ठंडा-ठंडा, कूल-कूल नारे के साथ बिकने वाले एक तेल का विज्ञापन करने वाले अमिताभ बच्चन को भी 2017 में जिला उपभोक्ता फोरम ने नोटिस दिया था। उन पर विज्ञापन के माध्यम से भ्रमित करने का आरोप लगा था और शिकायत में कहा गया था कि विज्ञापन में तेल में प्रयोग की जाने वाली जड़ी-बूटियों के नाम और मात्रा नहीं बताई गई। वहीं शाहरुख खान को भी एक शेविंग क्रीम के विज्ञापन के सिलसिले में नोटिस जारी किया गया था। कुछ समय पहले एक नामी बिल्डर के पास अपना घर बुक कराने वाले सैकड़ों लोगों ने पूर्व क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी पर भी भ्रामक प्रचार के आरोप लगाए और कहा गया कि उनके झांसे में आकर ही लोगों ने बिल्डर की योजना में अपना रुपया लगाया। महेंद्र सिंह धोनी उस समय उस कंपनी के ब्रांड एंबेसडर थे।
इसी तरह 2015 में जब माधुरी दीक्षित ब्रांड एंबेसडर थीं और जांच में मैगी में मोनोसोडियम ग्लूटेमैट और लेड यानी सीसे की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई थी। तब उनको उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग की ओर से नोटिस दिया गया था। नोटिस के जवाब में माधुरी ने लिखा था कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में न तो कभी मैगी खाई है और न ही कभी किसी को बना कर खिलाई है।
इससे स्पष्ट है कि अधिकतर विज्ञापन करने वाली हस्तियां किसी भी विज्ञापन को बिना उसकी गुणवत्ता परखे या उसकी खाामियों, खूबियों को जाने ही उसके लिए प्रचार, विज्ञापन करती हैं। वहीं कंपनियां भी अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए फिल्मों और खेल जगत की मशहूर हस्तियों का सहारा लेती हैं। विज्ञापनों में किसी उत्पाद को लेकर ऐसे दावे किए जाते हैं कि लोग उसका इस्तेमाल करने को आतुर हो जाते हैं।
क्या कहते हैं कलाकार
हाल में अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने स्लिम पिल्स के दस करोड़ के विज्ञापन को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि मुझे उत्पाद के परिणाम पर भरोसा नहीं है। यह एक अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है, लेकिन भ्रामक विज्ञापनों के लिए नामचीन हस्तियों को जिम्मेदार मानने में कई दिक्कतें हैं। कोई उपभोक्ता या अन्य अत्यंत व्यस्त फिल्मी सितारों से यह आशा कैसे कर सकता है कि उन्होंने जिस उत्पाद का विज्ञापन किया है उस उत्पाद की गुणवत्ता की वे पहले लैब में जाकर जांच करवाएंगे, तभी विज्ञापन करेंगे। हालांकि सामाजिक दायित्व के तौर पर यह प्रश्न जरूर उठाया जा सकता है कि जिन विज्ञापनों या उसमें दिखाए गए उत्पाद से सीधे समाज और उसके नागरिक प्रभावित होते हों, कम से कम उनको लेकर तो सेलिब्रिटी को गंभीरता दिखानी ही चाहिए।
हालांकि ऐसे बहुत से सितारे हैं जो अपने किए जा रहे विज्ञापनों को लेकर सतर्कता बरतते हैं। कभी मैगी नूडल्स और तेल के भ्रामक विज्ञापनों को लेकर विवादों में रहे अमिताभ बच्चन ने स्पष्ट कहा कि वह किसी उत्पाद का विज्ञापन करते समय या किसी कंपनी का प्रचार करने में अतिरिक्त सतर्कता बरतते हैं और उन्होंने खुद के बचाव के लिए अपने अनुबंध में विशेष प्रावधान जुड़वा रखा है, क्योंकि जब भी कुछ खाने का सामान होता है, तो मैं उसे देखने का प्रयास करता हूं, क्योंकि अगर आप सेलिब्रिटी हैं तो आपको विवादों में घसीटा जाता है। शेविंग क्रीम के विज्ञापन के लिए विवादों में रहने वाले शाहरुख खान का भी कहना है कि किसी भी उत्पाद या ब्रांड का विज्ञापन करने वाले सितारे को विज्ञापन करने से पहले कंपनी के वादों की ठीक से पड़ताल करवा लेनी चाहिए।
कुछ खामियां भी हैं
एक आकलन के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर करीब 20,304 मुकदमे लंबित हैं। हालांकि आयोगों में लंबित मामलों पर उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा भी कि वे इन खामियों को दूर करने के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन देश के 596 में से 118 जिलों के उपभोक्ता फोरम, जो अब आयोग कहे जाएंगे, में अध्यक्ष ही नहीं हैं और सदस्यों के भी 362 पद लंबे समय से खाली हैं। ऐसे में जहां बड़ी संख्या में उपभोक्ता शिकायतों के मामले लंबित हैं और अपने निपटारे की राह देख रहे हैं, वहीं कुछ अहम पद भी खाली पड़े हैं। ऐसी स्थिति में सिर्फ कानून बना देने से ही उपभोक्ताओं की दिक्कतों का निपटारा संभव नहीं, जब तक कि इसे मजबूती प्रदान नहीं की जाती।

