रेनू सैनी
हरित कछुआ अपनी शिक्षा पूरी करके नंदन वन की ओर लौट रहा था। वह बेहद खुश था। जब वह नंदन वन के मोड़ पर पहुंचा तो उसे बड़ी हैरानी हुई। वह सोच रहा था कि उसका स्वागत करने के लिए पूरा नंदन वन वहां मौजदू होगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था । बस उसके माता-पिता और छोटी बहनी हरिता ही उसे लेने के लिए आए हुए थे । हरित को देखकर सभी की आंखें भर आर्इं। हरित की आंखों से भी खुशी के आंसू बह निकले। उसने माता-पिता के पैर छूकर अपनी डिग्रियां और पुरस्कार उनके हाथों में थमाए और छोटी बहन को प्यार से गले लगाया। कुछ दिन बीत जाने पर हरित को नंदन वन का माहौल बुझा-बुझा और अलग सा लगा। जब उसने माता-पिता से इस बारे में बात की तो मां बोली, ‘बेटा, आजकल किसी में भी धैर्य और सहनशक्ति रह ही नहीं गई है। जरा-जरा सी बातों पर नंदन वन के प्राणी एक-दूसरे से लड़ कर बैठ जाते हैं और फिर उनमें बोलचाल बंद हो जाती है। ईर्ष्या और क्रोध के कारण नंदन वन इस आग में जल रहा है । महाराज शेरसिंह व मंत्री चीकू खरगोश ने नंदन वन के प्राणियों को बहुत बार समझाने की कोशिश की, प्रेम और हंसी-खुशी से जीवन बिताने के लिए कहा, लेकिन किसी पर कोई असर ही नहीं होता। सब के पास अपने-अपने तर्क होते हैं कि इसने मुझे ऐसा क्यों कहा? इसकी बद्दुआ ने मुझे नुकसान पहुंचा दिया आदि-आदि। सारी बातें सुन कर हरित दंग रह गया। उसने घूम कर हर प्राणी पर निगाह रखी और इस निर्णय पर पहुंचा कि वास्तव में सभी प्राणी धैर्यहीन और कुसंस्कारी होते जा रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चे भी बड़ों की इज्जत नहीं करते। नंदन वन का बिगड़ता माहौल देखकर हरित को बहुत दुख हुआ। उसने नंदन वन के सामाजिक व हिंसक परिवेश को सुधारने की ठानी। आखिर यह समय उसकी अर्जित की गई शिक्षा की परीक्षा का था।
वह शेरसिंह के पास गया और उन्हें दिलासा देता हुआ बोला, ‘महाराज, आप परेशान न हों। अब मैं यहां आ गया हूं। आपकी कृपा से मैंने अच्छी शिक्षा और विचार ग्रहण किए हैं। अब वक्त है अपनी शिक्षा और विचारों को अन्य प्राणियों के साथ बांटने का, ताकि सभी प्राणी खुशी से और प्रेमपूर्वक मिल-जुलकर रह सकें।’ मंत्री चीकू भी हरित के साथ हो लिया।
जब वे पीपल के पेड़ के नीचे से गुजरे तो वहां पर उन्हें कालू और कल्लू कौए के जोर-जोर से लड़ने की आवाजें आर्इं। चीकू ने आवाज लगाकर दोनों को नीचे बुलाया तो कालू रोते हुए बोला, ‘इसने मेरी लाई रोटी का मजाक उड़ाया। जैसे ही मैंने इसे जवाब देने के लिए मुंह खोला, मेरी रोटी पेड़ से नीचे गिर गई और किन्नी लोमड़ी उसे उठा कर भाग गई।’ कालू की इस बात पर कल्लू को हंसी आ गई। कालू रोते हुए बोला, ‘मैं तुझे बद्दुुआ देता हूं कि तू कभी सुखी नहीं रहेगा और एक-एक टुकड़े को तरसेगा।’ यह सुनकर कल्लू कौआ कालू को मारने के लिए झपटा। तभी हरित और चीकू ने उनका बचाव किया। हरित पहले कालू से बोला, ‘कालू, रोटी तुम्हारे पास थी तो तुम्हें कल्लू की बात पर ध्यान ही नहीं देना था। तुम दोनों ही लड़ाई को बढ़ाने के बराबर हकदार हो । खाली कल्लू के कहने भर से तुम्हारी रोटी खराब नहीं हुई। तुमने इसे जवाब देने के लिए मुंह खोला ही क्यों? ’ इसके बाद हरित, कल्लू से बोला, ‘और तुम, तुम्हें भी आपने काम पर ध्यान देना चाहिए। उसकी रोटी किन्नी उठाकर भाग गई। वह मेहनत से उसे लेकर आया था। ऐसे में उसके अपशब्द बोलने पर तुम नाराज क्यों हुए?’
