हार्दिक पटेल! एकदम युवा चेहरा। तीखे नाक-नक्श। दीप्त नेत्र। गाड़ी में हिरासत में। पहलू बदलते हैं तो तकलीफ के साथ।

हार्दिक पटेल बोल रहे हैं। सामने रिकार्डतोड़ भीड़। ऐसी अब तक खबर चैनलों ने नहीं दिखाई। फैले मैदान में दूर तक सिर ही सिर दिखते हुए। और बाईस बरस का युवा बोलता हुआ, ललकारता हुआ, हक मांगता हुआ! लेकिन चैनलों पर एक भी बड़ी बहस नहीं! क्या बात है?

चैनल भी दाएं-बाएं देख कर मुद्दा चुनते हैं। हार्दिक पटेल की रैली से ज्यादा आकर्षक कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हुई है। जो वायरल की तरह फैल जाए, वही चैनलों में चर्चनीय है। आजकल एंकर ऐसे वायरल के शिकार होते हैं! खबर की प्रामाणिकता से बड़ी चीज है सोशल मीडिया पर किसी घटना का वायरल होना! उसका हल्ला होना। तुरंत मुकदमा शुरू होता है। चैनल का एंकर मुकद्दम हो जाता है। कैमरा केस का पेशकार हो जाता है।

हमारे एंकर देश चलाते हैं, समाज चलाते हैं और सड़क तक को चलाते हैं। चौराहे की कहा-सुनी को इस्तगासा बना कर मुकदमा कर देते हंै। वह तुरंत ‘प्रमाणित प्रीडेटर’, ‘पर्वर्ट’, ‘स्टाकर’ और न जाने क्या-क्या हो उठता है और चंद रिजर्व क्रांतिकारी वकील चेहरे ‘इस अपराधी को अभी लटकाओ’ के नारे लगाने लगते हंै।

टाइम्स नाउ का एंकर उस ‘पर्वर्ट’ पर पर्सनली भी नाराज था (हालांकि टीवी में एंकर का काम पर्सनल होना नहीं है) उसने कहा भी: आयम एंग्री। फिर ‘शिकार’ के लिए कहा: आयम प्राउड ऑफ यू! दीपिका ने जब बिना प्रमाण के लड़के को ‘पर्वर्ट’ कहने के लिए टोका तो एंकर ने उसकी एक न सुनी, शिकार रोने लगी और इस तरह भावुकता तर्क की तरह बिराज गई।

और जोश का बिल्ला लगा दिल्ली पुलिस ने इस सड़क वीरता पर पांच हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर डाला। सिर्फ आरोप पर सजा तो दी ही गई, शिकार को सम्मान भी दे डाला गया! ऐसा स्टूडियो न्याय कंगारू कोर्ट से कहीं अधिक उत्तेजक और न्याय की कामना को बदले की भावना में बदलता जाता है।

अगले रोज एबीपी चैनल पर आरोपित नौजवान था, उसने बताया कि क्या वाकया हुआ था, उस घटना का एक गवाह भी आया, जिसने कहा कि लड़के ने लड़की को कतई तंग नहीं किया है। ट्रैफिक को लेकर कहा-सुनी-सी जरूर हुई है। कहानी का दूसरा पक्ष खुलते ही परेशानी कि कौन-सी कहानी सही है? लेकिन कैमरे का कंगारू कोर्ट जब तक एक घंटे में सजा न सुना दे, तब तक उसकी टीआरपी कैसे बढ़े?

पुलिस ने वही किया, जिसका विज्ञापन वह दिया करती है। एफएम रेडियो पर दिल्ली पुलिस का एक विज्ञापन आता है कि अगर कोई शख्स किसी लड़की को छेड़ता है या उससे ऐसी-वैसी बात करता है, तो आप पुलिस में शिकायत करें उसको जेल तक हो सकती है, नौकरी तक जा सकती है! विज्ञापन की भाषा में ऐसी धमकी न होती, ‘अपराध सिद्ध होने पर कानूनन ये ये सजा हो सकती है’ की समझ दी जाती, तो विज्ञापन का प्रभाव कहीं बेहतर होता! लेकिन आजकल तुरंता न्याय ही बिकता है।

