चेतना में दीवारें नहीं होतीं
राजी सेठ का एक वाक्य वक्त-बेवक्त याद आता रहा- साहित्य के संसार में दुखों को दोहने का एक चस्केदार चलन है, जैसे कि दुख अपने में अलग-थलग कोई चीज है, जिसका सुख से परिप्रेक्ष्य पाने का कोई रिश्ता नहीं है, ऐसा नहीं है कि दुख उनके भीतर जलती आस्था और विश्वास की लौ देख कर उनकी गली छोड़ कर किसी दूसरी गली का रास्ता नापने लगता है। उन्होंने दुखों, परेशानियों से युद्ध लड़ा है और रास्ता तलाश कर उस पर चल दी हैं। रमेश दवे के एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि जब तक कोई स्पष्ट ध्येय या दिशा सामने नहीं होती, व्यक्ति अपने उपकरणों या क्षमताओं का इस्तेमाल करना नहीं जानता। वह ‘अतिरिक्तता’ जिए जाते जीवन के छोटे-मोटे आयामों में व्यक्त जरूरी होती रहती है, पर मुख्यत: तो अवरुद्ध ही करती है।
राजी सेठ को पढ़ना काफी आसान है, अपितु काफी दिलचस्प भी, क्योंकि उनके परिमार्जित गद्य की अनेक पंक्तियां हमारी स्मृति, इतिहास और दर्शन को अधिक सुलभ बना देती हैं। लेकिन उन पर लिखना काफी मुश्किल है, क्योंकि बने बनाए निकष, पैरामीटर, इंची टेप की तरह उनके व्यक्त जज्बात, कथाचेतना की पैमाइश नहीं ले पाते, मौजूदा आलोचना का रवैया ज्यादा मदद नहीं करता। नए क्षितिज हम उद्भाषित नहीं कर पाए। बकौल रामविलास शर्मा, ‘जिस कसौटी पर गहने की परीक्षा की जाती है, उस पर तलवार की परीक्षा नहीं की जा सकती।’
चेतना में दीवारें नहीं होतीं : संपादक- तरसेम गुजराल; अमन प्रकाशन, 104-ए/80-सी, रामबाग, कानपुर; 495 रुपए।
चलते रहे रात भर
राकेश मिश्र की कविताएं दैनिक जीवन में प्रयुक्त साधारण बिंबों द्वारा मानवीय संघर्ष की तस्वीरें खींचती हैं। कविता की छोटी-छोटी पंक्तियों में वे सामाजिक विसंगतियों और निरावृत्त सत्य का एक पूरा परिदृश्य अंकित करते हैं। इस दृष्टि से ‘रोटियां’ शीर्षक कविता विशेष रूप से चिंतनीय बन पड़ी है- ‘बांध दो/ सूखी रोटियां/ कंटीले तारों से/ पोत दो/ मक्खन/ सूखी रोटियां/ नंगी हों/ तो/दस्तावेज होती हैं/ हमारी बेईमान आदमीयत की’। इस तरह मिश्र जी मनुष्य के मूलभूत संघर्ष, दुख-दर्द और उसकी नियति की सही पहचान रखते हैं।
वे अपने आसपास की सारी जानी हुई चीजों को बिल्कुल साफ-सुथरे और विश्वसनीय ढंग से व्यंजित करते हैं। इस ढंग की कविताओं में ‘नारे’, ‘चुप होती आवाज’, ‘हेलीकॉप्टर’, ‘कंक्रीट की दीवारें’, ‘अखिर कब तक’, ‘उदास बच्चे’, ‘चलते रहे रात भर’, ‘कृष्ण विवर’, ‘तस्वीर’, ‘चौराहा’, ‘शहर में रातें’, ‘खिलारी’, ‘गुरुजी’, ‘शहर’, ‘भूख’ तथा ‘वह लड़की’ का समावेश किया जा सकता है। इससे यह माना जा सकता है कि मिश्र जी के लिए कविता सिर्फ कला-यात्रा नहीं है। वह सामाजिक दायित्वों को सजगता के साथ संपादित करने की विधा है।
चलते रहे रात भर : राकेश मिश्र; राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, जी-17, जगतपुरी, दिल्ली; 595 रुपए।
नहीं, मैं तुम्हारी बेटी नहीं हूं!
इस संग्रह में अरुणेंद्र वर्मा ने अपनी कहानियों को सेना, बल्कि मुख्यत: वायुसेना के जीवन पर केंद्रित किया है। सैन्य जीवन से भारतीयों का परिचय केवल शौर्य पुरस्कारों से सम्मानित सैनिकों की अद्भुत पराक्रम-गाथाओं और सरकारी विवरणों में सिमट कर रह गया है। इस असंतुलन को पाटने का सशक्त तरीका हो सकता था- सैन्य जीवन के अंतरंग क्षणों का मार्मिक किंतु सरस चित्रण करने वाले साहित्य का प्रकाशन। इन कहानियों में कथाकार का व्यंग्य शिल्प बीच-बीच में हाजिर होकर अपना करिश्मा दिखाने में नहीं चूकता और कहानी में एक अलग ही स्वाद का तड़का लग जाता है।
कसे-बंधे, लीक पर चलने वाले फौजी जीवन के अंतरस्वातंत्र्य को लेखक ने जिस बारीकी से पकड़ा है वही इन कहानियों में पहुंच कर रसानुभूति की राह खोलता है। कहानियों के पात्रों में पाठकों को गहरे संवेद्य-तंत्र का साक्ष्य मिलेगा। वे समझ पाएंगे कि फौजी के सीने में भी एक आम इंसान का दिल धड़कता है और ताउम्र उसी तरह धड़कता रहता है।
नहीं, मैं तुम्हारी बेटी नहीं हूं! : अरूणेंद्र नाथ वर्मा; इंडियन पब्लिशिंग हाउस, 852, महावीर नगर, टोंक रोड, जयपुर; 325 रुपए।
