दिल्ली विश्वविद्यालय में राजीव गांधी स्नातक छात्रावास की वार्डन डॉक्टर स्नेहलता नेगी ने कहा कि एक बार सबको छात्रावास में जाना चाहिए। जो यहां आप खुद से सीखते हैं वो आप कहीं नहीं सीख पाएंगे। छात्रावास आपको जीवन प्रबंधन सिखाता है। आजादी, खुलापन जो भी आज समाज के हित और लिहाज से जरूरी है आप यहां सीखते हैं। छात्रावास में रहते हुए अलग तरह से संबंध बनते हैं। आपको सही-गलत की समझ यहीं मिलती है। पीढ़ियों के अंतराल में बीते दस सालों में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि आज के बच्चे सारा दिन सोशल मीडिया में व्यस्त रहते हैं।

हम लोग बाहर जाने का मौका तलाशते थे। देख कर हैरानी होती है कि बच्चे आज कमरों से बाहर नहीं आते। उन्होंने कहा कि आज लड़कियों को अपने अधिकार मालूम हैं। अगर प्रशासन कहीं गलत है तो वो टोकती हैं। हमें जो कहा जाता था, हम मान लेते थे। फीस बढ़ गई तो बढ़ गई। क्या कर सकते हैं। जब विद्यार्थी आवाज उठाते हैं तो मुझे खुशी होती है। दिल्ली जैसी जगह पर सुरक्षा के लिहाज से टाइमिंग है। लड़कियां मानती हैं कि लड़कों की तरह हमें भी बाहर रहने दिया जाए।

हमारे यहां अंडर ग्रेजुएट भी आते हैं। नई जगह पर आकर बसना इतना आसान नहीं होता। यह बात सही है कि लड़कियां नियमों में बंधा महसूस करती हैं। अभी तो सूचना देने को भी बंधन माना जा रहा है। हम केवल यही कहते हैं कि आप देर से आइए या मत आइए लेकिन इसकी सूचना हमें दे दीजिए। हमारे समय में हम महीने में एक दिन बाहर आते थे वह भी तब जब हमारे अभिभावक हमें लेने आते थे।आज बस एक फॉर्म भर कर आप बाहर जा सकते हैं। विद्यार्थी बिना कोई खास कारण बताए आ-जा सकते हैं। उन्हें बताने में कोई संकोच नहीं है।

कुर्सी के इस तरफ और उस तरफ के भेद को बच्चे नहीं समझते। हम उनकी सुरक्षा की बात करते हैं तो उन्हें चिंता सताने लगती है कि आजादी छीनी जा रही है। बड़े शहर में हर कोई अपना करियर बनाना चाहता है। लड़कियों को भी लड़कों जितनी आजादी मिलनी चाहिए। अंडर ग्रेजुएट्स के लिए मैं भी चाहूंगी कि 10 बजे तक इसे मैन्युअल में बढ़ाया जाए। खाने में हम विद्यार्थियों से सलाह लेते हैं। यहां देश के हर एक कोने से युवा आते हैं। सबके लिए रोज हर तरह का खाना बनाया जाता है।

लड़कियों को जब जो चाहिए, जैसे चाहिए, उन्हें दिया जाता है। हम लोग यहां स्टूडेंट रिप्रेजेंटेटिव बनाते हैं। हाउस कीपर ने विद्यार्थियों के हिसाब से कुछ मानदंड बनाए हैं पर उनमें भी बदलाव कर सबको साथ लेकर चलने की कोशिश की जाती है। नॉर्थ से साउथ को जोड़ने में दिक्कत आती है। बारहवीं के बाद फर्स्ट ईयर के बच्चे एडजस्ट नहीं कर पाते हैं। डिप्रेस्ड न हो जाएं, कोई अनहोनी न हो, इस वजह से उन्हें अकेला नहीं रखा जाता। शुरुआती दिनों की दिक्कतों को सुलझाने के लिए पीएचडी के विद्यार्थी को रखा गया जिनसे वे खुलकर अपनी बात कह सकें। कोशिश रहती है कि एडमिनिस्ट्रेशन और रेसिडेंट के बीच दूरी कम की जाए।