जब तक एनडीटीवी है तब तक लगता है कि पाकिस्तान से बातचीत संभव है और बरखाजी यह संभव कर सकती हंै। और जब तक इंडिया टुडे और करन थापर हंै तब तक चीन के बाजार का लुढ़कना और हमारे रुपए के लुढ़कने के बावजूद बाजार के ‘फंडामेंटल्स को दुरुस्त’ होने से कोई इनकार नहीं कर सकता। जयंत सिन्हा आ-आकर इस चैनल पर समझाएंगे कि हमारा बाजार ठीकठाक है। अरुण जेटली कहेंगे कि इस सबका बहुत असर नहीं पड़ेगा।

यही नहीं, जब तक राजदीप हैं तब तक सैफ-कबीर की फैंटम को पाकिस्तान में रोक कर भी नहीं रोका जा सकता, क्योंकि सैफ का कहना है कि अगर असली पिक्चर बैन करोगे, तो लोग नकली सीडी देखेंगे। राजदीप इस बाइट पर हमेशा की तरह किलकेंगे! पाकिस्तान को तबाह करने के लिए हमारी ‘फैंटम’ टाइप पिक्चरें ही काफी हंै! फैंटम जैसा मुफ्त का प्रोमो (दो-दो दिन) किसे नसीब हुआ?

एबीपी पर नीतीश का दिबांग की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आना और हर सवाल का शांति से जवाब देना कायल करने वाला था, लेकिन वहीं बैठे एक पत्रकार के सवाल भला क्यों इस तरीके के रहे जैसे वे नीतीश से सवाल कम कर, उन पर आरोप ज्यादा लगा रहे हैं। इन पत्रकार महोदय की देह भाषा किसी पत्रकार की नहीं लगती थी। एक घंटे तक लगभग हर सवाल उनको कठघरे में खड़ा करने के लिए था। नीतीश ने हर सवाल का जवाब दिया। कहीं-कहीं व्यंग्य से बात की और एक पल भी वे अशिष्ट नहीं दिखे! एबीपी का यह कार्यक्रम देखने योग्य होता है।

एक सप्ताह से रिटायर्ड फौजियों के जंतर मंतर के धरने और आमरण अनशन पर लगातार खबरें बनती रहीं। खबरों में उत्तेजना तक आई। राजनाथ सिंह के घर कई मंत्रियों की अचानक बैठक की बात बड़ी खबर बनी। एक चैनल पर बहस में एक करगिल वेटेरन इस कदर उत्तेजित थे कि कह बैठे कि सरकार को नहीं मालूम कि वह क्या कर रही है। जो जंतर मंतर पर बैठे हैं उनके बच्चे सरहदों की हिफाजत कर रहे हंै, वे भी समझ रहे हंै कि सरकार किस तरह टरका रही है! जब आप सवा लाख करोड़ रुपया बिहार को दे सकते हैं, जब आप एक मिलियन डॉलर मंगोलिया को दे सकते हंै, तब आप आठ से दस हजार करोड़ रुपया फौजियों की पेंशन के लिए क्यों नहीं दे सकते। एक चैनल के रिपोर्टर ने खबर लगाई कि हो सकता है अट्ठाईस तारीख तक ‘वन रैंक वन पेंशन’ की घोषणा ही कर दी जाए। एक रिपोर्टर ने डर बैठाया कि आशंका है कि कहीं ये फौजी बिहार न चले जाएं!

हमने एक शाम किसान चैनल देखा। सोचा था कि यहां हमें अपने देश के सचमुच के किसान के दर्शन हो सकेंगे, लेकिन एक अदद किसान के दर्शन को तरस गए। एक कार्यक्रम में एक शहराती लड़की बाड़मेर की गऊशाला के दर्शन करा रही थी। उसके साथ गोपाल नाम का एक किसान था, जो अभिनेता ज्यादा लगता था, किसान कम। पहले उसने बाड़मेर की गऊशाला की महिमा बताई, फिर गऊशाला दिखाई और लड़की ने गऊशाला को खुद इस तरह से देखा-बताया जैसे एलिस इन वंडरलैंड में हो। अरे भाई, इससे तो कृषि दर्शन ही बेहतर था, उसमें कम से कम पूसा के खेत तो दिख जाया करते थे, फसलें तो सच्ची दिख जाया करती थीं। यहां कुछ भी नहीं है। किस किसान रहित लोक का है यह किसान चैनल? (अजदक)

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta