संजय ठाकुर
भारत में लगभग बारह करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें गुजर-बसर के लिए अपने बचपन को भूल मजदूरी की चक्की में पिसना पड़ता है। जिस बच्चे को किसी पाठशाला में होना चाहिए, वह दो वक्त की रोटी के लिए मारा-मारा फिर रहा है। वैसे, उसकी इस दशा के लिए काफी हद तक देश की तेजी से बढ़ती जनसंख्या जिम्मेदार है, लेकिन सारा दोष अकेले जनसंख्या का नहीं है। बहुत कुछ सरकार और प्रशासन की उदासीनता और लापरवाहियों से बिगड़ा है। सुधार की ज्यादातर प्रक्रियाएं नीति-निर्माण और कार्य-निर्धारण तक सिमट कर रह जाती हैं। उनका व्यावहारिक रूप एक दिवास्वप्न साबित होता है। ऐसे में समस्या दूर होने के बजाय उसका विस्तार जरूर हो जाता है। ऐसा ही कुछ बाल मजदूरी जैसी गंभीर समस्या के साथ भी हुआ है। इस समस्या को लेकर बरती गई लापरवाहियों से यह समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है।
यूनिसेफ के मुताबिक सबसे ज्यादा बाल मजदूर भारत में हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार विश्व के विकासशील देशों में पांच से चौदह वर्ष की आयु के बीच कुल पच्चीस करोड़ बाल मजदूर हैं, जिनमें कम से कम बारह करोड़ पूर्णकालिक आधार पर काम कर रहे हैं। ये बच्चे कृषि, व्यापार और सेवाओं, हस्त-शिल्प, निर्माण-कार्यों और घरेलू कामों में लगे हैं। बाल मजदूरों की एक बड़ी संख्या ऐसे कामों में लगी है, जो इनके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक पहलू को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। इनमें से 12.6 करोड़ बाल मजदूर खतरनाक कामों में लगे हैं, जबकि 50.7 लाख जबरन मजदूरी या बंधुआ मजदूरी, 10.8 लाख वेश्यावृत्ति और 10.2 लाख बच्चे देह-व्यापार के शिकार हैं। बाल मजदूरों की सबसे ज्यादा संख्या एशिया में है, जहां इकसठ प्रतिशत बाल मजदूर हैं। इसके बाद अफ्रीका में बत्तीस प्रतिशत और लातिनी अमेरिका में सात प्रतिशत बाल मजदूर हैं।
भारत में जनगणना के मुताबिक चौदह वर्ष से कम आयु के कुल एक करोड़ छब्बीस लाख छियासठ हजार तीन सौ सतहत्तर बाल मजदूर हैं, जिनमें से पचासी प्रतिशत से ज्यादा देश के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि संबंधी गतिविधियों जैसे पशु-पालन, वन-संवर्द्धन और मछली-पालन जैसे कार्यों में लगे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बाल मजदूरों की यह संख्या वास्तविक संख्या से बहुत कम है। विभिन्न स्तरों पर गैर-सरकारी संगठनों द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार बाल मजदूरों का आंकड़ा बहुत ज्यादा है। भारत में बाल मजदूरी को नौ श्रेणियों में बांटा गया था। इनमें जुताई, कृषि, पशुपालन, वन संवर्द्धन, मछली पालन, वृक्षारोपण, उत्पादन, संसाधन, सेवा और मरम्मत, निर्माण, व्यापार और वाणिज्य, यातायात, संग्रहण, संचार और अन्य सेवाएं आती हैं। बच्चों को ज्यादातर ऐसे काम में लगाया गया है, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालते और सुरक्षा की दृष्टि से भी खतरनाक हैं। निजामाबाद और उत्तर आरकोट जिलों के बीड़ी उद्योग, जयपुर और मुरादाबाद के कृत्रिम रत्न उद्योग, वाराणसी और कांचीपुरम के रेशम तथा रेशम-उत्पाद उद्योग और आगरा, कानपुर, दुर्ग और राजस्थान के चमड़ा उद्योग में सिसकियां भरते बचपन को देखा जा सकता है। इन सिसकियों की तरफ न तो किसी का ध्यान जाता है और न ही ये सिसकियां कारखानों की दीवारों के बाहर जा पाती हैं। इनके अलावा मीरजापुर, भदोही, वाराणसी और जम्मू-कश्मीर के चटाई-बुनाई उद्योग, शिवकाशी के माचिस, पटाखा और विस्फोटक उद्योग, फिरोजाबाद के कांच और चूड़ी उद्योग, मुरादाबाद के पीतल के बर्तन-निर्माण उद्योग, तिरुपुर के निर्यात आधारित वस्त्र उद्योग, मोरक्कापुर के पत्थर की खदानों और निर्माण इकाइयों से संबंधित उद्योग और सूरत के हीरा उद्योग में भी बचपन की चीत्कार सुनी जा सकती है।
