रंग, छवि और शब्द के बीच की एकसूत्रता पर कला जगत में आधुनिक दौर में आलोचकीय बहस तो खूब हुई, पर इस एकसूत्रता को साधने वाले कम ही हुए हैं। जगदीश स्वामीनाथन का नाम इस लिहाज से अहम है कि वे न सिर्फ इस एकसूत्रता की कसौटी पर खरे उतरते हैं बल्कि अपनी तूलिका और कलम से मनुष्य की चेतना और संवेदना का गहन स्पर्श करते हुए अभिव्यक्ति की एक स्वायत्त और सघन दुनिया भी वे रचते हैं।
स्वामीनाथन मनुष्य की अंतरात्मा और कला माध्यम के प्रश्नों को अटूट देखने में समर्थ थे। इसलिए वे उन रूढ़ियों के भी खिलाफ रहे, जिन्हें कलावंत बेवजह ढोते जा रहा थे। स्वामीनाथन की खासियत यह है कि एक चित्रकार के रूप में वे जिस तरह प्रकृति में रमते हैं, प्रकृति को भी ठीक उसी तरह अपनी कविताओं में भी लेकर आते हैं। उनके चित्रों के साथ उनकी कविताओं में भी उनके चित्रभाव और काव्य संवेदना के सूक्ष्म अनुभवों की प्रभावी अभिव्यक्ति है। यही वजह है कि उनकी कविताओं को उनकी चित्रकृतियों के ही एक रूप में देखा-पहचाना गया है।
दूसरा पहाड़, जलता दयार और ग्राम देवता सरीखी सूक्ष्म मनोभावों की कविताएं लिखने वाले स्वामीनाथन के यहां कला के दो माध्यमों के बीच जिस तरह की एकता संभव से आगे एक साझे संसार में बदलती है, वह अपूर्व है।
एक अलमस्त फकीर की जिंदगी जीनेवाले स्वामीनाथन ने अपने जीवन में सुख-सुविधाओं की कभी परवाह नहीं की। यह अलग बात है कि निधन के बाद कला नीलामियों में उनके चित्रों की करोड़ों में बोलियां लगीं। शायद स्वामीनाथन के जीवन की अस्तव्यस्तता और अराजकता तक कही जा सकने वाली अव्यवस्था के बीच कहीं एक ऐसी व्याकुलता थी, जो जिंदगी और कला के बीच साझा और स्थायी सूत्र विकसित करना चाहता था।
उनका जन्म 21 जून, 1928 को शिमला में बसे एक तमिल परिवार में हुआ था। स्वामीनाथन तमिलभाषी थे। बचपन में जिस स्कूल में वे पढ़ते थे, वहीं निर्मल वर्मा भी छात्र थे। बाद में उनकी और निर्मल वर्मा की अच्छी बौद्धिक मित्रता भी हो गई थी। स्वामीनाथन की अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही भाषाओं पर समान पकड़ थी। वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और फिर कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया के सदस्य रहे। कुछ समय उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी की पत्रकारिता भी की। बाद में आदिवासी कला के संरक्षण के लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया।
कला और कविता को एक साथ साधने का अभ्यास रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद अगर किसी के यहां बड़े फलक पर दिखता है तो वे स्वामीनाथन ही थे। अलबत्ता अपनी चिंताओं और प्राथमकिताओं में वे कविगुरु से काफी भिन्न और दूर हैं। वे कला की कुलीनता को नहीं मानते बल्कि उसकी स्वाभाविक निर्मिति उन्हें आकर्षित करती है। अपनी कविताओं में भी वे संवेदना की अभिजात्य दुनिया से अलग जिंदगी को उसके ठेठ रंग में देखने-पहचानने की ईमानदार कोशिश करते हैं।
स्वामीनाथन हर तरह के आग्रह से आगे हैं बल्कि आग्रहों की दुनिया के आगे वे चुनौती की तरह हैं। वैचारिक कार्यकर्ता के तौर पर भागमभाग वाली जिंदगी जीते हुए कभी पैसों की जरूरत पड़ी तो कोलकाता के सिनेमाघर के सामने ब्लैक में टिकट बेचने से भी वे नहीं हिचके तो कभी किसी प्रकाशक ने आर्थिक तंगी का लाभ उठाकर उनसे हिंदी में जासूसी उपन्यास तक लिखवा लिया।
25 अप्रैल 1994 को जब उनका निधन हुआ, उससे पहले वे थोड़े अस्वस्थ जरूर थे पर कई मोर्चों पर लगातार सक्रिय थे। जीवन, विचार और कला के त्रिपक्ष को जिस तरह उन्होंने अभिव्यक्ति का स्वायत्त पक्ष बनाया, वो हमेशा उन्हें रचनात्मकता की दुनिया का अक्षर उल्लेख बनाए रखेगा।