बड़े शहर में आने पर छोटे शहर के बच्चे थोड़ा सामंजस्य नहीं बिठा पाते। इस कारण मानसिक तनाव होता है। जो कुछ है वह सिर्फ काउंसलिंग के जरिए निकल पाता है। असुरक्षा से ज्यादा कुछ नहीं है। हमारा फर्ज है कि हम छात्रावास में एक सुविधाजनक माहौल बनाएं। छात्रावास के अंदर लड़कों के प्रवेश का एक तय समय है। एक सामूहिक रूम में वे सब मिल सकते हैं। सारी लड़कियों को नहीं पसंद कि हमारे छात्रावास में लड़के आएं इसलिए वे सिर्फ शाम में मिलते हैं। आज लड़कियों को कोई डर नहीं है, वे कहीं भी कपड़े डालती हैं। अपने पीरियड्स के बारे में उन्हें किसी को बताने में हिचक नहीं है। हम लोगों के समय ड्रेस कोड था। मैं मानती हूं कि पारिवारिक पृष्ठभूमि का बहुत प्रभाव इस पर है। कपड़े को आज कपड़े की तरह ही समझा जाता है, यह अच्छी बात है। हम लैंगिक भेदभाव को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

हर स्तर पर बड़ा फर्क

आज के माहौल में जेएनयू की वार्डन अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहती हैं। उनका कहना है कि जिस समय वो खुद विद्यार्थी थीं, उस समय उन्हें इतनी आजादी नहीं थी कि वह खुलकर अपनी बात रख सकें। वार्डन कहती हैं कि मैं खुद यहां दस साल तक विद्यार्थी रही हूं। हम लोग अपनी परेशानियों को वार्डन के पास ले जाने में कतराते थे। आज डर खत्म हो गया है। आज जब मैं खुद वार्डन हूं तो देखती हूं कि लड़कियों में किसी भी तरह की कोई हिचकिचाहट नहीं है। रूम एडजस्ट करने की बात है, खाना अच्छा नहीं है, कपड़े सुखाने हैं तो सारे मामले अपनी सहजता से तय होते हैं।

आज ऐसा नहीं है कि मुंह बंद कर के सह लिया जाए। छात्राएं अपने अधिकारों को लेकर काफी सजग हैं। छोटी-बड़ी सब जगहों से लड़कियां आती हैं। दो लोग मिलते हैं तो सामंजस्य बिठाना पड़ता है। हम लोग आपसी मतभेद खुद सुलझा लेते थे। आज हर दिन दो लड़कियां आती हैं और कहती हैं- मैम हम साथ नहीं रह सकती हैं, हमारा कमरा बदल दिया जाए। मुझे लगता है कि पीढ़ियों के अंतराल में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वो है कि अब लड़कियां समझौता नहीं करती हैं। उन्हें पता है कि छात्रावास उनका हक है, कोई रहम नहीं है। जो सुविधा है वो ठीक है, जो नहीं है वो क्यों नहीं है।

वार्डन का कहना है कि पीढ़ियों में बदलाव का असर मेरी भी भाषा पर पड़ा है। मेरी भाषा अनुशासनात्मक और आज्ञात्मक नहीं होती है। आपको यह बात मान लेनी चाहिए, मानना ही होगा यह नहीं कहते।
लिबास से बड़ा विश्वास, जेएनयू की वार्डन कहती हैं कि हमारे जमाने में हमारे कमरे की बालकोनी सूनी होती थी। सजग रहते थे कि बालकोनी से नहीं पता लगना चाहिए कि यहां लड़कियां रहती हैं। आज की लड़कियां अपनी इन जरूरतों को लेकर काफी सहज हैं। बालकोनी में सारे कपड़े एक जैसे ही सूखते हैं। कपड़े पहनने से लेकर सुखाने तक में अब कोई हिचक नहीं है। ये लड़कियां कपड़ों की पैमाइश से काफी आगे निकल चुकी हैं।