नेता इस कला के महारथी हैं। वे एक घंटा बोलें या कि पांच मिनट, चैनलों के लिए एक-दो लाइनें ही काम की होती हैं। इसी वजह से चैनलों की बहसों में छीना-झपटी मची रहती है। …लेकिन उस असहिष्णुता का क्या इलाज है, जो जब तब मुंह से बरबस निकल पड़ती है! …कहीं असहिष्णुता स्वभाव तो नहीं बनती जा रही?
बाइट टू बाइट फाइट है। किसकी बाइट किसकी फाइट पर भारी पड़ती है, किसकी गिरती है, आज की राजनीति इसी से तय होती है। बाइटों की एक-दो लाइनों का आमना-सामना करवा कर दैनिक राजनीति का नित्य निपटारा होता है। नेता इस कला के महारथी हैं। वे एक घंटा बोलें या कि पांच मिनट, चैनलों के लिए एक-दो लाइनें ही काम की होती हैं। इसी वजह से चैनलों की बहसों में छीना-झपटी मची रहती है।
चार रोज पहले एबीपी द्वारा ‘साहित्यकार बरक्स सरकार’ पर आयोजित बहस में शायर मुनव्वर राणा ने अपने अकादेमी सम्मान को अचानक लौटाने की घोषणा कर स्टूडियो में ही सबको चकित कर दिया! उनका लौटाना चैनल के लिए सबसे बड़ी लाइव बाइट बनी। उसने उसको पूरे दिन बजाया। लेकिन इसके बाद मुनव्वर राणा को बाइट मारने का चस्का लग गया और आखिरकार अपने आपको उपहास का विषय बना उठे। साबित हुआ कि साहित्यकारों का विद्रोह उतना ठोस नहीं है जितना कि ऊपर से दिखता है।
सप्ताह की दूसरी बाइट नीतीश कुमार ने एनडीटीवी पर बरखा को दी। लंबी बातचीत में बात ज्यों ही रविशंकर प्रसाद पर आई तो नीतीश अपने रंग में आ गए। कहने लगे कि जानते हैं बिहार में रविशंकरजी को किस नाम से बुलाया जाता है। फिर खुद जवाब दिया कि उनको ‘ड्रॉप कॉल मंत्री’ के नाम से बुलाया जाता है और फिर पूछा कि ‘बीएसएनएल’ का मतलब क्या है? और बताया कि इसका मतलब होता है: ‘भाई साहब लगते ही नहीं!’ बरखा ने अपनी हंसी मुश्किल से रोकी! इस एक मस्त मजाक ने बिहार के चुनाव का नतीजा निकाल दिया!
जेटलीजी ने मोदीजी की प्रोक्सी की। मोदीजी के बोलने की जगह स्वयं बोले। लंबी बातचीत में वे ‘उत्पात’ की जगह ‘बात’ पर जोर देते दिखे, उत्पातियों को बरजते दिखे, लेकिन लंबी बातचीत में एक भी ऐसी मजेदार बाइट न बन सकी कि लगते आरोपों का सटीक जवाब बन जाती!
सबसे जोखिम-भरी बहस टाइम्स नाउ की रही, जिसका फोकस बिहार का चुनाव था। एक ओर जदयू के पवन वर्मा, दूसरी ओर भाजपा के सिद्धार्थनाथ सिंह तक और तथ्यों से बनी बातचीत पिछली उस बहस से बेहतर रही जिसमें भाजपा के प्रवक्ता राव अपनी जगह छोड़ कर उत्तेजित होकर पवन वर्मा के एकदम पास आकर बहस करने लगे!