इसके बाद हरित ने कालू और कल्लू को एक स्थान पर बैठा कर हल्की डांट लगाई और समझौता करा दिया। कालू और कल्लू ने एक-दूसरे से माफी मांगी प्रेम से रहने का वायदा किया।
कुछ और आगे बढ़ने पर चीकू और हरित को गजनी हाथी और मिक्की बंदर के लड़ने की आवाजें आर्इं। वहां जाकर देखने पर पता चला कि मिक्की फल तोड़ रहा था, जो गलती से छूट कर गजनी के ऊपर जा गिरा और गजनी इसी बात पर भड़क गया। हरित ने गजनी से कहा, ‘भैया, तुम तो नंदन वन की शान हो। तुम्हारी बुद्धि और ताकत का जवाब नहीं है। उसके बाद भी मात्र एक फल गिरने से तुम अपना आपा खो बैठे।’ मिक्की ने जान-बूझकर तुम पर फल नहीं फेंके थे। हरित से अपनी प्रशंसा सुन कर गजनी को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने मिक्की से माफी मांगी।वहां से चलते हुए हरित चीकू से बोला, ‘हर कोई अपनी प्रशंसा चाहता है। ऐसे में हर प्राणी के साथ प्रेम और अपनापन प्रकट करते हुए उसके गुणों की तारीफ करने पर उसके क्रोध और ईर्ष्या के स्वभाव को बदला जा सकता है।’ चीकू हरित की बातों से सहमत हुआ और उसकी बुद्धि, समझदारी, धैर्य और शांत रहने के गुणों से अत्यंत प्रभावित हुआ। इस प्रकार धीरे-धीरे हरित ने नंदन वन में लड़ने वाले सभी प्राणियों को उनके गुणों से अवगत कराया और कहा कि उन्हें अपने अच्छे गुणों का प्रयोग नंदन वन को आगे बढ़ाने में करना चाहिए ।
आठ महीने बाद नंदन वन में सालाना जलसा आयोजित किया गया। इस जलसे के अंतर्गत बीस ऐसे प्राणियों को सम्मानित किया गया जो अपने सद्व्यवहार, धैर्य, सहनशीलता और दूसरों की मदद करने में आगे रहे थे। इन बीस प्राणियों में कल्लू और कालू कौआ, गजनी हाथी, मीकू बंदर के साथ ही किन्नी लोमड़ी, सुनू हिरन, पीकू मोर, किट्टू कबूतर, सीकू सियार, गोरी गौरेया आदि शामिल थे । सबको सम्मानित करने के बाद महाराज शेरसिंह ने हरित कछुए को मंच पर बुलाया और सब प्राणियों से बोला, ‘शिक्षा वास्तव में प्राणी को परिष्कृत करके उसके जीवन में खुशियों और सुखों को भर देती है। हर प्राणी को ऐसे ही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए जैसे हरित ने की है और अपनी शिक्षा का प्रयोग प्राणी की मदद करने के लिए करना चाहिए । आज से हरित को नंदन वन के सलाहकार के पद पर नियुक्त किया जाता है।’ यह घोषणा सुनकर हरित के माता-पिता और बहन के साथ ही समूचे नंदन वन के प्राणी खुशी से झूम उठे। हरित अपनी शिक्षा की परीक्षा में पास हो गया था। जीत की झलक उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी। ०

