एआर आजाद
गरमी का मौसम शुरू होते ही देश के बहुत सारे इलाकों में पानी के लिए हाहाकार मच जाता है। सरकारों के माथे पर पसीना उतर आता है कि कैसे लोगों को जरूरत भर का पानी उपलब्ध कराया जाए। लंबे समय से पानी की समस्या से पार पाने के उपाय तलाशे जा रहे हैं, मगर इस दिशा में संतोषजनक कामयाबी नहीं मिल सकी है। हमारे देश में सैकड़ों बांध, हजारों नदियां और छह लाख से अधिक तालाब हैं। इसके बावजूद पानी की किल्लत हमें सोचने पर विवश करती है कि आखिर देश प्यासा क्यों हैं?
एक तंदुरुस्त व्यक्ति को दिन भर में कम से कम ढाई लीटर और इस हिसाब से पूरे देश के लिए प्रतिदिन तीन सौ करोड़ लीटर पानी की जरूरत होती है। टिहरी बांध की क्षमता चार घन किलोमीटर यानी चालीस हजार करोड़ लीटर है। इस तरह अगर ऐसे तीन बांधों का पूरा पानी इस्तेमाल हो तो देश की पूरी आबादी के लिए पर्याप्त होगा। मगर फिर भी पानी की समस्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। दरअसल, भारत में पेयजल और घरेलू जरूरत के पानी की आपूर्ति का अलग-अलग ढांचा नहीं है। इसलिए भारतीय मानक ब्यूरो यानी बीआइएस ने हर व्यक्ति के लिए रोजाना पानी की जरूरत डेढ़ सौ से दो सौ लीटर तक आंकी है। लेकिन बढ़ती आबादी के अनुपात में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता घटती जा रही है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 1947 में भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए सालाना 6,042 घन मीटर पानी उपलब्ध था, लेकिन 2011 की जनगणना के बाद पानी की उपलब्धता महज 1,545 घन मीटर रह गई है। शहरी विकास मंत्रालय ने लोकसभा में पैंतीस प्रमुख शहरों में जल आपूर्ति को लेकर आंकड़ा पेश किया था। इन आंकड़ों में तीस शहरों को उनकी जरूरत से कम पानी मिलने की खबर भी सामने आती है। शहरों का एक बड़ा हिस्सा भूजल का इस्तेमाल कर रहा है। नतीजतन, भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है।
उद्योगों में पानी की खपत: एक अनुमान के मुताबिक विश्व भर के पंद्रह फीसद जल का उपयोग उद्योग जगत करता है। तापीय बिजली घर में पानी का उपयोग शीतलन के लिए किया जाता है। वहीं जलविद्युत संयंत्र में भी पानी का उपयोग बिजली स्रोत के रूप में किया जाता है। ठीक इसी प्रकार अयस्क और पेट्रोलियम संयंत्र रासायनिक प्रक्रियाओं में पानी का इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह के कई उद्योग यानी विनिर्माण संयंत्र पानी का इस्तेमाल विलायक के रूप में करते हैं। औद्योगिक उपयोग में आने वाला पानी बड़ी मात्रा में बर्बाद हो जाता है। नतीजतन, खेत सूखे रह जाते हैं और जल स्रोतों का स्तर नीचे गिरता जाता है।
इसी का परिणाम है कि आज जल का संकट गहरा गया है। ऐसे में अगर जल के बेतहाशा इस्तेमाल और इसकी बर्बादी को रोका नहीं गया, तो वह दिन दूर नहीं जब मानव जल की एक-एक बूंद को तरसेगा। भारत में विश्व की सोलह प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। भारत में जल संसाधन विश्व के जल संसाधन का महज चार प्रतिशत है। इसलिए इसके इस्तेमाल के तौर-तरीकों को बदलना जरूरी है, ताकि देश के नागरिकों को पीने के पानी के लिए मोहताज नहीं रहना पड़े। नए-नए तकनीकी विकास के मद्देजनर बढ़ते उद्योगों ने स्वच्छ जल की मांग बढ़ा दी