प्रधानमंत्री अगर समझ गए हैं कि सबसे ज्यादा बदनामी व्यक्तिगत तौर पर उनकी हुई है तो चुप क्यों हैं? क्या देख नहीं रहे हैं कि उनकी चुप्पी का मतलब यही निकाला जा रहा है कि इस नफरत भरे हिंदुत्व-लहर को उनका समर्थन है? क्या वे देख नहीं रहे हैं कि जब भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री लोगों के खान-पान में दखल देते हैं तो ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ की धज्जियां उड़ाते हैं?
किसी प्रधानमंत्री के शासनकाल के पहले दो साल को हम पत्रकार ‘हनीमून पीरियड’ कहते हैं, इसलिए कि यह वह समय होता है, जब अच्छे कार्यों की संभावनाएं सबसे ज्यादा होती हैं। अक्सर नए प्रधानमंत्री की लोकप्रियता कम नहीं होती है। इन पहले सालों में यह वक्त होता है नई नीतियों के ईजाद का, नई दिशाओं का, बड़े-बड़े सुधारों का।
ऐसा नहीं है कि नई दिशाएं, नई नीतियां देखने को मिली नहीं हैं। जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, लेकिन मोहम्मद इखलाक की बर्बर हत्या के बाद माहौल ऐसा खराब हो गया है कि हम उन्हीं चीजों की चर्चा करते हैं आजकल, जिन्होंने भारत को आगे बढ़ने से दशकों से रोक रखा है। चर्चा हो रही है पुरानी नफरतों की, पुरानी दुश्मनियों की, पुरानी रंजिशों की। ऐसा लगने लगा है जैसे हम वापस उन पुराने दिनों में चले गए हैं, जब दलितों, मुसलमानों और कमजोर वर्गों पर अत्याचार आम हुआ करता था। इतना आम कि दो दलित बच्चों का जिंदा जलाया जाना सुर्खियों में भी नहीं आता था। खबर भी नहीं बनती थी, जब तक पूरा गांव नहीं जलता।
बहुत बुरे दिन थे वे, इसलिए कांग्रेस के सेक्युलर नेता लेक्चर देना बंद करें तो अच्छा होगा। मुझे खुद याद है सत्तर-अस्सी का दशक, जब किसी दलित गांव में जब हम जाया करते थे अत्याचार की किसी नई घटना की तहकीकात करने, तो मेरे सवर्ण साथी दलितों के हाथों से न पानी लेते थे, न रोटी। उनकी नजरों में इस तरह का बर्ताव आम था और वे परंपराएं भी आम, जिनके नियमों के मुताबिक दलितों को जानवरों से भी कम समझना बुरी बात नहीं मानी जाती थी।
इसलिए कांग्रेस प्रवक्ता और राजनीतिक अपनी नसीहतें अपने पास ही रखें तो अच्छा होगा। बोल अगर रहे हैं ऊंची आवाज में तो सिर्फ इसलिए कि प्रधानमंत्री नहीं बोल रहे हैं। और वह भी ऐसे समय जब उनकी आवाज सुनने के लिए देश बेताब है। खुद चुप्पी साधे हुए हैं ऐसी कि नेतृत्व अपने हाथों में ले लिया है राष्ट्रपति ने। यह जानते हुए भी कि राष्ट्रपति नहीं कुछ कहते हैं बिना प्रधानमंत्री की इजाजत। हम पत्रकारों ने उनके हर बयान को ध्यान से सुना है और गहराई से विश्लेषण किया है, क्योंकि नेतृत्व का अभाव नहीं होना चाहिए जब देश का माहौल इतना खराब हो।
प्रधानमंत्री के मौन रहने से कुछ ज्यादा ही बोलने लगे हैं उनके मंत्री और मुख्यमंत्री, और अक्सर उनके बयान निंदनीय रहे हैं। हर नई बर्बर हत्या के बाद इन लोगों की जुबान पर एक ही शब्द आता है ‘दुर्भाग्यपूर्ण’। जैसे कि डरते हों इससे ज्यादा कहने से और जो ज्यादा कहते हैं वे जरूरत से ज्यादा कह डालते हैं, जैसे जनरल वीके सिंह ने किया। फरीदाबाद में दलित बच्चों के जिंदा जलाए जाने के बाद जब जनरल साहब से पत्रकारों ने सवाल किए तो कह दिया इन्होंने कि भारत सरकार को हर स्थानीय घटना में नहीं घसीटा जा सकता- ‘कोई पत्थर मारे कुत्ते को तो क्या उस पर भी भारत सरकार को घसीट दिया जाए!’ जनरल साहब चुप रहते तो बेहतर होता।
