कलाकार- नसीरुद्दीन शाह, आनंद तिवारी, मानसी रच्छ, दिशा अरोड़ा, ऑरोशिखा डे
निर्देशक- मनीष श्रीवास्तव

अपराध और तहकीकात- इन दो विंदुओं पर टिकी है- चार्ली के चक्कर में’। फिर भी एक असामान्य अपराध कथा। मुंबई का एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी संदीप पुजारी (नसीरुद्दीन शाह) कुछ सहयोगियों के साथ असेंबल किए गए यानी जुटाए गए विडीयो फुटेज देखता है। ये दिल दहलानेवाला फुटेज है। कुछ लोगों की हत्या हुई है। और हत्या का संबंध ड्रग के धंधे से है।

पर असली सच क्या है और क्या उस तक पहुंचना आसान नहीं है। क्या हेरा (दिशा अरोड़ा) नाम की एक लड़की इसके पीछे है या और भी लोग इससे संबंधित हैं। तहकीकात में पेच ही पेच है और असली मुजरिम तक पहुंचना कठिन है। गुत्थियों को सुलझाना आसान नहीं है।

चक्कर पर चक्कर है। बेशक ये एक नई तरह की फिल्म है और निर्देशक ने कई तरह के नए प्रयोग इसमें किए हैं। एक तो कैमरे के खास एंगल में। इसके अलावा इसमें मुंबई के बांद्रा के इलाके के वास्तविक शॉट हैं यानी फिल्म के खास हिस्से में जिन लोगों को आप देखते हैं उनमें से ज्यादातर वास्तविक जीवन में पाए जानेवाले आदमी हैं, एक्स्ट्रा कलाकार नहीं। जिस हिस्से में इस तरह के शॉट हैं उनमें कोई बैकग्राऊंड म्यूजिक भी नहीं है। इसलिए ये फिल्म एक तरह से मुंबई एक उस पहलू से भी साक्षात्तार कराती है जिनको आप रोजममर्रे में देख सकते हैं।

नसीरुद्दीन शाह एक पुलिस अधिकारी के रूप में कुछ जगहों पर दार्शनिक भी हो गए हैं और ये फिल्म की मांग भी है। फिल्म में कई कलाकार हैं और वे मुख्यरूप से नए हैं। अपनी विशिष्ट पहचान के साथ। निर्देशक ने अपनी मौलिकता का परिचय दिया है। कहानी थोड़ी सी उलझी जरूर है और अगर ये उलझाव न होता तो ये और बेहतर फिल्म होती। फिर भी प्रस्तुति में खास तरह की ताजगी की वजह से इसका आकर्षण अंत तक बना रहता है।