है। उद्योगों में जल की खपत का अभी तक सही-सही आकलन नहीं हुआ है, लेकिन केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के मुताबिक भारत में औद्योगिक इकाइयां उपलब्ध जल का छह फीसद भाग उपयोग करती हैं, जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार यह आंकड़ा आठ फीसद है। विश्व बैंक के अनुसार भारत के औद्योगिक क्षेत्र में तेरह प्रतिशत जल प्रयोग में लाया जाता है। बहरहाल, आंकड़े इसके पार भी जा सकते हैं, क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र में प्रतिवर्ष जल की मांग 5.3 फीसद की दर से बढ़ने का एक अनुमान है।
बहरहाल, जल संसाधन आयोग की चिंताओं को तभी गंभीरता से लिया जाएगा, जब सरकार देश की औद्योगिक इकाइयों के लिए भी पानी खर्च करने की पद्धति तय कर दे। अगर इसी तरह धरती के पानी का दोहन औद्योगिक इकाइयां करती रहीं, तो वह दिन दूर नहीं, जब किसानों को खेती के लिए पानी नहीं मिलेगा और पीने के लिए पानी की स्थिति भी त्राहिमाम सी हो जाएगी और तब देश का एक बड़ा हिस्सा आयातीत बोतलबंद पानी पीने को मजबूर हो जाएगा। इसके लिए डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की नदियों को जोड़ने की योजना पर भी काम करने की जरूरत है, ताकि बाढ़ की स्थिति को रोका जा सके और सूखा की मार से भी किसानों और देशवासियों को बचाया जा सके। नदियां पानी मुहैया कराने का बेहतरीन स्रोत हैं, लेकिन नदियों को लेकर सरकार की सोच निर्मल नहीं है। आज करोड़ों रुपए की बर्बादी के बावजूद न गंगा साफ हो सकी है, न यमुना। फिर भी इतना तय है कि अगर सरकार औद्योगिक इकाइयों पर पानी की बर्बादी रोकने का कड़ा नियम लागू नहीं करती है, तो भारत के कोने-कोने में पानी की कमी का रोना रोया जाना आम हो सकता है। भारत एक कृषि प्रधान देश है। खेतों की सिंचाई के लिए पानी का स्रोत तलाशना एक गंभीर समस्या बन कर सामने खड़ी हो जाएगी। तब सिर्फ फसलें नहीं प्रभावित होंगी, बल्कि देश की मंडियां भी प्रभावित होंगी। नतीजतन इसका सीधा असर आम जन-जीवन पर पड़ेगा। तब न लोग केवल पानी को तरसेंगे, बल्कि अन्न के लिए देश को किसी दूसरे देश पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसलिए सरकार और स्वयं उद्योग जगत को इस स्थिति का आकलन करते हुए अपने औद्योगिक व्यवहार में पानी को लेकर एक नैतिक रेखा खींचनी होगी और उसी के दायरे में अपनी औद्योगिक इकाइयां भी संचालित करनी होंगी। ऐसा संभव हुआ तो देश इस गंभीर संकट से उबरने में बहुत हद तक सफल हो सकता है।
पानी का कारोबार: पानी की कमी की समस्या अंतत: पानी के कारोबार को जन्म देती है। उद्योगों के लिए अनुसंधान करने वाली निजी संस्था वैल्यूनोट्स की रिपोर्ट ‘होम वाटर प्यूरीफायर इंडस्ट्री 2014-19’ के मुताबिक पानी साफ करने की मशीनों के कारोबार में बाईस फीसद की वृद्धि दर्ज हुई है। 2014 में होम वाटर प्यूरीफायर उद्योग 3,400 करोड़ रुपए का था और 2019 तक यह नौ हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर जाएगा। औद्योगिक संस्था एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में देश में बोतलबंद पानी का कारोबार सात हजार करोड़ रुपए का था, जिसके 2019 तक अठारह हजार करोड़ रुपए के होने का अनुमान है। यानी पानी के कारोबार का दूसरा हिस्सा है बोतलबंद पानी। इस बाजार में बिसलेरी, पेप्सीको, कोका कोला, धारीवाल और पारले की हिस्सेदारी सड़सठ फीसद है। ब्रांडेड बोतलबंद पानी के अलावा बड़े पैमाने पर पानी की बोतलों की घरेलू आपूर्ति और पानी पाउच का कारोबार भी चल रहा है। पिछले दो दशक की तुलना में 2005-2015 में पानी से जुड़ी योजनाओं पर सरकारी निवेश नौ गुना बढ़ाया गया है, बावजूद इसके शहर प्यासे हैं।
