निलय उपाध्याय का उपन्यास पहाड़ मनुष्यता और प्रकृति-विरोधी विध्वंसक प्रवृत्ति को, संवेदना की एक व्यापक और गहरी भूमि पर खड़े होकर, इस प्रकार उद्घाटित करता है कि पाठक बेचैन और उद्विग्न हो जाता है। यह उपन्यास ‘गोदान’ और ‘मैला आंचल’ की परंपरा को आगे बढ़ाता और उन प्रश्नों और चुनौतियों से टकराता है, जो प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु के सामने नहीं थीं। प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु के सामने व्यापक मेहनतकश जनता के शोषण-उत्पीड़न, गरीबी, भूख, कंगाली, बदहाली, बेरोजगारी, अपमान और उपेक्षा का प्रश्न केंद्र में था।

इस स्थिति के लिए कौन-सी शक्तियां जिम्मेदार हैं, कौन से आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक-सांस्कृतिक संबंध जिम्मेदार हैं, इनकी पहचान और इन संबंधों को कैसे बदला जा सकता है और शोषकों-उत्पीड़कों से कैसे मुक्ति पाई जा सकती है, इसकी तरफ भी संकेत करने की कोशिश थी।

निलय उपाध्याय का उपन्यास इन प्रश्नों-संबंधों से जूझता और पूरी मनुष्य जाति के सामने मुंह बाए भयावह आसन्न संकट को भी उद्घाटित करता है कि जिस तरह विकास और सभ्यता के नाम पर प्रकृति का विनाश और विध्वंस किया जा रहा है, वह मनुष्य जाति और पूरे प्राणी-जगत को किस स्थिति में ले जाएगा, मनुष्य-जाति और अन्य प्राणियों के वास-स्थान पृथ्वी का अस्तित्व बचेगा भी कि नहीं। यह कोई काल्पनिक प्रश्न नहीं, आसन्न संकट है।

जो लोग इस उपन्यास को सिर्फ इस उम्मीद से पढ़ेंगे कि यह एक साधारण व्यक्ति (दशरथ मांझी) के असाधारण कारनामे (पहाड़ को काट कर रास्ता बनाने) की कहानी है, उसके प्रेम (पत्नी पिंजरी के प्रति) की गाथा है, शायद उन्हें थोड़ी निराशा हाथ लग सकती है। यह दशरथ मांझी के नायकत्व की कहानी तो है, लेकिन जिस प्रकार गोदान में होरी की कहानी, मेहनतकश किसान-मजूर के जीवन की त्रासदी की कहानी थी, उसी प्रकार ‘पहाड़’ उपन्यास के केंद्र में भले ही दशरथ मांझी हों, लेकिन यह उपन्यास दशरथ के गांव ‘गलहौर’ के लोगों के जीवन-यथार्थ के माध्यम से पूरे उत्तर भारत के ग्रामीण समाज के दिल दहला देने वाले क्रूर और त्रासद यथार्थ को उसकी पूरी भयावहता के साथ सामने लाता है।

पहाड़ काट कर रास्ता बनाने में दशरथ की सफलता, पाठक को किसी विजयोल्लास या आनंद के सागर में नहीं डुबोती, बल्कि उस त्रासदी से रूबरू कराती, जिससे ‘गलहौर’ गांव और पूरा देश गुजर रहा है, जिसमें दशरथ जैसे संवेदनशील और ईमानदार इंसान पागल ठहरा दिए जाते हैं। कथा का फलक पचास वर्षों (1960 से 2010) तक फैला हुआ है। इस बीच भारतीय ग्रामीण जीवन में तेजी से तब्दीलियां आई हैं, इन तब्दीलियों ने गांव के बहुलांश लोगों के जीवन को और नारकीय बना दिया। जातिवादी-पितृसत्तावादी सामंती शोषण-उत्पीड़न से तो मुक्ति मिली ही नहीं, एक और नई शोषक-उत्पीड़क शक्ति ने लोगों को अपने चंगुल में जकड़ लिया, जिसे मशीनी सभ्यता कहते हैं, प्रेमचंद जिसे महाजनी सभ्यता कहते थे, इसे आजकल विकास कहा जाता है।

‘पहाड़’ सामंती और महाजनी (पूंजीवादी) दोनों सभ्यताओं के वास्तविक अंतर को उजागर करता है। जहां सामंती सभ्यता (दिकुओं) ने जंगलों में आजाद और घुमंतू जीवन जीने वाले मांझियों को अपना चाकर और गुलाम बनाया, वहीं पूंजीवादी सभ्यता ने बचे-खुचे जंगलों, पहाड़ों और नदियों के साथ जीवन जीने वालों, आजाद लोगों को मजूर होने को विवश कर दिया, उन्हें उनके जंगलों-पहाड़ों से बेदखल कर दिया गया। उपन्यासकार निलय उपाध्याय ने मांझियों और पत्थरकट बैंगा के माध्यम से तथाकथित सभ्यता की विकास-यात्रा के इस क्रूर और अमानवीय चेहरे को बेनकाब किया है।

यह उपन्यास पृष्ठ-दर-पृष्ठ प्रकृति और बहुलांश मनुष्यों पर विजय पाने, उन्हें रौंदने, चाकर-मजूर और दास-गुलाम बनाने वाली सभ्यता की भीतरी सच्चाई की पड़ताल करता है। मशीनी सभ्यता अपने जन्म के साथ ही प्रकृति को अपना दुश्मन मानती रही है, प्रकृति पर विजय पाना ही उसका चरम लक्ष्य रहा है। इसने प्रकृति को अपना सहचर और दोस्त नहीं माना। अपने को उसका अंग नहीं समझा। उपन्यास के केंद्रीय पात्र दशरथ मांझी का संघर्ष, पहाड़ काट कर लोगों के लिए रास्ता बनाने का संघर्ष नहीं, बल्कि निरंतर इस बात का भी संघर्ष है कि लोग यह मानें कि मनुष्य प्रकृति का ही एक हिस्सा है, प्रकृति उसकी अपनी है, उसकी सहचर है, विकास के नाम पर प्रकृति का विध्वंस करने की कोशिश पूरी मनुष्य जाति के वास-स्थान पृथ्वी के विनाश का आमंत्रण है।

