अक्सर सितारे दावा करते हैं कि फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ कर ही वे उसमें काम करने का फैसला करते हैं। ‘रॉक स्टार’ के बाद नरगिस फाकरी ने कहा था कि उन्हें सौ से ज्यादा फिल्में ऑफर हुईं, लेकिन स्क्रिप्ट न जंचने की वजह से उन्होंने कोई फिल्म साइन नहीं की। काफी छानबीन के बाद उन्होंने ‘मैं तेरा हीरो’ की, जिसमें स्क्रिप्ट नाम की कोई चीज ही नहीं थी। नरगिस ही नहीं, कई स्थापित कलाकार भी फिल्म चुनने में गफलत कर बैठते हैं। राज कुमार हिरानी जब ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ बनाने की सोच रहे थे, उनकी पहली पसंद शाहरुख खान थे। शाहरुख को स्क्रिप्ट नहीं जंची। संजय दत्त को मौका क्या मिला कि उनके लुढ़कते करिअर का कायाकल्प हो गया।
ऐसा अतीत में भी कई बार हो चुका है, जब किस्मत ने छल किया। किसी कलाकार को एक फिल्म के लिए चुना गया। उसके मना करने पर दूसरे को मौका मिला और मानो उसकी लाटरी ही खुल गई। रमेश सिप्पी चाहते थे कि ‘शोले’ में गब्बर सिंह वाली भूमिका शत्रुघ्न सिन्हा निभाएं। उन्होंने मना कर दिया। फिर नंबर आया डैनी का। डैनी उन दिनों फिरोज खान की फिल्म ‘धर्मात्मा’ में व्यस्त थे। कतार में पीछे खड़े अमजद खान को मौका मिला और वे रातोंरात स्टार बन गए। ‘शोले’ जबर्दस्त हिट हुई, जबकि ‘धर्मात्मा’ को सामान्य सफलता ही मिल पाई। हीरो बनने की जिद में गब्बर सिंह नहीं बने शत्रुघ्न सिन्हा रमेश सिप्पी की अगली फिल्म ‘शान’ में सहायक भूमिका करने को राजी हो गए, लेकिन फिल्म बुरी तरह पिट गई।
दक्षिण की अभिनेत्री लक्ष्मी की पहली हिंदी फिल्म ‘जूली’ में उनके मुकाबले विजय अरोड़ा को लेना तय हुआ। उन्होंने मना कर दिया। उनकी जगह विक्रम आ गए और फिल्म की सफलता का फायदा उठा ले गए। विजय अरोड़ा को उसके बाद कोई हिट फिल्म नसीब नहीं हो पाई। गुलजार की फिल्म ‘कोशिश’ मौशुमी चटर्जी ने ठुकरा दी तो वह जया भादुड़ी के लिए वरदान साबित हो गई। ‘खानदान’ के लिए राज कुमार का चयन लगभग पक्का हो गया था। कहानी सुन कर उन्होंने कटाक्ष किया- ‘मैं लूली लंगड़ी भूमिकाएं नहीं करता। उसके लिए राजेंद्र कुमार या सुनील दत्त को लो।’ सुनील दत्त को वह फिल्म मिली, सफल हुई और उनके करिअर की दिशा बदल गई।
अहंकार और उसकी वजह से टकराव भी शायद किस्मत की वजह से होते हैं। ऐसा नहीं होता तो ‘राम और श्याम’ में वैजयंतीमाला की जगह वहीदा रहमान नहीं ले लेतीं। फिल्म में पहले दिलीप कुमार के साथ वैजयंतीमाला को लिया गया था। पांच रील पूरी होने के बाद साड़ी को लेकर झगड़ा हो गया। दिलीप कुमार चाहते थे कि उनकी पसंद की हुई साड़ियां ही वैजयंती पहनें। वैजयंती को इस पर सख्त एतराज हुआ और वे फिल्म छोड़ कर चली गर्इं। उनके हट जाने से वहीदा रहमान के हिस्से में एक सुपर हिट फिल्म आ गई। वैजयंतीमाला की ‘दुनिया’ और ‘प्यार ही प्यार’ जैसी सभी फिल्में नाकाम हो गईं।