पानी का धर्म: वास्तव में जल ही जीवन है। जल की चाहत और उसकी कीमत जेठ की दुपहरी में तपता-प्यासा इंसान ही बता सकता है। शायद इसलिए परमात्मा ने दुनिया में पानी को प्रमुखता प्रदान की। पृथ्वी का इकहत्तर फीसद भाग जल से घिरा है। मनुष्य के शरीर के साठ प्रतिशत भाग में पानी होता है। वहीं कुछ पौधों में भी नब्बे फीसद तक पानी होता है। पानी को प्रकृति ने ऐसे गुणों से नवाजा है, जो किसी भी दूसरे तरल पदार्थ में नहीं है। विज्ञान कहता है कि कोई भी तरल पदार्थ ठंड बढ़ने के साथ सिकुड़ता है, जबकि पानी चार डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होने तक सिकुड़ता है और उससे कम तापमान पर फिर फैलने लगता है। हम ठंडे मुल्कों के तालाब की दशा पर जरा गौर करें तो पता चलता है कि जाड़े में जब तालाब का पानी बर्फ में बदल जाता है, तो वह हल्का होकर पूरे तालाब को ढक लेता है और नीचे के साफ पानी में मछलियां तैरती रहती हैं। पानी का एक और गुण है कि उसे किसी बरतन में लाखों वर्षों तक भी रखा जाए, तो उसमें कोई तब्दीली नहीं होती है। पानी में तब्दीली तब होती है, जब उसमें दूसरी वस्तु का मिश्रण होता है। मगर जैसे ही हम उस मिश्रण को अलग कर देते हैं तो पानी अपने वास्तविक रूप में आ जाता है। यही कारण है कि सभी धर्मों ने पानी की अहमियत को स्वीकार किया है। सभी मजहबों ने इसे शुद्धिकारक माना है। पानी की जरूरत सदा से सर्वोपरि रही है। यही वजह है कि इसकी आवश्यकता को पूरा करने के लिए हमें उसके पास खुद चल कर जाना पड़ता है। मानव को जीवित रहने के लिए जैसे वायु आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार शरीर के पोषण के लिए जल। जल की कमी मनुष्य को मृत्यु के कगार तक पहुंचा देती है। यही वजह है कि आदिमानव ने जल के स्रोत की तलाश की और उसने जल के करीब बसना शुरू कर दिया। नतीजतन नदी पर आधारित सभ्यता विकसित हुई।
जल का औषधि के रूप में प्रयोग होता रहा है। पवित्र जल के प्रभाव से कोई भी व्यक्ति बीमारी से मुक्त हो सकता है और यहां तक कि वह मृत्युशैय्या से भी उठ खड़ा हो सकता है। आकाशीय ग्रह जैसे सूर्य, चंद्र और तारे आदि दिन-ब-दिन, साल पर साल, हमेशा नए दिखाई देते हैं। नतीजतन, इससे वह पौराणिक कथा जीवंत हो उठती है जिसमें कहा गया है कि ब्रह्मांड में कहीं न कहीं अमृत मौजूद है, जो जीवन को अमरत्व दे सकता है। पानी की उपयोगिता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। इसकी महत्ता के कारण ही हिमालय क्षेत्र में गंगा के स्रोत की आखिरकार खोज हुई। कहा जाता है कि दैवीय शक्ति के रूप में गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। गंगा का स्वर्ग में आकाशगंगा से संबंध माना गया है। पुण्य स्नान और अभिषेक जल की उपयोगिता को स्पष्ट कर देता है। पवित्रीकरण के लिए पवित्र जल में डुबकी लगाने के संस्कार का प्रचलन हुआ। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बार-बार डुबकी लगाने से ज्यादा शुद्धीकरण होता है। सात नदियों के पवित्र जल की अवधारणा इसी कड़ी का हिस्सा है। हिंदू धर्म की सनातन परंपरा के मुताबिक देश भर की हर दिशा में स्थित सात नदियों के जल को बेहद पवित्र माना जाता है। इन पवित्र नदियों में गंगा, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र और यमुना के नाम शामिल हैं। इतना ही नहीं इन सात पवित्र नदियों के जल से धार्मिक विधान के लिए प्रयुक्त होने वाले पात्र के द्वारा देवताओं की मूर्तियों का जलाभिषेक किए जाने की धार्मिक परंपरा भी है। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक इस पवित्र जल को पीने से मनुष्य के भीतर भगवत्ता के अनुभव की शक्ति प्राप्त होती है। यही वजह है कि आदिकाल से ही इन नदियों का जल एकत्रित कर धार्मिक विधि-विधान में प्रयोग किया जाता रहा है।
चिंतित है केंद्र सरकार: देश में पानी को लेकर चिंताएं गहराने लगी हैं। वजह साफ है कि अब बांधों का जलस्तर बड़ी तेजी से गिरता जा रहा है। बांधों के गिरते जलस्तर को लेकर सरकार और संबंधित एजेंसियों के भी कान खड़े हो गए हैं। नतीजतन केंद्र ने देश के लगभग आधा दर्जन प्रभावित राज्यों को परामर्श जारी किया है। दरअसल, 1972 में केंद्रीय जल आयोग ने किसी क्षेत्र विशेष में सूखा पड़ने के कुछ मानक तैयार किए हैं। इन मानकों के मुताबिक सूखे का पहला लक्षण यह है कि जब वर्षा वार्षिक वर्षा के मान से सामान्य से पचहत्तर फीसद से कम हो। इसका दूसरा मानक है कि ऐसी स्थिति आ जाए, जिसमें तीस फीसद से कम कृषि क्षेत्र को ही सिंचित किया जा सके। इसी मानक के मद्देनजर केंद्र सरकार ने तमिलनाडु को अपनी सलाह में कहा है कि राज्य और राज्य सरकार पानी का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करें। 18 मई, 2019 को केंद्र सरकार की ओर से जारी परामर्श में साफ कहा गया है कि वे पानी का प्रयोग केवल पीने के लिए ही करें। यह सलाह तब तक प्रभावी रहेगी जब तक बांधों में पुनर्भरण नहीं होता है। केंद्र ने तमिलनाडु समेत महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश को भी पानी को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है। केंद्रीय जल आयोग देश के इक्यानबे मुख्य जलाशयों में पानी की मौजूदगी और उसके भंडारण की निगरानी करता है। आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार इनमें पानी का कुल भंडारण घट कर 35.99 अरब घन मीटर रह गया है। यह उपलब्धता इन इक्यानबे मुख्य जलाशयों की कुल क्षमता का महज बाईस फीसद है। इन जलाशयों की कुल क्षमता 161.993 अरब घन मीटर है। इस तरह से देखा जाए तो इन जलाशयों में पानी लगभग 126.03 अरब घन मीटर कम हो गया है, मतलब कुल पानी का अठहत्तर फीसद कम हो गया है। इससे साफ संकेत है कि देश के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सों में पानी का संकट गहराने लगा है। हालांकि महाराष्ट्र में सत्रह जलाशय हैं, जबकि गुजरात में दस जलाशय हैं। इनकी कुल क्षमता 31.26 अरब घन मीटर है। गौरतलब है कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल यानी 3.29 करोड़ हेक्टेयर का लगभग छठवां भाग सूखा प्रभावित है। मगर पानी की प्रचुर उपलब्धता के बावजूद इसे सिंचित करना चुनौती बना हुआ है।
