भारतीय भाषा और संस्कृति के बीच बांग्ला का स्थान कई कारणों से खास है। इन खासयित में जो सबसे बड़ी बात है वह यह कि इस भाषा ने आधुनिक भारत की सांस्कृतिक निर्मिति में बड़ी भूमिका निभाई। इस लिहाज से बांग्ला साहित्य के दिग्गजों के बीच जो दो नाम सबसे पहले जेहन में आते हैं, वे हैं बंकिम चंद्र चटर्जी और रवींद्रनाथ ठाकुर। बात करें बंकिम बाबू की तो उनकी चर्चा करते हुए खुद रवींद्रनाथ ने कहा, ‘राममोहन ने बंग साहित्य को निमज्जन दशा से उन्नत किया, बंकिम ने उसके ऊपर प्रतिभा प्रवाहित की। बंकिम के कारण ही आज बंगभाषा मात्र प्रौढ़ ही नहीं, उर्वरा और शस्य श्यामला भी हो सकी है।

’वंदे मातरम’ के रचयिता बंकिम बाबू का जन्म 27 जून, 1838 को बंगाल के एक समृद्ध परंपरागत बंगाली परिवार में हुआ था। किताबों के प्रति उनकी रुचि बचपन से ही थी। वे आरंभ में अंग्रेजी की ओर आकृष्ट थे। कहते हैं कि अंग्रेजी के प्रति उनकी रुचि तब समाप्त हो गई, जब उनके अंग्रेजी अध्यापक ने उन्हें बुरी तरह से डांटा।

इसके बाद वे अपनी मातृभाषा बांग्ला से इस कदर जुड़े कि इस भाषा की समृद्धि का एक सर्वथा नया अध्याय ही जोड़ दिया। बंकिम बाबू तालीमी तौर पर काफी मजबूत थे। 1857 के पहले स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में वे बंगाल के प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीए की उपाधि लेनेवाले पहले भारतीय थे।

उन्होंने कानून की डिग्री भी हासिल की। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने 1858 में ही डिप्टी मजिस्ट्रेट का पदभार संभाला और 1891 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए। सरकारी नौकरी में रहते हुए उन्होंने 1857 के विद्रोह पर अंग्रेजों की प्रतिक्रिया और भारतीयों पर उनके दमनचक्र को काफी नजदीक से देखा था।

सरकारी सेवक होने के नाते वे किसी सार्वजनिक आंदोलन में सीधे तौर पर शिरकत नहीं कर सकते थे और इस कारण उनका मन काफी कचोटता था। यही वह मोड़ था जब उन्होंने साहित्य सृजन में उतरने का फैसला किया। उन्होंने साहित्य के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों में जागृति का संकल्प लिया।

उनके साथ एक अच्छी बात यह भी रही कि वे गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में समान दिलचस्पी रखते थे, जिसका असर आगे उनके साहित्य सृजन में दिखा भी।

उनका पहला उपन्यास ‘रायमोहन्स वाईफ’ अंग्रेजी में था। 1865 में उनकी पहली बांग्ला कृति ‘दुर्गेशनंदिनी’ प्रकाशित हुई। उस समय उनकी उम्र केवल 27 वर्ष थी। इसके बाद आगे की रचनाएंं 1866 में ‘कपालकुंडला’, 1869 में ‘मृणालिनी’, 1873 में ‘विषवृक्ष’, 1877 में ‘चंद्रशेखर’, 1877 में ‘रजनी’, 1881 में ‘राजसिंह’ और 1884 में ‘देवी चौधुरानी’ आईं। उन्होंने ‘सीताराम’, ‘विज्ञान रहस्य’, ‘लोकरहस्य’ और ‘धर्मतत्त्व’ जैसे ग्रंथ भी लिखे। उन्होंने 1872 में मासिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ का प्रकाशन शुरू किया। रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे लेखक ‘बंगदर्शन’ में लिखकर ही साहित्य के क्षेत्र में आगे आए। वे बंकिम बाबू को अपना गुरु मानते भी थे। उनका कहना था, ‘बंकिम बांग्ला लेखकों के गुरु और बांग्ला पाठकों के मित्र हैं।’

बंकिम बाबू का सबसे चर्चित उपन्यास ‘आनंदमठ’ 1882 में प्रकाशित हुआ, जिससे प्रसिद्ध गीत ‘वंदे मातरम्’ लिया गया है। इस गीत के माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान देशप्रेम और राष्ट्रीयता की जो धारा बही, वह आज भी भारतीय जनमानस के बीच एक प्रेरक संवेदना की तरह प्रवाहित है। आठ अप्रैल 1894 को दिवंगत हुए बंकिम बाबू ने अपने जीते जी भले स्वाधीन भारत का सूर्योदय नहीं देखा पर उनके लेखन की लाली आज भी अपने देश से प्यार करने वाले और अपनी मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वालों की आंखों में तैरती है।