प्रधानमंत्री अगर समझ गए हैं कि सबसे ज्यादा बदनामी व्यक्तिगत तौर पर उनकी हुई है तो चुप क्यों हैं? क्या देख नहीं रहे हैं कि उनकी चुप्पी का मतलब यही निकाला जा रहा है कि इस नफरत भरे हिंदुत्व-लहर को उनका समर्थन है? क्या वे देख नहीं रहे हैं कि जब भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री लोगों के खान-पान में दखल देते हैं तो ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ की धज्जियां उड़ाते हैं? बीफ को लेकर भाजपा मुख्यमंत्रियों ने हंगामा मचाया न होता तो मुमकिन है कि आज मोहम्मद इखलाक भी जिंदा होते और जाहिद भट्ट भी।
इन दोनों बेगुनाहों की बर्बर हत्या के बाद भी जब हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर से ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने इंटरव्यू लिया तो श्रीमान खट्टर ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि मुसलमानों को अगर भारत में रहना है तो बीफ खाना बंद करना होगा। इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इनको और अन्य बड़बोलों को फटकार लगाई, लेकिन इसके कुछ ही दिन बाद जनरल साहब ने अपना घिनौना बयान दिया।
क्या प्रधानमंत्री को दिख नहीं रहा है कि माहौल अगर एक बार खराब हो जाए देश का तो उसको सुधारना बहुत मुश्किल होगा? पिछले कुछ हफ्तों में भारत के बारे में विदेशी अखबारों में जब भी जिक्र आता है तो सिर्फ इस नफरत भरे माहौल को लेकर, इन बर्बर हत्याओं को लेकर। मुझे खुद हर दूसरे दिन किसी न किसी विदेशी रेडियो या पत्रकार से फोन आते हैं मोहम्मद इखलाक की हत्या के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए।
जो बातें हुआ करती थीं भारत की अर्थव्यवस्था की, वे बिल्कुल बंद हो गई हैं। अब नहीं सवाल करते हैं भारत के आर्थिक भविष्य पर, अब सवाल सब राजनीतिक हो गए हैं, जिनका मुख्य मकसद यह जानना है कि हिंदू-मुसलिम तनाव बढ़ता रहा तो परिणाम क्या होगा। जब फारूक अब्दुल्ला जैसे समझदार राजनेता कह सकते हैं खुलेआम कि ऐसा चलता रहा तो देश टूट सकता है फिर से, तो खतरे की घंटी बजनी चाहिए प्रधानमंत्री के कानों में। लेकिन अभी तक वे चुप हैं। क्यों?
उनकी चुप्पी से इतना नुकसान हुआ है खुद उनको कि जो लोग कल तक उनके कट्टर समर्थकों में गिने जाते थे, आज वे भी उनके नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं। कहने लग गए हैं ये लोग कि शायद नेतृत्व का उतना ही अभाव मोदी में है जितना मनमोहन सिंह में था। इसके बाद चिंता व्यक्त करते हैं भारत के भविष्य को लेकर, यह कह कर कि जो उम्मीदें थीं उनको कि मोदी वास्तव में देश में संपन्नता, समृद्धि ला सकेंगे, वे धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं।
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