समकालीनता, साहित्य की नई प्रवृत्तियों और नवाचार से हमारे अकादेमिक जगत का संबंध दशकों से तनाव और विसंवाद का रहा है। कभी-कभी जब नए समकालीन लेखकों आदि पर पीएचडी आदि के लिए शोध होते हैं तो यह भ्रम होता है कि उच्च शिक्षा समकालीनता का एहतराम कर उसे हिसाब में ले रही है। इस सिलसिले में ऐसे लेखकों पर भी काम होता है जिनका साहित्य जगत में कोई नाम तक नहीं जानता और जिन्हें स्थानीयता या ऐसे किसी दबाव में चुना जाता है।

कुछ दिनों पहले दिल्ली के एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय में कविता पाठ के लिए जाना हुआ। उसका एक सभागार छात्र-छात्राओं से भरा था जिन्होंने पांच समकालीन कवियों की कविताएं रुचि से सुनीं-गुनीं। उनकी प्रतिक्रियाओं से यह प्रभाव नहीं पड़ रहा था कि उन्हें संप्रेषण में विशेष कठिनाई हो रही है या कि कविताएं उन्हें उद्वेलित नहीं कर पा रही हैं। प्रस्तुत की गई कविताओं का वितान बहुत विस्तृत था और उसमें कई शैलियों, भंगिमाओं, विषयों और शिल्पों की कविताएं थीं। पर्याप्त और रोचक विविधता थी जिसमें से अपनी रुचि और दृष्टि के अनुसार चुनने के लिए युवा श्रोता स्वतंत्र थे। स्पष्ट था कि अगर ठीक से सुनाई जाएं तो आज की कविता अपना प्रभाव छोड़ती है और संभवत: श्रोताओं की अपने समय, समाज और भाषा की सचाई उसकी बेहतर पकड़ और समझ में आती है।

पाठ के अंत में महाविद्यालय के एक विद्वान अध्यापक ने लंबी टिप्पणी की जिसमें इस बात पर वही पुराना रोना रोया गया कि आज की कविता पहले की कविता की तरह स्मरणीय नहीं रह गई है। यहां तक तो ठीक था: स्मरणीयता अच्छा गुण है, पर वह कविता के महत्त्व या सार्थकता का पैमाना नहीं हो सकता, न प्राचीनों के यहां ही कभी रहा है। पर वे इस पर रुके नहीं। उन्होंने आगे कहा कि आज के समर्थ कवियों को भजन, कव्वाली और फिल्मी गीत की तर्ज पर कविताएं लिखना चाहिए!

उनके अनुसार ये विधाएं हमारी जातीय विधाएं हैं जिनको तजकर हम कविता के असली कर्म से विरत हो रहे हैं। पहले तो यह यकीन नहीं हुआ कि हिंदी साहित्य का कोई अध्यापक ऐसी मूढ़ बात कह सकता है। पर उन्होंने अपने इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की और समापन में फिर यह बात दुहराई। उनकी आधुनिक वेशभूषा और चिकने-चुपड़ेपन में ऐसी मूढ़ दकियानूसी छिपी हुई है इसका जरा भी संदेह नहीं होता था: वे अच्छे वक्ता हैं और भद्राचारी हैं। पर उनकी कविता और साहित्य की अगर यह समझ है, जो उन्हें हास्यास्पद और दयनीय दोनों ही साबित करती है, तो यह सोचने की बात है कि हमारी उच्च शिक्षा में साहित्य की किस तरह की समझ और संस्कार विकसित हो रहे हैं। संयोगवश, उन्होंने यह भी बताया कि वे अपनी कक्षा में कविता और साहित्य समझाने के लिए फिल्मी गीतों का सहारा लेते हैं। बलिहारी गुरु आपकी…