साहित्यकारों को जितनी बाइटें पिछले सप्ताह नसीब हुर्इं उतनी कभी न हुर्इं। लेखक अपने आप खबर बने। उनको समय मिला। सबके दर्शन कराए गए। जिन लेखकों को चैनल कभी लिफ्ट नहीं देते थे उनको भी समय दिया गया। लेखक अचानक हीरो नजर आने लगे।
लेकिन विरोध की इस मुहिम में पहला छेद शशि थरूर ने यह कह कर किया कि स्टैंड ठीक है, लेकिन मेथड गलत है।
एनडीटीवी के टाउन हॉल में से बातचीत में विक्रम सेठ ने भी साहित्यकारों के विरोध से बनती उत्तेजना पर पानी डाला और कहा कि लेखकों की आपसी ‘तू तू मैं मैं’ में असल मुद्दा खो जाता है।
सबसे समझदार बाइटें राष्ट्रपति ने दो-दो बार बनार्इं और दोनों बार मीडिया ने उनको हाथोंहाथ लिया! पहली बाइट भारतीय सभ्यता की ‘अंतरंग बहुलता’ और ‘सहिष्णुता’ पर बनाई। दूसरी बाइट दुर्गा के महारूपक पर बनाई। जिस स्पीड से राष्ट्रपति की बाइटें खबर बन रही हंै उससे डर लगता है। हर रोज बोलने से बोलने की महिमा घट जाती है!
पंजाब और फरीदाबाद तेजी से खबर बनाने लगे हैं। पंजाब का बढ़ता सांप्रदायिक उन्माद और दंगाई हालात बहस के बडेÞ विषय न बन सके, लेकिन फरीदाबाद में दलित के घर को जला कर दो बच्चों को मार डालने की घटना ने ‘बढ़ती असहिष्णुता’ की चली आती बहसों को तेज कर दिया। नुकसान रोकने के लिए पहले राजनाथ आए, बाद में जेटलीजी आए। पहली बार भाजपा प्रवक्ताओं के आक्रामक रवैए पर कुछ लगाम लगी महसूस हुई।
जिस तरह की आक्रामक बातें भाजपा के प्रवक्ताओं से सुनी जाती रहीं उसी तरह का कटाक्ष एक पत्रकार के मुंह से निकला तो राहुल गुस्से से फट पडेÞ। एक पत्रकार के मुंह से इतना ही निकला था कि आप फरीदाबाद ‘फोटो-अप’ के लिए आए हैं? राहुल उसे लगभग फटकारते हुए बोले कि यहां लोग मर रहे हैं। और ये फोटो-अप क्या है?
यह बाइट बार-बार दिखाई गई, लेकिन दलित परिवार के दर्दनाक सीन में खो गई! पत्रकार को समझ आ गया होगा कि आप ऐसे अवसर पर राहुल से छेड़खानी नहीं कर सकते!
विजयदशमी की सुबह एबीपी, न्यूज चौबीस और जी न्यूज पर मोहन भागवतजी का संबोधन लाइव आता रहा। जी न्यूज ने इसे ‘भागवत वचन’ का शीर्षक दिया है। भागवतजी के श्रोताओं की ओर कैमरे कम जाते दिखे।
एबीपी पर लाइव कवरेज के अलावा तुरता बहस आयोजित थी, इसलिए भागवतजी के संबोधन की तुरता व्याख्या और बहस शुरू कर दी गई है। संघ के पक्ष को रखने वाले प्रवक्ता और शेष नारायण के बीच अच्छी बहस रही!
अमरावती के आंध्र की नई राजधानी बनने के अवसर पर शिलान्यास करने पहुंचे प्रधानमंत्रीजी को भी सबसे पहले एबीपी ने दिखाया, एक बाइट में वे एक बच्चे को अपना चश्मा पहनाते दिखते थे। यह सीन छोटा लेकिन अच्छा था। उसके बाद पूजा और शिलान्यास के सीन थे।
लेकिन उस असहिष्णुता का क्या इलाज है, जो जब तब मुंह से बरबस निकल पड़ती है: आदरणीय मंत्री वीके सिंह जी इसी तरह विवाद में फंसे। उन्होंने फरीदाबाद के ‘दलित दहन’ को ‘परिवारों का अंदरूनी मामला’ ज्यों ही बताया त्यों ही इंडिया टीवी ने उसे अपनी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनाया। जब उनको मालूम था कि जांच बैठ चुकी है तब क्यों कहने लगे कि यह ‘परिवार का अंदरूनी मामला’ है? जब कांग्रेस के मनीष तिवारी ने उनके इस तरह के कथन की आलोचना की तो उनकी रक्षा में एक नेता बोल उठे कि मंत्रीजी की बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।
कहीं असहिष्णुता स्वभाव तो नहीं बनती जा रही?