आठ-दस फिल्में पिट जाने के बाद अमिताभ बच्चन की ऐसी हालत हो गई थी कि कोई बड़ी फिल्म उन्हें मिल नहीं रही थी और गफलत में जो फिल्में मिल गई थीं, उनमें उन्हें हटा कर किसी और को लिए जाने का सिलसिला शुरू हो गया था। ऐसे में प्रकाश मेहरा ने बतौर निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्म ‘जंजीर’ में उन्हें लिया भी तो बेहद मजबूरी में, क्योंकि उस समय का कोई भी बड़ा नायक फिल्म में काम करने को राजी नहीं हुआ। देव आनंद ने इसलिए मना कर दिया, क्योंकि उन पर फिल्म में कोई गीत फिल्माया नहीं जाने वाला था। धर्मेंद्र चाहते थे कि फिल्म की नायिका हेमा मालिनी हों और उनकी भूमिका का विस्तार किया जाए। राजकुमार से संपर्क किया गया, तो उन्होंने मना करने की गजब वजह बता दी। राज कुमार को कहानी तो पसंद आ गई, लेकिन प्रकाश मेहरा का चेहरा उन्हें अच्छा नहीं लगा, क्योंकि उनके बालों से राजकुमार को बिजनौरी तेल की बू आती थी। यह अलग बात है कि जब राजकुमार का करिअर ढलान पर था और प्रकाश मेहरा सफल निर्माता बन गए थे। तब उन्होंने प्रकाश मेहरा की दो फिल्मों में काम किया। बहरहाल ‘जंजीर’ के लिए कोई होरी नहीं मिला, तो प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन को ले लिया। दिक्कत यह थी कि उस समय की कोई भी बड़ी अभिनेत्री असफल मान लिए गए अमिताभ बच्चन के साथ काम करने को तैयार नहीं हुई। जया भादुड़ी ने हिम्मत की। शूटिंग शुरू हुई। कुछ रील बनने के बाद वितरकों और फाइनेंसरों के दबाव में प्रकाश मेहरा ने अमिताभ को फिल्म से निकालने का मन बना लिया। प्राण और जया भादुड़ी ने तब धमकी दी कि अगर ऐसा हुआ तो वे भी फिल्म छोड़ देंगे। ‘जंजीर’ ने अमिताभ बच्चन की ही नहीं, प्रकाश मेहरा की भी किस्मत बदल दी।
आशुतोष गोवारिकर ‘लगान’ में शाहरुख खान को लेना चाहते थे। शाहरुख को कहानी जंची नहीं। फिल्म आमिर को मिल गई और वह आॅस्कर के लिए नामांकित भी हो गई। शाहरुख ने गलती सुधारी और आशुतोष की अगली फिल्म ‘परदेस’ में काम किया, लेकिन फिल्म नहीं चली। शाहरुख की तरह आमिर खान भी करिअर के शुरू में गच्चा खा गए जब यश चोपड़ा की ‘डर’ करने से उन्होंने मना कर दिया। वह भूमिका शाहरुख ने की और स्टार बन गए। आमिर को उस पड़ाव तक पहुंचने में कुछ साल लग गए। करीना कपूर ने ‘गोलियों की रास लीला राम लीला’ की जगह ‘गोरी तेरे प्यार में’ को प्राथमिकता दी। अब खिसियाहट में करीना कहती हैं कि उनकी छोड़ी फिल्म ने दीपिका पादुकोण को स्टार बना दिया।
किस्मत का खेल आशीष कुमार के साथ गजब हुआ। वे ‘जय संतोषी मां’ के नायक थे। फिल्म संतराम रोहरा बना रहे थे। पैसा ज्यादा नहीं था। लिहाजा आशीष से अनुबंध करना कि अभी वे कोई मेहनताना न लें। बाद में फिल्म की आमदनी में से उन्हें कुछ हिस्सा दे दिया जाएगा। आशीष नहीं माने। लिहाजा निर्माता ने यहां वहां से जुगाड़ कर उनका मेहनताना थमा दिया। फिल्म पूरी हुई और उसने सफलता का नया इतिहास रच दिया। आशीष के पास खुद को कोसने के अलावा कोई चारा नहीं था। मालामाल हो गए संतराम रोहरा ने बाद में कुछ और फिल्में बनाईं, लेकिन सभी पिट गईं।