‘पहाड़’ के केंद्र में त्रासदी है, तथाकथित सभ्यता एक-एक करके प्रकृति और उन सभी इंसानों को निगल जाती है, जिनमें मनुष्यता बची है या मानवीय लोगों को अमानवीय या अपराधी होने के लिए विवश कर देती है। उपन्यास के सभी शानदार इंसान एक-एक करके मारे जाते हैं, आजाद और प्राकृतिक जीवन जीने वाला पत्थरकट बैंगा पुलिस की गोलियों का शिकार होता है, उसकी बीवी उडपी के साथ सामूहिक बलात्कार होता है, वह पागल हो जाती है। दशरथ मांझी की पत्नी पिंजरी मौत को गले लगाने को विवश होती है, पहाड़ी बाबा (सच्चे संत) की हत्या की जाती है, झौरी जैसा अच्छा इंसान अपराधी बनने को विवश हो जाता है और दशरथ मांझी जैसे महान इंसान को पागल ठहरा दिया जाता है।

निलय उपाध्याय ने यह सब कुछ इतने कथात्मक कौशल और शिल्प के साथ कहा है कि पाठक एक बार जब उपन्यास के रचना-संसार में प्रवेश करता है, तो तब तक नहीं निकल पाता, जब तक कथा पूरी तरह उसके भीतर समा नहीं जाती।
(रामू सिद्धार्थ)
पहाड़: निलय उपाध्याय; राधाकृष्ण प्रकाशन, 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, दिल्ली; 275 रुपए।

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भारतीय सभ्यता के सामासिक संदर्भ
सभ्यताओं और संस्कृतियों के बहुध्रुवीय विश्व परिदृश्य में भारत एक राष्ट्र, भौगोलिक सीमाओं में आबद्ध एक देश भर नहीं, अपितु आधा ग्लोब है। अत: विश्व के अप्रतिहत यूरोपीयकरण के विरुद्ध भारत को अपने वैकल्पिक सभ्यताबोध को दुनिया के समक्ष रखने का अधिकार है। अधिकारिता के इस दावे को यह विरोध द्विगुणित कर देता है, जिसके तहत यह माना जाता है कि वास्तव में विरोध जितना एशिया और भारत के मध्य नहीं, उससे कहीं ज्यादा भारत और विश्व के बीच है।

भारत के इसी साभ्यतिक अधिकारबोध और विधि-निषेध रूप, उसकी इतिकर्तव्यता की जांच पड़ताल इस पुस्तक में उस आधुनिकता के प्रतिपक्ष में की गई है, जिसने आज तक बलीयसी विश्वसभ्यता का रूप धारण कर लिया है। भारत की आजादी के मूल्यबोध को इसी पूर्वपक्ष के प्रत्युत्तर में आत्मसात कर स्वातंत्र्योत्तर भारत के स्वधर्म को उसके क्रियान्वयन में देखना-चाहना इस पुस्तक की अति विशिष्ट फलश्रुति है।

भारतीयता के सामासिक अर्थ-संदर्भ: अंबिकादत्त शर्मा; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 200 रुपए।

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लालबहादुर का इंजन
राकेश मिश्र अपनी कहानियों में ऐसी प्रक्रियाओं का अवलोकन या विवेचन करते हैं, जिन प्रक्रियाओं ने समय के भीतर से गुजर कर अभी कोई रूप हासिल नहीं किया है। वे अभी चल रही हैं। किसी चलायमान प्रक्रिया को कहानी के फ्रेम में लाना बहुत मुश्किल काम है, क्योंकि अभी उसकी कोई दिशा तय नहीं है। उसके बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। राकेश इसी मुश्किल से जूझ रहे हैं। वे किसी पूर्व व्याख्यायित घटना या अनुभव से अपनी कहानी का ताना-बाना नहीं बुनते, बल्कि ऐसे चरित्रों को सामने ला रहे हैं, जो इस सांय-सांय करते समय के भयानक ट्विस्ट में कहीं भी अपने पांव टिका नहीं पा रहे हैं।

शायद यही वजह है कि निर्वाह के स्तर पर भी इन कहानियों में आपको कोई ‘लिनियरिटी’ नहीं दिखेगी। जैसे समय ने हमारी मौजूदा जीवनशैली और मनोवृत्तियों को छिन्न-भिन्न कर दिया है, वैसे ही इन कहानियों के अंश और सूत्र बिखरे-बिखरे से हैं। लेकिन राकेश किसी ‘परफेक्सनिस्ट’ की तरह इन चीजों को जोड़ कर उसे ‘फिनिशिंग टच’ देने की चलताऊ कोशिश नहीं करते, बल्कि उनकी कहानियों में द्वंद्व है। राकेश का यह खुरदुरापन शिल्प भले ही आज हमारे अवबोध के अनुकूल नहीं बैठ रहा है, लेकिन आने वाले समय में वह बहुत गहराई तक अपनी जगह बनाएगा।

लालबहादुर का इंजन: राकेश मिश्र; आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, एससीएफ 267, सेक्टर-16, पंचकूला; 200 रुपए।

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