साहित्यकार समाज को आईना दिखाता है। वह उसकी अंतश्चेतना का संरक्षक है। यही कारण है कि राजसत्ता के साथ उसका अक्सर छत्तीस का आंकड़ा बनता है, क्योंकि सत्ताएं स्वभावत: निरंकुश होती हैं और उन्हें सवालों का सामना करने की आदत नहीं होती, जबकि साहित्यकार का काम ही अपने-आप से और समाज से सवाल करना है। शायद यह अकारण नहीं कि भक्ति आंदोलन के बाद से अब तक राज्याश्रय में कोई बड़ा साहित्यकार नहीं पनपा। ‘मीर’ ने तो अपने समय के अमीर-उमरा पर बहुत कड़वी जुबान में कटाक्ष किए। दरबार की घुटन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिंदगी भर दरबार में नियुक्ति पाने के अभिलाषी गालिब जब अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के उस्ताद का ओहदा पा गए, तो खुश होने के बजाय उन्होंने अपने-आप पर व्यंग्य करते हुए कहा: ‘‘गालिब’ वजीफाख्वार हो, दो शाह को दुआ/ वो दिन गए कि कहते थे नौकर नहीं हूं मैं।’’
यों भी पिछली डेढ़ सदी के दौरान हमारे देश के साहित्यकार का मिजाज राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव में निर्मित हुआ है। बीसवीं सदी के सभी साहित्यकार, चाहे वे किसी भी भारतीय भाषा में लिख रहे हों, ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के विरोध में खड़े थे। जलियांवाला बाग में हुए जनसंहार के खिलाफ रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘सर’ की उपाधि लौटा दी, तो आजादी के बाद 1975 में इमरजेंसी लगने पर फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने पद्मश्री का अलंकरण वापस कर दिया। इन दोनों घटनाओं का ऐतिहासिक महत्त्व था। सम्मान वापस करके इन दो बड़े रचनाकारों ने सत्ता के खिलाफ अपना प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराया था।
आज फिर देश एक गंभीर संकट से दो-चार हो रहा है। इसकी पदचाप यूआर अनंतमूर्ति जैसे महान साहित्यकार ने सुन ली थी और देश की जनता को इसके प्रति आगाह भी किया था। इसके लिए मृत्यु से ठीक पहले साहित्य अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित इस अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वयोवृद्ध लेखक को क्या-क्या नहीं सुनना और झेलना पड़ा था। लेकिन मानापमान की परवाह किए बिना उन्होंने आसन्न राजनीतिक-सांस्कृतिक संकट के विरुद्ध अपनी निर्भीक आवाज उठाई। यों तो यह प्रक्रिया काफी पहले शुरू हो चुकी थी और इसे आगे बढ़ाने में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी समेत अनेक दलों ने भूमिका निभाई है, लेकिन पिछले वर्ष मई में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से इसमें जैसी तेजी आई है, वह हैरतअंगेज है।
पहले और अब में फर्क इतना है कि जहां पहले समाज में असहिष्णुता, सांप्रदायिक नफरत और विद्वेष फैलाने वालों के प्रति सरकार उदासीन थी, वहीं अब ये सब काम सरकारी सहमति से किए जा रहे हैं और सत्तारूढ़ दल के केंद्रीय मंत्री, सांसद और विधायक भी इस अभियान में खुल कर हिस्सा ले रहे हैं। भारत के बहुरंगी, बहुधर्मी, बहुभाषी और बहुसंस्कृति वाले समाज को एक ही रंग वाले इकहरे समाज में बदलने की सुनियोजित कोशिश की जा रही है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र में बदलने की हड़बड़ी है।
लगातार भिन्न मत रखने वालों की हत्याएं हो रही हैं। लेकिन कन्नड के बुजुर्ग विवेकवादी विद्वान और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से अलंकृत एमएम कलबुर्गी की हत्या ने जैसे सबको हिला कर रख दिया। विरोधस्वरूप कर्नाटक राज्य साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत छह कन्नड़ लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस करने की घोषणा की है। पिछले माह प्रसिद्ध हिंदी कथाकार उदय प्रकाश ने कलबुर्गी की हत्या और उसके प्रति साहित्य अकादेमी की उदासीनता के प्रति विरोध प्रकट करते हुए अकादेमी पुरस्कार लौटने की घोषणा की थी।
इसके बाद दादरी कांड हो गया, जिसमें सिर्फ संदेह के आधार पर एक असहाय मुसलिम परिवार पर प्राणघातक हमला करके उसके मुखिया अखलाक को मार दिया गया और उसके बेटे को इतना पीटा गया कि वह अस्पताल के आइसीयू में पहुंच गया। हर बात पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समूचे घटनाक्रम पर मौन साधे रहे। लेकिन उनके मंत्री, सांसद और विधायक सांप्रदायिक दुष्प्रचार में लगे रहे। अब अंगरेजी की जानी-मानी उपन्यासकार नयनतारा सहगल और शशि देशपांडे, हिंदी के प्रसिद्ध कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी और मलयालम उपन्यासकार सारा जोसेफ ने भी अकादेमी पुरस्कार वापस करने की घोषणा की है।
