लाखा राम चौधरी
भारतीय राजनीति में भाषा के प्रश्न का केंद्र बिंदु राजभाषा (हिंदी) और क्षेत्रीय भाषाओं का आपसी द्वंद्व और अंग्रेजी का बने रहना है। भाषाई भावनाओं के कारण ही कभी-कभी क्षेत्रीय भाषाओं- भोजपुरी, मैथिली, मगही, बुंदेलखंडी, राजस्थानी आदि- को हिंदी की प्रतिद्वंद्वी भाषाओं के रूप में खड़ा करने की चेष्टा की जाती है। उर्दू भी इस प्रतियोगिता में किसी से पीछे नहीं रहना चाहती।
आजादी के बाद अगर हिंदी को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मानित दर्जा प्राप्त है, तो इसका अर्थ है कि हिंदी परिवार की सभी बोलियों को वही दर्जा प्राप्त है, जो हिंदी को है। लेकिन विडंबना है कि हिंदी की प्रमुख बोलियां- मैथिली और नेपाली को हिंदी से अलग करके संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया, जबकि ये स्वयं हिंदी की बोलियां हैं। क्या यह हिंदी के साथ अन्याय और विखंडन का नया तरीका नहीं है? इसी के चलते आगे चल कर भोजपुरी, राजस्थानी आदि के लोग अपनी-अपनी भाषाओं को संविधान में दर्जा देने की मांग करने लगे। जब हिंदी की सभी बोलियां संवैधानिक अनुसूची में दर्ज होने का मर्ज पाल लेंगी, तो क्या हिंदी अपने आप विलुप्त नहीं हो जाएगी?
आजादी के बाद 1948 में चौदह भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल की गई थीं। 1967 में इसमें संशोधन कर पंद्रहवीं भाषा के रूप में सिंधी को जोड़ा गया। इसके बाद धर्म, क्षेत्र और भाषा की राजनीति बढ़ने के साथ ही कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषा को शामिल कर लिया गया। फिर 2003 में डोगरी, बोडो, मैथिली और संथाली के शामिल होने से बाईस सरकारी भाषाएं हो गर्इं। क्षेत्रीय भाषाओं को आठवीं अनुसूची में डालने के लिए गठित सीताराम महापात्रा समिति ने 2004 में अपनी संस्तुतियां दी थीं। रिपोर्ट में अड़तीस प्रस्तावित क्षेत्रीय भाषाओं को आठवीं अनुसूची में डालने का दबाव है। दरअसल, सरकार के सामने दिक्कत है कि पहले ही बाईस आधिकारिक भाषाओं में कामकाज करना बेहद महंगा और मुश्किल हो रहा है।
सबसे बड़ी समस्या तो संघ लोक सेवा आयोग और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के सामने है। यूपीएससी को आठवीं अनुसूची में शामिल होने वाली भाषाओं को तीन अधिकार देने पड़ते हैं, पहले तो उस भाषा को यूपीएससी की प्रशासनिक परीक्षा में शामिल करना होता है, दूसरे वैकल्पिक भाषा के प्रश्न-पत्र में उसे शामिल करना होता है और साथ ही उस भाषा में यूपीएससी को साक्षात्कार लेना भी सुनिश्चित करना होता है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं का उल्लेख रुपए पर करना होता है। पर आरबीआई अभी पंद्रह भाषाओं को ही नोट पर छाप रही है, अगर कोई इस पर प्रश्न खड़ा करे तो आरबीआई को बाईस भाषाओं में नोट छापने में दिक्कत होगी। ऐसे में अगर अड़तीस प्रस्तावित भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाए तो कुल साठ भाषाओं को जगह देना आरबीआई के लिए मुश्किल होगा।
हिंदीभाषी राज्यों के अंग्रेजी-विरोधी आंदोलन की प्रतिक्रिया दक्षिण के राज्यों में खुल कर होती रही। सरकार के संयमपूर्ण प्रयत्नों और विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों के प्रयास के कारण भाषाई आंदोलन की राजनीति धीरे-धीरे शांत हो गई है। चौथे आम चुनाव के बाद देखा गया कि राजनीतिक दल प्राय: भाषा को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार नहीं बनाते। हिंदी समर्थकों ने भाषा के प्रश्न पर अपना रुख काफी नरम बना लिया है। इसके बावजूद उत्तर और दक्षिण भारत में भाषा के प्रश्न पर मतभेद अब भी बने हुए हैं और त्रिभाषा सूत्र को सफलतापूर्वक अपनाया नहीं जा सका है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर तथा तमिलनाडु ने त्रिभाषा फार्मूले को स्वीकार नहीं किया। ऐसे में भाषा का प्रश्न भारतीय राजनीति में फिर सिर उठा सकता है।
भाषावाद की समस्या दरअसल, निहित राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित समस्या अधिक रही है। लोगों ने यह भुला दिया कि राष्ट्रीय एकीकरण के लिए हिंदी का संपर्क भाषा के लिए प्रयोग आवश्यक है। अंगे्रजी के पठन-पाठन को हिंदी का पूर्ण विकास होने तक छोड़ा नहीं जा सकता है। भाषा के प्रश्न पर भारत में उदारतापूर्वक समाधान निकाला जा सकता है। भारत जैसे विविधता वाले देश में भाषा के प्रश्न पर उदारवादी और सहिष्णु दृष्टिकोण अपना कर ही इस गंभीर समस्या का विवेक संगत समाधान निकाला जा सकता है।
भूमंडलीकरण की लगातार तेज होती आंधी ने भारतीय भाषाओं की बुनियाद हिला दी है। हमारी बोलियां पीछे छूटती जा रही हैं। वह उन बोलियों को समयानुकूल नहीं मानती। इसलिए उसने बोलियों से दूरी बना ली है और अगर बोलियों से दूरी बनाने का सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब इन बोलियों का आस्तित्व खतरे में आ जाएगा।
भाषा तो संस्कृति और सामाजिक विकास की सतत धारा से जुड़ी होती है। संस्कृति के विकास के साथ भाषा का विकास अवश्यंभावी होता है। आज जिस भाषा का विस्तार मीडिया और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा हो रहा है, वह अधकचरी हिंदी है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या हिंदी का विकास इसी तरह होगा? ऐसे अनिश्चितता भरे माहौल में आवश्यकता है एक समुचित भाषा नीति बनाने की, ताकि भारतीय भाषाओं को समुचित और वास्तविक संरक्षण मिल सके और अपनी भाषा में कार्य करने में लोगों को गर्व की अनुभूति हो, कुंठा की नहीं। हालांकि कुछ भारतीय भाषाओं को संविधान में स्थान प्राप्त होने के कारण सरकारी संरक्षण प्राप्त हो जाता है, पर एक व्यावहारिक सत्य यह भी है कि जिस भी भाषा को सरकारी संरक्षण प्राप्त हुआ है वह समाप्ति की ओर अग्रसरित मानी जाती है। संविधान में चाहे कितनी ही भाषाओं को संरक्षण प्रदान कर दिया जाए, जब तक अंग्रेजी को परोक्ष तरीके से बढ़ावा दिया जाता रहेगा, किसी भारतीय भाषा का हित नहीं हो सकेगा। इसलिए अगर भाषा को राजनीति से ऊपर उठा कर और ईमानदारी के साथ कोई नीति बना कर उसे क्रिर्यान्वित किया जाए, तभी हम इनके आस्तित्व को बचा पाएंगे।
भारतीय परिवेश में अगर हिंदी की चाल को सुदृढ़ करना है तो भूमंडलीकरण ही नहीं, वसुधैव कुटंबकम ज्यादा हितकारी है। अन्यथा अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव से यहां के लोकगीत, लोकनृत्य, लोक-संस्कृति, लोक-कथाएं, लोरियां, लोकोक्ति और मुहावरे दफना दिए जाएंगे, केवल विज्ञापन शेष बचेगा। आज के दौर में अंगे्रजी का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो प्रत्येक देश की अपनी भाषा के साथ अंग्रेजी को मिश्रित पाएंगे। भारत में भी। इसके चलते हिंदी के साथ-साथ बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं तक का अस्तित्व खतरे में नजर आता है। बहुत से भूमंडलीकरण के अगुआ देशों के प्रभाव में क्षेत्रीय भाषाओं की संख्या लगातार कम हो रही है। मसलन, लैटिन अमेरिका में जहां चार सौ भाषाएं थीं, अब मुश्किल से सौ के लगभग बची हैं।
भारतीय भाषाओं को भय है तो अपने अनावश्यक प्रयोगों, अंग्रेजी मानसिकता और देशी राजनीति के अखाड़ेबाजों से। इसके साथ अनावश्यक प्रयोग चलते रहते हैं।
जैसे देवनागरी लिपि में फारसी की तरह नुक्ता लगाने का। वैज्ञानिक तकनीकी विकास के साथ कंप्यूटर, इंटरनेट, ई-मेल, वेबसाइट आदि संचार माधयमों ने मिल कर भारतीय भाषाओं के सामने यांत्रिक चुनौतियां उपस्थित की हैं। पर इसका भी समाधान समय के अनुसार निकल आया है। आज लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के कंप्यूटर सॉफ्रटवेयर उपलब्ध हैं। भारतीय भाषाएं वैदेशिक भाषाओं के साथ संक्रमण के दौर से गुजर रही है। इस संक्रमण से भयभीत हुए बिना हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि हमारी भाषाएं अपने आप में उसी प्रकार मजबूत है जिस प्रकार हमारी संस्कृति जो शताब्दियों की गुलामी के बावजूद सुरक्षित है और मजबूत थी।

