आशुतोष दुबे

मिथक रचना में क्यों आते हैं? कोई रचनाकार मिथक की ओर क्यों जाता है? क्या वे उसकी वैचारिकी को अनुमोदित, उन्नयित करने के उपकरण हैं या उनका अपना अंतर्भुक्त वैभव उसे मोहता है? उनमें किसी रचनाकार के लिए किन प्रश्नों, किन चुनौतियों, किन व्याख्याओं से टकराने का आमंत्रण होता है? संदर्भों की लंबी फेहरिस्त दी जा सकती है; मनीषियों के कथन उद्धरणों के तौर पर लाद दिए जा सकते हैं, पर यहां मिथक और हिंदी कविता के बदलते-बनते संबंधों पर थोड़ा रुक कर विचार करने की जरूरत है। मिथक को काव्य-आधार बनाने वाली कविता; प्रगतिशील कविता द्वारा संभवत: उनके दुरुपयोग की आशंकाओं के चलते संदेह से देखी जाने वाली कविता रही है। यह पूरी तरह निर्मूल भी नहीं है।

आज भी छोटे शहरों, कस्बों से लगा कर महानगरों तक में अनेक कवि पुराण-प्रसंगों का ‘वर्सीफिकेशन’ करने के असमर्थ, अनावश्यक और अधकचरे प्रयत्नों में प्रबंध काव्य, खंडकाव्य से लगा कर महाकाव्य तक रच कर आत्म-विभोर होते देखे जा सकते हैं और उनकी इस दुनिया का समकालीन हिंदी कविता की उस दुनिया से कोई संबंध नहीं है, जो इस प्रचुर काव्य उत्पादन को किसी लेखे में नहीं लेती। इन कृतियों में सिवा पौराणिक चरित्रों के अतिरंजित यशोगान और महिमामंडन के कुछ और नहीं होता। पुरा-प्रसंगों की आख्यानात्मक सुविधाओं से आकर्षित ऐसे कविगण प्राय: विषय के अतिरिक्त रूप से पूर्वोपलब्ध महत्त्व और लोकमानस में उन्हें लेकर पैठे श्रद्धाभाव पर अपनी काव्यरचना को अवलंबित करते हैं। जाहिर है, मिथक यहां कोई दुर्निवार काव्यात्मक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक आसानी, एक सुविधा है, जिसका अकृपण उपयोग ‘माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम’ की तर्ज पर किया जा सकता है।

दूसरी तरफ उन्हें निरा ‘धार्मिक’ मान कर उन्हें साहित्य-बदर कर देने की मानसिकता एक भिन्न किस्म का अतिचार है। इसके चलते एक पूरी पीढ़ी इनसे अछूत की तरह बर्ताव करती रही है। उसे जातीय स्मृति की विपुल संपदा से उसके अनजाने ही वंचित कर दिया गया है; हालांकि उसमें खुद उसके लाभ-लोभ का विचार और तथाकथित मुख्य धारा से छिटक जाने के भय की भी भूमिका रही है। यह कितना आश्चर्यजनक और विडंबनापूर्ण है कि जिस मिथक-संपदा को साहित्य में संदिग्ध माना जाता रहा, उसे बरतने में प्रगतिशील चित्रकारों, संगीतकारों को कोई दुविधा नहीं हुई। उन्होंने उसका पूरा उपयोग करते हुए उसे अपनी कला-दीप्ति में अपनी तरह से देखा-दिखाया। इससे उनकी प्रगतिशीलता कभी प्रश्नांकित नहीं की गई। अंग्रेजी कविता में बिना किसी ‘कांशसनेस’ के ग्रीक मिथक जैसे उत्तराधिकार में चले आते हैं। ग्रीक ही नहीं, बिब्लिकल भी।

मगर हिंदी साहित्य में स्थिति बिल्कुल भिन्न रही। जिन कवियों ने मिथकों को काव्य का उपजीव्य बनाया, उन्होंने भी यह पूरा प्रयास किया कि वे यथासंभव उनका दार्शनिकीकरण कर सकें। कुंवर नारायण, धर्मवीर भारती और नरेश मेहता के मिथक-प्रयोगों में भी इसे देखा जा सकता है। यह भी एक ध्यान दिए जाने वाला तथ्य है कि मिथक का अर्थ सिर्फ हिंदू मिथक नहीं है। हिंदी के समकालीन मुसलिम कवियों में भी मिथकों से दूरी बरतने के सचेत प्रयास दिखते हैं। यह सचेतनता समकालीन हिंदी कविता का एक प्रधान लक्षण है। हिंदी कविता का अनुकूलन (कंडीशनिंग) ही ऐसा हो चला है। यहां ‘देवता’ आता भी है तो तय है कि उसे देवत्व की विडंबना बन कर आना है। अचरज नहीं कि ‘राम की शक्तिपूजा’ के कारण दबे-खुले स्वरों में निराला पर सांप्रदायिकता का आरोप लगा। उस कविता में जो कालजयी जीवट है; वह जो राम की विषण्ण्ता, थकान और अवसाद का इतना जीवंत मानवीय चित्र प्रस्तुत करती है : उसे मगर इन तमाम आरोपों की धुंध में भी बच जाना था और यह भी एक रोचक तथ्य है कि हिंदी की समर्थ रंग और काव्य प्रतिभाएं इस कविता को, और जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ को भी, मंचित करने के प्रति उत्साहित हैं।

