हाल में हिलेरी क्लिंटन के बारे में एक खबर आई कि वे अपने पति बिल क्लिंटन को मारती-पीटती थीं। उनके ऊपर ऐश ट्रे और ऐसे ही सामान फेंकती थीं, जिससे कि चोट लग सके। यही नहीं, एक बार वे उन्हें थप्पड़ भी मार चुकी हैं। नोंचती-खरोंचती थीं। कभी-कभी तो खून तक निकल आता था। ऐसा तब होता था जब क्लिंटन अमेरिका के एक प्रांत के गवर्नर थे। यही नहीं, अपने घर और दफ्तर के कर्मचारियों को आतंकित करके रखती थीं। यह खुलासा राजनीतिक सलाहकार रोजर स्टोन्स की पुस्तक- ‘द क्लिंटंस: वार आन वुमन’ में किया गया है। आश्चर्यजनक बात यह है कि क्लिंटन अमेरिका के दो बार राष्ट्रपति रह चुके हैं, तब ऐसी कोई बात सामने नहीं आई। अब एकाएक ऐसे खुलासों के बहुत से अर्थ अमेरिका के चुनाव से जुड़े हैं।
दरअसल, हिलेरी पर घरेलू हिंसा का आरोप लगाया जा रहा है। जैसे-जैसे राष्ट्रपति के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इस तरह के खुलासे होते रहेंगे। हिलेरी चूंकि राष्ट्रपति पद की मजबूत दावेदार हैं और औरत भी हैं, इसलिए इस तरह की बातों से यह साबित करने की कोशिश की जाएगी कि वे कितनी निर्मम हैं। कि वे तो एक अच्छी पत्नी तक नहीं हैं। पति से मार-पिटाई करती हैं। बहुत झक्की हैं। ऐसे में वे राष्ट्रपति पद पर रहते हुए राष्ट्रीय-अंतरराष्टीय जिम्मेदारियों को ठीक तरह से कैसे निभाएंगी। इसलिए उन्हें अमेरिका जैसे महान देश का राष्ट्रपति हरगिज नहीं बनाया जाना चाहिए।
दुनिया को लैंगिक समानता का उपदेश देने वाले अमेरिका में हाल तक ये बहसें चलती रही हैं कि अमेरिका अभी महिला राष्ट्रपति के लिए तैयार है कि नहीं। अब भी चल ही रही होंगी। दुनिया का दारोगा, खुद को सर्वोच्च सत्ता होने का घमंड पाले, बात-बात पर मानवता की दुहाई देने वाला देश, अभी तक इस बात पर कैसे बहस करता रह सकता है कि कोई औरत अगर राष्ट्रपति बन जाए, तो लोगों को अच्छा लगेगा या बुरा। यही नहीं, नस्लभेद पर अच्छी लगने वाली बातें करने वाले अमेरिका को अपने यहां के अश्वेतों की दुर्दशा कभी नहीं दीखती। बहुत से क्षेत्रों में आदमी, औरत को समान काम के लिए समान वेतन तक नहीं दिया जाता।
हमारे यहां कुछ लोग इस बात पर खुश हो सकते हैं कि चलो हम ही इस संसार में मार-पिटाई करने वाले अकेले सूरमा नहीं हैं, अमेरिका तक में ऐसा होता है। और वहां तो राष्ट्रपति पत्नी के हाथों पिट रहा है। वहां भी घरेलू हिंसा होती है। पति, पत्नी एक-दूसरे को पीटते हैं। हमारे यहां पत्नियां पति को पीटती हैं, तो आजकल के भारतीय मानकों के अनुसार मर्दानी और लक्ष्मीबाई कही जाती हैं। हो सकता है कि कल को कोई हिलेरी को भी इसी नाम से पुकारने लगे। यह भी संभव है कि जिस तरह दिल्ली पुलिस बार-बार पीटने वाली महिलाओं को सम्मानित करती रहती है, पुरस्कार देती है, हिलेरी को भी ऐसा कुछ मिल जाए। क्या पता बिल क्लिंटन की पिटाई की घटना पर भारत का कोई फिल्मकार फिल्म बनाने की सोचे और इस पुस्तक के अधिकार खरीद ले!
