि आते थे। शादी और खुशी के मौकों पर कई तरह के खेल खेले जाते थे। असलहों का प्रदर्शन किया जाता था। बदलते समय के साथ तलवार की जगह दुनाली, तमंचे और बंदूकों ने ली। जब शादी विवाह के मौकों पर वे अपनी सामर्थ्य और शक्ति का प्रदर्शन करते तो हैं गांव वाले, मुहल्ले वाले देखते हैं। सामंतीयुग में दूल्हा-दुलहन के परिवार वाले एक दूसरे से ज्यादा ताकतवर दिखने के लिए हवाई फायरिंग किया करते थे। जैसे ही समय बदला बाजारवाद आया। ऐसा लगा कि इन हथियारों का का चलन कम होगा, लेकिन यह और बढ़ गया। हथियारों को कहीं और कभी भी चलाने के विरुद्ध कठोर कानून है।
लाइसेंसी हथियार भी केवल आत्मरक्षा में ही चलाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के वकील राज के सिंह बताते हैं कि 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने शादी-विवाह आदि खुशी के अवसरों पर फायरिंग को गैरकानूनी घोषित कर दिया था, लेकिन न तो इस पर पुलिस का ध्यान है न ही प्रशासन का। यही वजह है कि कई राज्यों में जहां सामंती मानसिकता और दबंगई सिर चढ कर बोलती है, वहां शादी-विवाह तो छोड़िए, हर बात पर असलहों का प्रदर्शन किया जाता है। और बड़े हादसे के बाद पुलिस हाथ मलती नजर आती है। आजादी के बाद समाज में डकैतों आदि का खतरा होता था, तब सरकारों ने आत्मरक्षा के लिए असलहों के लाइसेंस थोक के भाव जारी किए। लेकिन अब जब पुलिस सक्षम है, ऐसे समय में घर-घर में असलहे रखने का कोई तुक नहीं है। इस पर लगाम लगाए जाने की जरूरत है। शादी की रस्मो में वर पक्ष का दुलहन के परिवार से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होने का भ्रम हमारा समाज सदियों से पाले हुए है। वधू पक्ष के द्वारा किए गए इंतजाम का वर पक्ष के सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतिबिंब होने का ढकोसला भी खूब होता है। कुछ शहरी इलाकों को छोड़ दें तो बारात के स्वागत से लेकर विदा होने तक दुलहन के परिवार की तरफ से हो रहे हर प्रकार के इंतजामों को दूल्हे के परिवार वालों की तरफ से न जाने कितने ही मापदंडो पर तौला जाता है। मतलब, इस तरह का माहौल होता हैं जहां अगर आप लड़के वालों की तरफ से हैं तो आपको पूरा अधिकार है, अपनी ताकत की नुमाइश करने का और इसका विरोध होने की संभावना नाम मात्र भी नहीं होती। सदियों से हथियारों को ही ताकत से जोड़कर देखा जाता है। तो इस तरह के माहौल में कुछ हवाई फायर तो बस यों ही हो जाती है।
शादियों में नशा, खासकर शराब पीने का चलन भी तेजी से बढ़ा है। नशा और हथियारों की संगत ही दुर्घटनाओं को जन्म देती है। हथियार थामने वाले हाथ लड़खड़ाते हैं। कुछ लड़खड़ाहटें तो नाच गाने तक सीमित रह जाती है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा की गलत परिभाषा पढ़ कर आए लोगों के हाथ अपने आप बंदूक तक पहुंच जाते हैं। और फिर जो कुछ होता है, उसकी सिर्फ कहानी ही रह जाती है। मुहावरा है कि बोली और गोली कभी वापस नहीं आती। अगर बंदूक खुले आसमान की तरफ भी तनी है तो भी गोली चलने तक इसका मुंह किसी और की तरफ मुड़ गया तो तबाही निश्चित है। अमूमन इस तरह के किस्से कानून की गिरफ्त से दूर ही रखे जाते हैं लेकिन कोई तबाह जरूर हुआ होता है। अगर ये खबरों की सुर्खिया बन भी जाएं तो चंद ही दिनों में हमारा सभ्य समाज इसे भुलाने में ही अक्लमंदी समझता है और शायद इसलिए कोई हल नहीं निकल पाता। लेकिन इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अगर कुछ लोगों में शक्ति के प्रदर्शन में गोलीबारी को स्थान दिया है तो कुछ ऐसे लोग इसका सिरे से बहिष्कार भी करते हैं। एक शादी का कार्ड उस समय चर्चा में आ गया जब उसमें लिखा गया कि शराब पीनेवाले और असलहावाले लोग शादी में न आएं। किसी भी किस्म की हर्ष फायरिंग पूरे देश में मना है। फिर भी यह रुक नहीं रही। उत्तर प्रदेश में पिछले महीने भर के भीतर दस लोग हर्ष फायरिंग में मारे गए हैं। उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि हर्ष फायरिंग में धाराएं तो वही लगाई जाती हैं जो किसी जघन्य अपराध में लगाई जानी हैं। चूंकि फायरिंग किसी को मारने के इरादे से नहीं होती, इसलिए अक्सर इसमें गैरइरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाता है। अक्सर मारने वाला और मरने वाला एक ही परिवार या रिश्तेदारी का होता है इसलिए भी न तो लोग पैरवी करते हैं और न ही गवाही-बयान देने सामने आते हैं। इस वजह से मामले तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच पाते। हालांकि, ऐसे मामलों में असलहों के लाइसेंस रद्द करने का आदेश है और कई बार लाइसेंस निरस्त भी किए जाते हैं। लेकिन देखा गया है कि अधिकतर फायरिंग गैरलाइसेंसी हथियारों जैसे कट्टों-तमंचों से की जाती है। मेरठ, मुंगेर और अब मध्यप्रदेश के खारगोन में धड़ल्ले से अवैध हथियारों का धंधा चल रहा है। देशी तमंचे दो-चार हजार रुपए में ही आसानी से मिल जाते हैं। अवैध हथियारों के मामले में कई बार पुलिस भी लाचार नजर आती है।
हथियार पास में रखने और शादी-विवाह में फायरिंग को मनोचिकित्सक एक अलग नजर से देखते हैं। उनका मानना है कि बाजारवाद, दबंगई और फिल्मों ने इसे खूब बढ़ावा दिया है। उसे फैशन में शामिल कर दिया है। बात बात पर तंमचा निकालना ताकतवर होने की फैशन की निशानी बना दिया गया है। बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में तो स्थानीय भाषाओं में बनाए जाने वाले गानों में तमंचे को लेकर कई गाने बनाए गए हैं। इससे युवा वर्ग भी प्रभावित होता है। यहां तक की बॉलीवुड में भी ‘तमंचे पर डिस्को’ जैसे गाने लोगों को खूब आकर्षित करते रहे हैं। और जब भी समारोहों में गाने बजाए जाते हैं तो डीजे से पहली फरमाइश तमंचे पर डिस्को जैसे गानों की ही होती है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील राज के सिंह का मानना है कि राज्य सरकारों को हथियारों के लाइसेंस जारी करने में सख्ती बरतनी चाहिए और साथ में गैरकानूनी असलहों की भी छानबीन करनी चाहिए। गैरकानूनी असलहों का धंधा भी काफी बढ़ गया है। इसे नियंत्रित करने की जरूरत है। समय आ गया है कि भारत सरकार और राज्य सरकारें रेडियो और टीवी आदि के माध्यमों से इस बारे में जनजागरूकता अभियान भी चलाएं। खुशी के मौकों पर फायरिंग पर शिकंजा न कस पाने की एक वजह यह भी है कि पुलिस इस बारे में कोई पूर्वानुमान नहीं लगा पाती। उसे कोई जानकारी तभी होती है, जब घटना घट जाती है। एक व्यावहारिक समस्या यह भी है कि अगर किसी के बारात आदि में पुलिस असलहों के बारे में जांच-पड़ताल करना भी चाहे तो इससे नई किस्म की सामाजिक समस्या खड़ी हो जाएगी। ऐसे मौकों पर घराती और बाराती, दोनों पक्ष पुलिस पर ही अपमानित किए जाने का आरोप लगाकर हंगामा खड़ा कर सकते हैं। इसलिए जनजागरूकता ही बेहतर उपाय हो सकता है। १