युवा कविता में मिथक-दुर्भिक्ष के इन दिनों में भी ऐसी प्रतिभाएं दृश्य पर हैं, जिन्होंने न सिर्फ मिथकों को अपनी कविता में निस्संकोच, नवोन्मेषी उत्साह के साथ बरता है, बल्कि मिथक रचना में भी अपूर्व कौशल का परिचय दिया है। ऐसे कवियों में विशेष तौर पर अंबर रंजना पांडेय उल्लेखनीय हैं। उनकी ‘उत्तरोत्तर आधुनिक शिवपुराण’ शृंखला की कविताएं इसका साक्ष्य हैं। इसी तरह ‘चंद्रमा की हेअर-पिन’ और ‘चरित चिंतन’ जैसी कविताएं भी पारंपरिक मिथकों को एक नए आलोक-वृत्त में प्रकाशित करती हैं। उनकी कविताओं में देवता सबसे अधिक वेध्य और मानवीय उपस्थिति हैं और इसके बावजूद वे अपने देवता होने के अपराधबोध से पीड़ित दिखाई नहीं देते। क्रीड़ा और कौतुक की सर्वथा नई काव्य भंगिमाएं इन मिथक कविताओं को एक अनूठा, अपूर्वानुमेय स्पर्श देती हैं। यह मिथकों की प्रासंगिकता का भी पुनराविष्कार है और इस बात की सनद है कि अनुमोदनाकांक्षा से हट कर युवा कविता जोखिम के ऐसे इलाकों में भी जा सकती है जिन पर जाना ‘महाजनों’ ने निषिद्ध किया हुआ है। इनसे कुछ पहले के कवि प्रेमशंकर शुक्ल ने भी मिथकों को बिना किसी शोर-शराबे के, बिल्कुल अपनी तरह से कविताओं में निबद्ध किया है। ‘सोने की सीता’, ‘नदियों की प्रेमकथा’, ‘लोना लोई’ ‘राधा पांव’, ‘आदि-पालथी’ आदि कविताओं में उन्होंने मिथकों को नई नजर से देखा-परखा है। वरिष्ठ कवियों में विष्णु खरे अपनी विदग्ध शैली में मिथकों से टकराते हैं।

अगर यह कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी कि तमाम विधि निषेधों के बावजूद मिथक हर समर्थ हिंदी कवि को आकर्षित करते रहे हैं और उनकी चुनौतियों से निपटे बिना छुटकारा नहीं मिलता। मिथक कई बार समकालीनता के प्रश्नों को प्रखरतर बना कर प्रस्तुत करते हैं और कुछ दफा यह भी होता है कि वे सिर्फ उपकरण बनने से इंकार करते हुए अपने कवि को भी अपनी किसी अप्रत्याशित व्याख्या का अवसर देकर अचंभे में डाल सकते हैं। जातीय स्मृति और परंपरा से छिटक कर कविता की भूमि के उर्वर होने की कल्पना एक कठिन कल्पना है। कुंवर नारायण सही कहते हैं : ‘यह सोचना ठीक नहीं कि मिथक पुराने जमाने के किस्से कहानी भर हैं। उनके आदि रूपों और आज के रूपों में दिलचस्प समानता है। इस समानता की जड़ें मनुष्य के उन बुनियादी भयों, आशाओं, निराशाओं, आकांक्षाओं, इच्छाओं आदि में हैं और जो आज भी ज्यादा नहीं बदले हैं।… मिथकों के प्राक-रूपों में मनुष्य के जीवन और मृत्यु संबंधी तमाम अनुभव संचित हैं- निजी भी और सामूहिक भी। उसी तरह के संबंध हैं। रोज नए-नए मिथक बनते और टूटते हैं।’

हम एक ऐसे समय में हैं, जब बहुत लोकप्रिय मिथक उत्पादित किए जा रहे हैं और सफलतापूर्वक पण्य-वस्तु बनाए जा रहे हैं। इसी के साथ हमारे पारंपरिक मिथक अपपाठ और दुरूपयोग के शिकार भी हो रहे हैं। टेक्नॉलॉजी ने छवियों के घमासान को और तीखा कर दिया है। सोशल मीडिया इस घमासान का नया रंगमंच है। ‘विकास’, ‘प्रगति’, ‘स्थिरता’, ‘सुशासन’ नए मिथक हैं। और भी बहुत से और बहुत से क्षेत्रों में। मिथक सिर्फ साहित्य के इलाके में नहीं, वे ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों की सतत जांच-पड़ताल की भी विषय-वस्तु हैं और उनमें सामाजिक यथार्थ के नए पहलू खुल रहे हैं। अपने आप को नई राहों के अन्वेषी समझने वाले अनेक रचनाकार दरअसल वहीं पहुंचते हैं, जहां अनेक ‘महाजन’ पहले ही से पहुंचे हुए हैं। मिथक इस अर्थ में बहुत चुनौतीपूर्ण होते हैं कि कवि तो उनके जरिए संभवत: अपने आसपास के सवालों को पैने, धारदार ढंग से उठाना चाहता है; लेकिन उसकी काव्यात्मक अर्हता उन मिथकों के साथ किए जाने वाले उसके व्यवहार से ही सत्यापित होती है। क्या उसमें कुछ अपूर्वानुमेय, अन्वेषणात्मक दृष्टि है या अपनी निष्पत्तियों को वैधता देने के लिए वह मिथकों को कविता के हल में जोते गए बैलों की तरह इस्तेमाल कर रहा है? क्या वह नए बनते मिथकों को कविता में अपने ढंग से परख पाता है? क्या वह ध्वस्त होते मिथकों की कोई सुध ले पाता है? क्या वह नए मिथकों को स्वीकार्य रूप से गढ़ पा रहा है? मिथकों और हिंदी कविता के किसी भी संबंध को इन अनिवार्य प्रश्नों से गुजरना ही होता है।