डॉ. वरुण वीर
भारतवर्ष में ध्यान की परंपरा वैदिक काल से रही है और विश्व में जहां भी यह परंपरा है वह केवल भारतीय संस्कृति की देन है। ध्यान की परंपरा में पंचकोश ध्यान भी शामिल है। इसमें एक-एक कोश पर ध्यान केंद्रित करने से पांच प्रकार के ध्यान की विधि सामने आती है। प्रत्येक कोश पर ध्यान केंद्रित कर अलग-अलग लाभ लिए जा सकते हैं। पहले यह जानें कि पंचकोश है क्या? दरअसल, जो हमें यह शरीर दिखाई देता है, वह केवल एक शरीर है। इस शरीर के अंदर चार शरीर और विद्यमान हैं। इन सभी को मिलाकर पंचकोश कहा गया है। ये हैं- अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश।
अन्नमय कोश
हमें यह जो शरीर दिखाई दे रहा है, पैर के अंगूठे से लेकर सिर तक तथा इसके अंदर के त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) और सप्तधातु ( रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र), सभी अन्नमय कोश में आते हैं। यह कोश अन्य सभी कोशों का आधार है। इस कोश को स्वस्थ बनाने के लिए योगासन, भोजन तथा निद्रा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। योगासन प्रतिदिन 30 मिनट करने से शरीर में लचीलापन तथा आंतरिक अंगों में सुदृढ़ता आती है। साथ ही रक्त संचार ठीक होने से स्नायु तंत्र ठीक बना रहता है। ऋषि चरक के अनुसार भोजन करते समय तीन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए- ऋतुभुक, हितभुक और मितभुक।
ऋतुभुक : हम जो भी भोजन चुनें उसे मौसम के अनुसार होना चाहिए। जिस मौसम में जो फल-सब्जी उत्पन्न होता है, उसे मौसम के अनुसार ही प्रयोग करना चाहिए अन्यथा वह रोग का कारण बनता है।
हितभुक : शरीर के लिए जो हितकारी है उसका ही सेवन करना चाहिए तथा मितभुक अर्थात भूख से कम भोजन ग्रहण करना चाहिए।
निद्रा : गहरी नींद तथा बिना सपने के सोना ही श्रेष्ठ है। कम से कम छह और अधिक से अधिक आठ घंटे की नींद पर्याप्त है।
ध्यान विधि : सुख प्राण को सीधी करके बैठे। आंखें बंद और सांस सामान्य रखें। ध्यान में पैर के अंगूठे से लेकर सिर तक के भाग को देखें और फिर शरीर के एक-एक अंग को देखें। लगभग पांच मिनट तक अपने शरीर को बाहरी रूप से देखें और एक-एक अंग को शांत होने का निर्देश दें। गहरे लंबे श्वास के साथ मन को भीतर ले जाएं और भीतर के अंगों को देखें जैसे आप का पाचन तंत्र, लिवर, किडनी, हृदय, रक्त संचार, स्नायु तंत्र।
इन सभी तंत्रों पर ध्यान केंद्रित करने से उन सभी तंत्रों की कार्यशैली उनका उपयोग और उनका लाभ कैसे लिया जा सकता है, इस ध्यान के माध्यम से हम सरलता पूर्वक जान सकते हैं। लगभग 10 से 15 मिनट तक यह ध्यान करने से हम अपने अन्नमय कोश से अच्छी प्रकार से परिचित हो जाते हैं।
प्राणमय कोश
प्राण ही है जो इस शरीर को जीवित रखे हुए हैं। जो श्वास हम लेते हैं उसी के माध्यम से प्राणशक्तिहमारे शरीर के भीतर कार्य करती है। प्राण दस प्रकार के हैं- उदान, प्राण, समान, अपान, व्यान, नाग, देवदत्त, कूर्म, कृकल और धनंजय। इनमें से पांच प्राण अधिक महत्त्वपूर्ण हंै। उदान का स्थान विशुद्धि चक्र है। प्राण का स्थान हृदय अनाहत चक्र है। समान का स्थान हृदय और नाभि के बीच में है। अपान का स्थान नाभि मणिपुर चक्र है तथा व्यान का स्थान संपूर्ण शरीर है। प्राणमय कोश को संतुलित तथा स्वस्थ बनाने के लिए प्राणायाम का प्रतिदिन अभ्यास 15 से 30 मिनट तक करना चाहिए।
ध्यान विधि : सुखासन में बैठकर एक-एक करके पांचों प्राण के स्थान पर ध्यान केंद्रित करने से प्रत्येक प्राण तथा उस चक्र का ज्ञान होना आरंभ हो जाता है। प्रत्येक प्राण के स्थान पर तीन से पांच मिनट का ध्यान करना चाहिए।
मनोमय कोश
इस कोश में अहंकार तथा पांच कर्मेंद्रियां हैं। मन ही है, जो बुद्धि तथा आत्मा को गुलाम बनाकर रखता है। मन को दृढ़ संकल्प के साथ नियंत्रित करना जरूरी है। जैसे शरीर का भोजन अन्न और प्राण का भोजन प्राणशक्ति है। उसी प्रकार से मन का भोजन अच्छे सात्विक विचार हैं। मन को साधने के उपाय त्राटक और ध्यान हैं।
त्राटक विधि-1: एकांत स्थान में रीढ़ की हड्डी को सीधा कर के बैठें। आंखों के समानांतर लगभग पांच से आठ फुट की दूरी पर एक इंच का काले रंग का गोला दीवार पर बनाएं और उस पर बिना पलक झपकाए आंखों से पानी आने तक टकटकी लगा कर देखें।
विधि-2: सामने जमीन पर एक मोमबत्ती या दीया रखें। उसकी लौ को तब तक लगातार देखें जब तक आंखों से पानी न निकलने लगे।
ध्यान विधि : इस ध्यान विधि में केवल विचारों को देखना है। कल्पना करें कि आप बैठे हैं और आपके बाएं और एक बॉक्स है। जो भूतकाल से विचार आते हैं उन्हें इस बॉक्स में डाल दें। एक बॉक्स दाईं तरफ है, जो विचार भविष्य से आते हैं उन्हें उस बॉक्स में डाल दें। आपके सामने एक और बॉक्स है, जो विचार वर्तमान से आते हैं उन्हें उसमें डाल दें। यह ध्यान करने से आपके मन में विचारों की गति अत्यंत धीमी हो जाती है और अच्छे अभ्यास से कई बार मन विचार-शून्य हो जाता है।
विज्ञानमय कोश
किसी भी इंद्री में यदि कोई दोष हो तो भी जीवन चलाया जा सकता है। लेकिन यदि बुद्धि मंद है या फिर बुद्धि में विकार है तो जीवन अपने आप नहीं चलाया जा सकता है। बुद्धि ही है जो द्वंद्व अर्थात सुख-दुख, हानि-लाभ और मान-अपमान आदि को पहचान कर निर्णय करती है और फिर आत्मा को अनुभूति के लिए भेज देती है।
ध्यान विधि : प्रत्येक इंद्री के गुण, कर्म तथा स्वभाव पर ध्यान लगाना। जैसे कान का गुण सुनना है, ध्वनि को पहचानना तथा अनुभव करना है। इसी प्रकार से आंख का गुण तथा कर्म देखना है। जब इंद्रियों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है तो उन्हें अपने वश में किया जा सकता है। ध्यान तथा ध्यान में दृढ़ संकल्प से इंद्रियों को संतुलित तथा नियंत्रित किया जा सकता है।
आनंदमय कोश
यह शुद्ध सात्विक और अन्य चारों कोशों का स्वामी है। यह आत्मा है। आत्मा ही भोक्ता व कर्ता है। अन्य सभी इसी के अधीन कार्य करते हैं लेकिन यदि आत्मा जागरूक न हो तो अन्य कोश इस पर राज करते हैं। इसलिए चारों कोशों को शुद्ध संतुलित व स्वस्थ रखना आत्मा का कार्य है। परमपिता परमात्मा से प्रेरणा पाकर ही आत्मा इन अन्य कोशों के माध्यम से अपना कल्याण कर सकता है।
आत्म साक्षात्कार तथा ईश्वर साक्षात्कार तभी संभव है जब आत्मा में अन्य चारों कोशों को बांधकर अपने कल्याण में प्रयोग करें। जैसे सभी कोशों का अपना-अपना भोजन है, उसी प्रकार से आनंदमय कोश अर्थात आत्मा का भोजन परमात्मा है।
पंचकोश ध्यान हमें आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं। प्रत्येक कोश का ध्यान और ज्ञान हमें परमात्मा तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध होता है। इसलिए अपने पंचकोश पर प्रतिदिन ध्यान करने से सुख शांति और आनंद की अनुभूति होती है।