वैसे भी हमारे यहां अमेरिका की तरह कानून जेंडर न्यूट्रल नहीं हैं। यहां कानून के नजरिए से माना जाता है कि घरेलू हिंसा के लिए सिर्फ पति यानी पुरुष जिम्मेदार होते हैं। इसलिए सजा भी उन्हें ही मिलनी चाहिए। यों आजकल औरतों की हिंसा के समाचार भी अखबारों में खूब छपते हैं। मगर अक्सर इस हिंसा के बारे में कहा जाता है कि औरत ने शायद अपने बचाव में ऐसा किया होगा। जबकि अमेरिका में हिंसा मात्र गलत है। वहां भारत की तरह आदमी-औरत की हिंसा को अलग-अलग करके नहीं देखा जाता कि आदमी ने हिंसा की होगी तो वह गलत है और आदमी को हर हाल में सजा मिलनी ही चाहिए। अगर औरत हिंसा करे तो वह ठीक, क्योंकि हमारे यहां सदियों से पुरुष और पति लड़कियों, औरतों को पीटते रहे हैं। वे इसे औरत को काबू में रखने के लिए सबसे अचूक नुस्खा भी मानते रहे हैं। और अपनी ताकत आजमाने के लिए करते रहे हैं, जो बहुत हद तक सही भी है।
जबसे घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून बना है, शहरों में इस तरह की कुछ घटनाएं सुनाई भी देती हैं कि किसी औरत ने अपने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा की शिकायत की। लेकिन जब पत्नी पति को पीटती है, तो यह एक बड़ी खबर बनती है। यही नहीं, पीटने वाली लड़कियों को लक्ष्मीबाई और मर्दानी आदि विशेषणों से नवाजा जाता है। मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, हिंसा करती औरत को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाता है। जैसे कि पीटना कोई बहुत अच्छी बात हो। और पीटती औरत नायिका है। अगर पीटने वाला पुरुष गलत है, तो पीटने वाली औरत भी कैसे ठीक हो सकती है! उसे भी गलत कहा जाना चाहिए। मगर इसे अपने प्रति सदियों से हुई हिंसा के प्रतिकार के रूप में दिखाया-बताया जाता है। मर्दानी जैसी फिल्में भी बनती हैं। सोचने की बात यह है कि औरत को मर्दानी क्यों कहा जाना चाहिए। औरतों को मर्दों जैसा क्यों दिखना और बनना चाहिए। क्या वे औरत होकर किसी से कम हैं या कि सोच यह है कि उन्हें आदमियों के समकक्ष होने के लिए उन्हीं जैसे करतब करने होंगे।
गुजरात में मशहूर कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसीवाली रानी थी’ की पंक्तियों से मर्दानी शब्द निकालने की मांग की गई थी। इस मांग का आशय शायद यही रहा होगा कि औरतें, औरत होकर ही खुश हैं। उन्हें किसी विशेषज्ञता के लिए आदमी बनने की चाहत नहीं है। क्योंकि सही मायने में औरत को मर्द कह कर यही साबित करने की कोशिश की जाती है कि इतिहास का चक्र उलट गया है। पुरुष किसी गलतफहमी में न रहें। औरतें भी पीट सकती हैं। औरतें जब पीटती हैं, तो उनको वाहवाही मिलती है और प्रकारांतर से दूसरी औरतों को प्रेरणा भी। लेकिन जब हम कहते हैं कि किसी के भी प्रति हिंसा गलत है, तो वह आदमी और औरत दोनों के प्रति गलत है। उसे बढ़ावा देने की भी जरूरत क्यों है। क्या हिलेरी की इस तरह की खबरों से दुनिया भर में औरतों का उन्हें समर्थन मिलेगा कि कोई तो रणबांकुरी निकली, जिसने पति को पीटा। और यह घटना इतनी बड़ी थी कि उस पर किताब भी लिख दी गई।
यहां मोनिका लेवेंस्की का प्रकरण याद आता है।
जब क्लिंटन राष्ट्रपति थे, तो अपने दफ्तर में काम करने वाली लड़की मोनिका से उनके संबंध हो गए थे। इसकी उच्चस्तरीय जांच भी की गई थी। तब हिलेरी ने आगे बढ़ कर क्लिंटन का पक्ष लिया था। उस समय उनकी बहुत तारीफ भी की गई थी। कहा गया था कि औरतों का मिजाज दुनिया भर में एक जैसा होता है। मुसीबत के वक्त वे पति के पीछे किसी मजबूत चट््टान की तरह खड़ी हो जाती हैं। अब यह अलग बात है कि बाहर उन्होंने पति का पक्ष लिया हो और घर के अंदर कुछ और किया हो।
यह भी वक्त बताएगा कि घरेलू हिंसा के इस आरोप के बावजूद, अमेरिकी वोटर हिलेरी को चुन कर इतिहास बनाता है कि नहीं। क्योंकि अमेरिका में किसी महिला का पहली बार राष्ट्रपति बनना सचमुच इतिहास का बनना और बदलना होगा।