भारत के कृषि उद्योग में बहुत बड़े पैमाने पर बच्चों का मजदूरी के लिए शोषण हो रहा है। देश के ग्रामीण क्षेत्र बच्चों के इस शोषण की जीती-जागती तस्वीर पेश करते हैं। इसके अलावा बच्चों के शोषण का नंगा नाच देश के सरकस उद्योग में भी देखा जा सकता है। चालीस प्रमुख सरकस देश भर में चलते हैं। गरीबी और सामाजिक असुरक्षा ने मिल कर बंधुआ बाल मजदूरी जैसी गंभीर समस्या को पैदा किया है। ऐसी अवस्था में बच्चों को ऐसे कर्ज की अदायगी के लिए बंधुआ मजदूर के रूप में काम करना पड़ता है जो उन्होंने नहीं, बल्कि उनके मां-बाप या दूसरे किसी संबंधी या अभिभावक ने लिया होता है। इस तरह बच्चे ऐसे कर्ज को चुकाने की प्रक्रिया में लग जाते हैं और कभी चुका नहीं पाते, क्योंकि उसकी ब्याज दरें बहुत ऊंची होती हैं और उनके काम के बदले बहुत कम पारिश्रमिक दिया जाता है। इनमें से बहुत-से बच्चों को पांच सौ से दो हजार रुपए तक के छोटे-से कर्ज के लिए बंधुआ मजदूर बना कर रखा गया है। भारत में लगभग डेढ़ से दो करोड़ बच्चे बंधुआ मजदूर के रूप में काम कर रहे हैं। ये बच्चे बीड़ी उद्योग, चांदी उद्योग, कृत्रिम रत्न उद्योग, कृषि उद्योग, हस्त निर्मित ऊनी चटाई उद्योग जैसे सभी उद्योगों में बंधुआ मजदूरी कर रहे हैं। इन उद्योगों के अलावा बच्चों को तथाकथित सेक्स ‘उद्योग’ में भी बंधुआ मजदूरी करते देखा गया है।
देश का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं है जहां चौदह साल से कम उम्र के बच्चे फटेहाल सड़कों के किनारे मूंगफलियां-चने बेचते, ढाबों में बर्तन मांजते या मेजें रगड़ते, कूड़े के ढेर में चीजें बीनते, या फिर सड़कों पर भीख मांगते नजर न आते हों। ढाबा मालिकों की मार तो जैसे वे अपनी किस्मत में लिखवा कर लाए हों।
देश में बच्चों की एक बड़ी संख्या भीख के कटोरों तक सिमटी हुई है। इसमें कई गिरोह भी लगे हुए हैं। लोगों की सहानुभूति बटोरने के लिए गिरोह के लोग अक्सर बच्चों के अंग भंग कर देते हैं। एक बड़ी संख्या उन बच्चों की भी है जो कूड़े के ढेरों में खोए नजर आते हैं। ये बच्चे सुबह-सवेरे ही बोरियां उठाए निकल पड़ते हैं। कबाड़ियों के पास काम कर रहे इन बच्चों का खेल कूड़े में चीजें बीनना है। बाल मजदूरी और बंधुआ बाल मजदूरी से कई मोर्चों पर लड़ने की जरूरत है। इस दिशा में ‘मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा’ को प्रभावी ढंग से लागू करने से उत्साहवर्द्धक परिणाम निकल सकते हैं, क्योंकि निरक्षरता और बाल मजदूरी का चोली दामन का साथ है। कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के साथ-साथ बाल मजदूरों और बंधुआ बाल मजदूरों के लिए ऐसी जगह सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है, जहां वे मुक्त कराए जाने के बाद जा सकें। बच्चों के मां-बाप के सामने ऐसे विकल्प होने चाहिए कि उन्हें बच्चों को मजदूरी के लिए न भेजना पड़े। ऋण अनुबंधों या बंधुआ बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, व्यावहारिक शिक्षा और ग्रामीण विकास जैसे कारण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस दिशा में भारत सरकार और गैर-सरकारी संगठन मिलकर काम कर सकते हैं। साथ ही इन कार्यक्रमों से लोगों को भी जोड़ना होगा। ऐसे सामूहिक प्रयास निश्चित ही बाल मजदूरी और बंधुआ बाल मजदूरी को समाप्त करने में बड़ा योगदान दे सकते हैं।