शशि देशपांडे और मलयालम के प्रख्यात कवि-आलोचक के. सच्चिदानंदन ने तो साहित्य अकादेमी के सभी पदों से भी इस्तीफा देकर समूचे माहौल पर अपना विरोध दर्ज कराया है। महाराष्ट्र में राज्य साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत उपन्यासकार रहमान अब्बास ने भी अपना पुरस्कार लौटाने की घोषणा की है। इसके बाद दादरी कांड हो गया, जिसमें सिर्फ संदेह के आधार पर एक असहाय मुसलिम परिवार पर प्राणघातक हमला करके उसके मुखिया अखलाक को मार दिया गया और उसके बेटे को इतना पीटा गया कि वह अस्पताल के आइसीयू में पहुंच गया। हर बात पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समूचे घटनाक्रम पर मौन साधे रहे। लेकिन उनके मंत्री, सांसद और विधायक सांप्रदायिक दुष्प्रचार में लगे रहे। अब अंगरेजी की जानी-मानी उपन्यासकार नयनतारा सहगल और हिंदी के प्रसिद्ध कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने भी साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटा कर समूचे माहौल पर अपना विरोध दर्ज कराया है। महाराष्ट्र में राज्य साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत उपन्यासकार रहमान अब्बास ने भी अपना पुरस्कार लौटाने की घोषणा की है।
यह विरोध केवल दादरी की घटना पर या सिर्फ कलबुर्गी की हत्या पर नहीं, बल्कि असहिष्णुता, हिंसा और सांप्रदायिकता के लगातार बढ़ते जा रहे प्रभाव के खिलाफ है। लेकिन इस कदम का समर्थन करने के बजाय खुद लेखक ही टीका-टिप्पणी कर रहे हैं। जो समर्थन भी कर रहे हैं, वे अगले ही वाक्य में मीन-मेख निकालने लग जाते हैं। इस आलोचना का लुब्बोलुआब यह है कि विरोध प्रदर्शन करके भी ये लेखक फायदे में ही हैं। हिंदी की जाने-मानी लेखिका मृदुला गर्ग हिसाब लगा रही हैं कि क्या नयनतारा सहगल पुरस्कार की राशि ब्याज सहित लौटाएंगी? सोशल मीडिया पर मोदी समर्थकों का समुदाय भी ठीक यही सवाल उठा रहा है कि बारह प्रतिशत के चक्रवृद्धि ब्याज के साथ पुरस्कार राशि लौटाई जाए।
पिछले माह उदय प्रकाश ने घोषणा की थी कि वे पुरस्कार की राशि लौटाएंगे, लेकिन स्वयं साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि पुरस्कार या पुरस्कार राशि वापस लेने का कोई प्रावधान नहीं है और अकादेमी उसे स्वीकार नहीं कर सकती। आश्चर्य है कि लोग पुरस्कार लौटने के प्रतीकात्मक महत्त्व को समझने के बजाय पैसों के गुणा-भाग में लगे हैं।
असगर वजाहत हिंदी के समादृत और ऊंचे पाए के रचनाकार हैं। इसके साथ ही वे बेहद संजीदा इंसान और पैनी नजर रखने वाले बौद्धिक भी हैं। वे वर्तमान माहौल के खिलाफ हैं और लेखकों द्वारा उठाए गए मुद्दों का समर्थन भी करते हैं। लेकिन इस समय वे भी इस प्रकार के सवाल उठा रहे हैं: ‘‘यह कहा जा रहा है कि साहित्य अकादेमी ने लेखकों की हत्या और मौलिक अधिकारों के हनन पर कोई बयान नहीं दिया। क्या इससे पहले साहित्य अकादेमी या अन्य दूसरी अकादेमियों ने ऐसे बयान दिए हैं? अगर नहीं तो आज उनसे यह आशा क्यों की जा रही है?’’ उनका यह भी कहना है कि ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, मानो जो साहित्यकार अकादेमी पुरस्कार नहीं लौटा रहे, वे मोदी सरकार के समर्थक या मौन समर्थक हैं। उनका यह सवाल भी है कि साहित्य अकादेमी एक स्वायत्तशासी संस्था है और पुरस्कार लेखकों का एक पैनल देता है, सरकार या अकादेमी नहीं, और पुरस्कार लौटने को विरोध प्रदर्शन का मानक न बना दिया जाए।
साहित्य अकादेमी ने बयान जारी किए हों या न किए हों, किसी सम्मानित लेखक की मृत्यु पर शोकसभा अवश्य आयोजित की है। अन्य अकादेमियां भी अपने-अपने क्षेत्र की विभूतियों की मृत्यु पर ऐसा करती रही हैं। लेकिन कलबुर्गी के लिए साहित्य अकादेमी ने एक शोकसभा आयोजित करने या परिवार के पास शोक संदेश भेजने की भी जरूरत नहीं समझी। यह हाल उसकी स्वायत्तता का है। लेखकों का पैनल पुरस्कार देता है, अकादेमी नहीं, यह तर्क समझ में आने लायक नहीं है, क्योंकि अकादेमी लेखकों से मिल कर ही बनी है।
जहां तक पुरस्कार लौटाने का सवाल है, यह किसी के लिए भी बाध्यता नहीं है। हर व्यक्ति को अधिकार है कि वह तय करे कि उसे किस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन करना है या समर्थन करना है। और अगर करना है तो किस तरीके से। कोई एक तरीका सबके लिए अनिवार्य नहीं हो सकता। अगर ऐसा माहौल बनता है, जिसमें उन साहित्यकारों को धिक्कारा जाए, जो अकादेमी पुरस्कार वापस नहीं कर रहे, तो यह भी असहिष्णुता का माहौल ही होगा। और, इस माहौल का भी विरोध करना पड़ेगा।
कुलदीप कुमार